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सोनम वांगचुक :  अनशन नहीं, सत्ता का चरित्र बदला है

सोनम वांगचुक :  अनशन नहीं, सत्ता का चरित्र बदला है
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सोनम वांगचुक का आमरण अनशन अब केवल शिक्षा सुधार या एक मंत्री की जवाबदेही का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिरोध की प्रभावशीलता की भी परीक्षा बन चुका है। इसी बीच न्यायालय ने उनके जीवन की रक्षा को सर्वोपरि बताते हुए सरकार को स्वास्थ्य पर सतत निगरानी और आवश्यक चिकित्सकीय हस्तक्षेप सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।


अभी भी सोनम वांगचुक आमरण अनशन पर हैं। उनकी मांग केवल व्यक्तिगत नहीं है। वे केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और शिक्षा से जुड़े गंभीर सवालों पर जवाबदेही की मांग कर रहे हैं। लेकिन यही इस अनशन की सबसे बड़ी राजनीतिक मुश्किल भी है। अगर सरकार यह मांग मान लेती है, तो केवल एक मंत्री नहीं जाएगा, सरकार के नेतृत्व, उसके फैसलों और उसकी पूरी राजनीतिक विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होंगे। इसलिए यह केवल एक मांग नहीं, सत्ता की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका है।

यही वजह है कि सवाल अब यह नहीं रह गया कि सोनम वांगचुक कितने दिन अनशन पर रहेंगे। सवाल यह है कि क्या इस सत्ता के लिए उनका अनशन कोई राजनीतिक या नैतिक संकट पैदा कर पा रहा है?

यही सवाल हमें आठ साल पीछे ले जाता है। 2018 में प्रो. जी.डी. अग्रवाल—एक विश्वस्तरीय पर्यावरण वैज्ञानिक, IIT कानपुर के पूर्व विभागाध्यक्ष और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पहले सदस्य सचिव—गंगा को अविरल और निर्मल बनाने की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठे थे।

111 दिन। एक सौ ग्यारह दिन तक एक 86 वर्षीय वैज्ञानिक सत्याग्रह करता रहा। अंततः उनकी मृत्यु हो गई। लेकिन सरकार नहीं झुकी। अगर 111 दिनों का वह अनशन सत्ता को नहीं हिला सका, तो यह मान लेना कठिन नहीं कि केवल अनशन की अवधि बढ़ जाने से सत्ता का रवैया बदल जाएगा।

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फिर याद आता है 2011 का अन्ना हज़ारे आंदोलन।

अन्ना ने जनलोकपाल की मांग को लेकर आमरण अनशन किया। केवल 11 दिनों में तत्कालीन यूपीए सरकार को बातचीत करनी पड़ी। वजह सिर्फ अन्ना का उपवास नहीं था। वजह थी लाखों लोगों का सड़कों पर उतरना, चौबीसों घंटे मीडिया का दबाव, विपक्ष का समर्थन और सरकार को अपनी राजनीतिक साख खोने का डर।

और फिर इतिहास हमें महात्मा गांधी तक ले जाता है।

महात्मा गांधी ने अपने जीवन में अनेक अनशन किए। अहमदाबाद मिल मज़दूर विवाद, 1932 का पूना पैक्ट, नोआखाली और 1948 का दिल्ली अनशन—हर बार उनका उद्देश्य केवल सरकार पर दबाव बनाना नहीं था, बल्कि समाज की अंतरात्मा को जगाना भी था। अंग्रेज़ सरकार क्रूर थी, लेकिन उसे अंतरराष्ट्रीय छवि की चिंता थी। भारतीय जनता गांधी के पीछे खड़ी थी। कांग्रेस नेतृत्व भी उनके साथ था। इसलिए उनका हर अनशन एक नैतिक और राजनीतिक संकट बन जाता था।

इन चारों अनशनों को सिर्फ “भूख हड़ताल” कह देना इतिहास और राजनीति—दोनों के साथ अन्याय होगा। यह प्रश्न किसी व्यक्ति का नहीं, सत्याग्रह की बदलती प्रासंगिकता का है।

अनशन तभी प्रभावी होता है जब सामने बैठी सत्ता के भीतर संवेदना बची हो, या कम से कम राजनीतिक नुकसान का भय हो। जब उसे लगे कि यदि अनशनकारी को कुछ हुआ तो जनता उसके खिलाफ खड़ी हो जाएगी। जब मीडिया सवाल पूछे। जब समाज बेचैन हो।

लेकिन यदि सत्ता यह मान चुकी हो कि मांग मानना उसकी राजनीतिक परियोजना के लिए ज्यादा खतरनाक है, और जनता भी व्यापक रूप से साथ खड़ी नहीं है, तब वह अनशन समाप्त कराने की जल्दबाज़ी नहीं करती। वह इंतज़ार करती है कि समय, थकान और शरीर अपना काम कर दें।

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इतिहास का यह कड़वा सच है कि सत्ता स्वभाव से संवेदनशील नहीं होती। सत्ता अपने हितों से संचालित होती है। सत्याग्रह उसे तभी हिलाता है जब उसके पीछे समाज खड़ा हो।

यही कारण है कि गांधी अकेले नहीं थे; उनके पीछे करोड़ों भारतीय थे। अन्ना अकेले नहीं थे; उनके पीछे पूरा देश खड़ा दिखाई दे रहा था। लेकिन जी.डी. अग्रवाल लगभग अकेले पड़ गए थे। और आज सोनम वांगचुक भी वैसी ही कठिन लड़ाई लड़ते दिखाई देते हैं।

ऐसे में एक नागरिक के रूप में मेरी इच्छा है कि सोनम वांगचुक अपना अनशन समाप्त करें। इसलिए नहीं कि उनकी मांगें गलत हैं, बल्कि इसलिए कि उनकी आवाज़ इस देश को अभी और लंबे समय तक चाहिए।

आत्मबलिदान इतिहास में सम्मान पाता है, लेकिन हमेशा परिवर्तन नहीं ला पाता।

आज शायद अधिक ज़रूरत इस बात की है कि वे अपनी असाधारण बुद्धि, नैतिक विश्वसनीयता और जनविश्वास का उपयोग संघर्ष के नए रास्ते बनाने में करें—कानूनी लड़ाई, जनआंदोलन, संवाद, शोध, जनमत और लोकतांत्रिक दबाव के ऐसे तरीकों में, जो लंबे समय तक टिक सकें। क्योंकि अगर जनता कंधे से कंधा मिलाकर साथ न खड़ी हो, तो अनशन सत्याग्रह कम और आत्मघाती प्रतिरोध अधिक बन जाता है। और किसी भी समाज की सबसे बड़ी विफलता यही होती है कि वह अपने सबसे ईमानदार लोगों को अकेला छोड़ देता है।

लेखक का परिचय

अमन नम्र

दस वर्षों तक चरखा फीचर सेवा के सम्पादक रह चुके अमन नम्र आजकल दैनिक भास्‍कर में अपनी सेवाएं दे रहे है। वे ब्‍लागर है, लगातार लिखते रहते है। उनकी भाषा, पकड़ और सरोकार आकर्षक हैं।

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