शख्सियत

स्वामी अग्निवेश : बेबाक, प्रखर, निर्भीक व्यक्तित्व को अंतिम सलाम

स्वामी अग्निवेश : बेबाक, प्रखर, निर्भीक व्यक्तित्व को अंतिम सलाम

स्‍मृति शेष : श्रध्‍दांजलि

न्याय, समता, बराबरी और जन समर्थक के पक्षधर रहे स्वामी अग्निवेश के अवसान से एक निरपेक्ष व्यक्तित्व का मौन हो जाना है। वे प्रखरता र्और मुखरता से कई मुददों पर अपने विचार रखते थे। वे बंधुआ मुक्ति मोर्चा के माध्यम से बंधुआ मजदूरों की लड़ाई के साथ, देश भर के जनसंगठनों को समर्थन व ताकत देते थे।

स्‍वामी अग्निवेश से मेरा पहला परिचय सन् 1992 के आसपास इंदौर में ‘अंग्रेजी हटाओ आंदोलन’ के वक्त हुआ था। उनके भगवा वेशभूषा और पगडी आकर्षण का केंद्र रहती थी। मेरा सौभाग्य था कि उस वक्त कार्यक्रम समाप्‍त होने के बाद अग्निवेशजी मेरे साथ स्कूटर पर बैठकर हमारे संवाद नगर स्थित आवास पर आए थे। पिताश्री महेंद्र भाई से उनकी अभिन्नता और मित्रता होने की की वजह से आगे भी वे इंदौर आते रहे, खासतौर पर नर्मदा बचाओ आंदोलन के दौरान। हमने इंदौर में उनकी कई प्रेस वार्ताएं भी आयोजित की थी।

स्‍वामी अग्निवेश को नर्मदा घाटी में होने वाले आंदोलनो में लाने ले जाने में हमारी सहयोगी की भूमिका रहती थी। मुझे याद है कि 1995 में अग्निवेशजी, ओमप्रकाश रावलजी और मैं बड़वानी जाने के लिए कार से इंदौर से रवाना हुए थे। धामनोद के थोडा आगे पुलिस ने हमारी कार रोक लिया था तथा अग्निवेशजी और रावलजी को पुलिस ने गिरफतार कर लिया था। मैं भी उनके साथ था, लेकिन पुलिस से नोंक झोंक के बाद  मुझे पत्रकार होने की वजह जाने दिया गया। लेकिन ठीकरी आने पर मुझसे भी पूछताछ  की तथा ठीकरी थाने पर बैठा लिया था। हम तीनों को आंदोलन के कार्यक्रम में पहुँचे नही दिया गया था। इस तरह युवापन से मुझे उनका सान्निध्य और स्‍ने‍ह मिलता रहा।

भोपाल के गांधी भवन में उनसे मेल मिलाप का दौर भी चलता रहा। महेंद्रभाई के देहांत के बाद भी उनका स्‍नेह और आशीर्वाद मिलता रहा। दूरभाष पर ही उनसे संवाद का दौर चलता था। अभी हाल ही में कोराना काल के दौरान गांधी विचारक पी वी राजगोपाल जी के जन्म दिवस पर स्वामीजी ज़ूम कॉल से जुड़े थे। अस्वस्थता के बावजूद उनकी आवाज में ओज था, बेबाकी थी और लीवर ट्रांसप्लांट कराने का जज्बा भी था। इस कॉल में चुनिंदा 25-30 लोग ही जुड़े थे, उनमें शरद चन्द्र बेहार, एस एन सुब्बराव जी, हेम भाई, एकता परिषद के अनीश, रणसिंह परमार और मेरे अलावा कई वरिष्ठ जन शामिल थे।

अग्निवेशजी कर्मकांड और अंधविश्वास पर जबर्दस्त प्रहार करते थे। तेलुगु भाषी होने के बावजूद उन्हें हिंदी, अंग्रेजी के अलावा कई भाषाओं का ज्ञान था। स्वामी जी के भाषण के देश और दुनिया में करोड़ों लोग कायल थे।

अग्निवेशजी की कमी हमेशा खलती रहेगी। ऐसे बेबाक, प्रखर, निर्भीक व्यक्तित्व को अंतिम सलाम। सादर नमन।

लेखक का परिचय

कुमार सिद्धार्थ

कुमार सिद्धार्थ स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यों से संबद्ध हैं।

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