Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

जंतर-मंतर की एक रात और भारत की एक सुबह

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अपनी शिक्षा और रोजगार की बुनियादी मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर बैठे और लगातार राज्य की क्रूर हिंसा और अनदेखी को झेलते युवा हमारे समय और समाज को क्या सिखा रहे हैं? क्या वे ठीक उसी तरह का व्यवहार नहीं कर रहे जैसा हमारे संविधान में लिखा, बताया गया है?


अजमत

दिल्ली से लौटने के बाद बहुत से लोगों ने मुझसे पूछा, ‘वहाँ क्या हुआ?’ मैं उन्हें घटनाएँ तो बता सकता हूँ, लेकिन जो मैंने वहाँ महसूस किया, उसे शब्दों में पूरी तरह बाँध पाना आसान नहीं है। शरीर पर लगी चोटें शायद कुछ दिनों में ठीक हो जाएँ, लेकिन मन पर जो चोट लगी है, उसे भरने में समय लगेगा। इसलिए यह किसी आंदोलन का समाचार नहीं है, न किसी पक्ष या विपक्ष का तर्क। यह एक नागरिक की आँखों-देखी है – उस भारत की, जिसे मैंने जंतर-मंतर की सड़कों पर देखा।

जंतर-मंतर पहुँचते ही सबसे पहले जिसने मेरा ध्यान खींचा, वह भीड़ नहीं थी, बल्कि उस भीड़ का स्वभाव था। चारों तरफ़ युवा ही युवा थे। कोई बिहार से आया था, कोई तमिलनाडु से, कोई पंजाब, कोई राजस्थान, कोई मध्यप्रदेश, कोई उत्तरप्रदेश, कोई महाराष्ट्र, कोई झारखंड, कोई बंगाल, तो कोई असम से। भाषाएँ अलग थीं, पहनावा अलग था, बोलने का अंदाज़ अलग था, लेकिन उनकी आँखों में एक जैसी चमक थी – उम्मीद की चमक।

मुझे सबसे अधिक आश्चर्य इस बात का हुआ कि वहाँ किसी राजनीतिक दल का वर्चस्व दिखाई नहीं दे रहा था। अधिकांश युवाओं के हाथों में अपने बनाए हुए पोस्टर थे। कोई शिक्षा व्यवस्था में सुधार की बात कर रहा था, कोई भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता की, कोई संविधान का हवाला दे रहा था। वे किसी के कहने पर नहीं आए थे। वे अपने मन से आए थे। शायद पहली बार मैंने इतनी बड़ी संख्या में युवाओं को स्वयं अपना नेतृत्व करते देखा।

जंतर-मंतर पर मौजूद युवाओं ने किसी से न नाम पूछा, न धर्म, न जाति, न भाषा। उस रात लगा कि जब कोई साझा उद्देश्य लोगों को जोड़ता है, तब पहचानें छोटी पड़ जाती हैं। वहाँ कोई हिंदू नहीं था, कोई मुसलमान नहीं था, कोई सिख नहीं था, कोई ईसाई नहीं था। वहाँ केवल इंसान थे और उन सबकी सबसे बड़ी पहचान थी – वे भारत के नागरिक थे। जंतर-मंतर की उस रात मुझे लगा कि शायद गांधी इसी भारत की कल्पना करते थे, जहाँ धर्म लोगों को बाँटता नहीं, बल्कि मनुष्य होने की गरिमा उन्हें एक-दूसरे के करीब ले आती है।

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मैं भीड़ के बीच घूम-घूमकर युवाओं के चेहरे पढ़ रहा था। मुझे बार-बार गांधी याद आ रहे थे जो कहते थे कि सत्याग्रह विरोधी को हराने का नहीं, बल्कि उसके विवेक को जगाने का प्रयास है। मुझे लगा कि ये युवा भी अपने तरीके से यही कर रहे थे। वे हिंसा नहीं, संवाद चाहते थे, लेकिन शायद परिस्थितियों ने कोई और रास्ता चुन रखा था। कुछ देर बाद मैंने देखा कि पुलिस की हलचल अचानक बढ़ गई। बैरिकेड और सघन कर दिए गए। माहौल में एक अनकही बेचैनी फैलने लगी। लगा कि किसी भी क्षण कुछ होने वाला है। फिर सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि संभलने का समय ही नहीं मिला।

पहले धक्का-मुक्की हुई। फिर अचानक आँसू गैस के गोले छोड़े गए। कुछ ही क्षणों में धुएँ का घना गुबार पूरे इलाके में फैल गया। आँखों में तेज़ जलन होने लगी, साँस लेना मुश्किल हो गया। लोग अपनी आँखें मलते हुए इधर-उधर भागने लगे। कोई पानी खोज रहा था, कोई अपने साथी को ढूँढ़ रहा था। कुछ लोग पानी की बोतलों से एक-दूसरे की आँखें धो रहे थे। किसी ने अपना गमछा भिगोकर अनजान युवक के चेहरे पर रख दिया। चारों ओर अफरा-तफरी का माहौल था।

कई युवतियाँ भगदड़ में गिर गईं। पुलिस के डंडे लगातार चल रहे थे। मैंने कई युवाओं को सिर, पीठ और कंधों पर डंडे खाते देखा। उस समय ऐसा नहीं लग रहा था कि भीड़ को केवल पीछे हटाया जा रहा है; दृश्य इतना तीखा था कि कई लोगों के मन में भय साफ दिखाई दे रहा था। कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए। किसी के हाथ में चोट थी, किसी के पैर में, कई लोगों की पीठ और सिर पर डंडों के निशान साफ दिखाई दे रहे थे। लोग एक-दूसरे को उठाकर सुरक्षित स्थान तक पहुँचा रहे थे। वहाँ उस समय सबसे बड़ी पहचान घायल और मददगार की थी।

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इसी बीच मेरी मुलाक़ात बिहार से आए सचिन कुमार से हुई। उन्होंने मेरी ओर देखा और कहा, ‘हम तो सिर्फ़ शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने की माँग लेकर आए थे। मैंने कभी नहीं सोचा था कि हमारे साथ ऐसा व्यवहार होगा। मैंने इस सरकार को दो बार वोट दिया है। आज पहली बार लग रहा है कि शायद मेरी उम्मीद गलत थी।’ उनकी बात में गुस्सा कम, पीड़ा ज़्यादा थी। थोड़ी दूर पर बनारस से आई रागनी मिलीं। वे बार-बार अपनी पूरी तरह लाल हो चुकी आँखों पर पानी डाल रही थीं। उन्होंने कहा, ‘पुलिस जिस तरह आँसू गैस के गोले छोड़ रही थी, ऐसा लग रहा था जैसे हम कोई आतंकवादी हों, जबकि हम तो सिर्फ़ अपनी बात कहने आए थे।’

मेरे साथी हरीश ने बताया, ‘जब मेरे पास आँसू गैस का गोला गिरा तो मैं भी डर गया था, लेकिन सामने बहुत लोग खड़े थे। मुझे लगा कि अगर यह यहीं फट गया तो और लोग घायल हो जाएँगे। इसलिए मैंने हिम्मत करके उसे उठाया और किनारे फेंक दिया।’ आगे बढ़ने पर अब्दुल रहमान मिले। उन्होंने केवल इतना कहा, ‘हम लड़ने नहीं आए थे। हम चाहते थे कि हमें सुना जाए।’

आंदोलनकारी युवाओं में कोई किसान का बेटा था, कोई मज़दूर का, कोई पहली बार अपने गाँव से निकलकर दिल्ली आया था। उनके सपने अलग थे, लेकिन चिंता एक थी। भीड़ में कुछ लोग अपनी पीड़ा भी व्यक्त कर रहे थे। किसी ने कहा, ‘ऐसा लगता है जैसे देश डर के माहौल से निकल रहा है।’ दूसरे युवक ने कहा, ‘लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं होना चाहिए।’

दिल्ली से लौटते समय मेरे साथ कोई पोस्टर, झंडा, नारा नहीं था। मेरे साथ अनगिनत चेहरे थे, अनगिनत आवाज़ें थीं और अनगिनत सवाल थे। बार-बार वही तस्वीरें आँखों के सामने आ रही थीं – एक युवक, जो अपनी आधी बोतल का पानी किसी अनजान साथी को दे रहा था; आँसू गैस के धुएँ के बीच एक-दूसरे को बचाने के लिए दौड़ते युवा; घायल साथियों को अपने कंधों का सहारा देते लोग; और भगदड़ के बीच भी इंसानियत का हाथ थामे खड़े अनगिनत चेहरे। आख़िर मैंने क्या देखा? उस भारत की एक झलक, जो कठिनतम समय में भी अपनी करुणा, साहस और साझी इंसानियत को जीवित रखता है।

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मैंने वर्षों गाँवों में काम किया है। आदिवासी बस्तियों में, किसानों के बीच, महिलाओं और युवाओं के साथ। वहाँ मैंने सहयोग देखा है, साझेदारी देखी है और एक-दूसरे के लिए जीने की संस्कृति देखी है। दिल्ली के जंतर-मंतर में मुझे उसी भारत की झलक फिर दिखाई दी। फर्क सिर्फ़ इतना था कि इस बार गाँवों की जगह फुटपाथ थे और खेतों की जगह सड़क, लेकिन इंसानियत वही थी।

हमारा संविधान केवल शासन चलाने के लिए नहीं लिखा गया। उसे इसलिए गढ़ा गया था कि देश का हर नागरिक सम्मान के साथ जी सके, अपनी बात कह सके और न्याय की उम्मीद कर सके। संविधान की प्रस्तावना में लिखे शब्द – न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता – उस दिन मुझे किताब में नहीं, लोगों के व्यवहार में दिखाई दिए। लोकतंत्र नागरिक और राज्य के बीच विश्वास का नाम है। जब नागरिक अपनी बात कहने से डरने लगें, तब लोकतंत्र कमजोर होता है और जब राज्य नागरिक की आवाज़ सुनने का धैर्य खो दे, तब भी लोकतंत्र कमजोर होता है। मैं जंतर-मंतर से कोई जीत या हार लेकर नहीं लौटा। मैं वहाँ से कोई राजनीतिक निष्कर्ष लेकर भी नहीं लौटा।

मैं वहाँ से भारत को देखकर लौटा हूँ – एक ऐसा भारत, जो भूखा हो सकता है, थका हुआ हो सकता है, आँसू गैस से जिसकी आँखें लाल हो सकती हैं, लेकिन जो किसी अनजान व्यक्ति को पानी पिलाना नहीं भूलता। अगर भारत को समझना हो, तो कभी-कभी इतिहास की किताबों से ज़्यादा जंतर-मंतर की एक रात काफ़ी होती है। क्योंकि उस रात मैंने जाना कि भारत केवल एक भूगोल नहीं है; भारत उन लोगों का नाम है, जो कठिन समय में भी एक-दूसरे का हाथ नहीं छोड़ते। और उसी सुबह, दिल्ली से लौटते हुए, मुझे लगा – भारत अभी भी ज़िंदा है। (सप्रेस)

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