केन्द्र और उत्तरप्रदेश में काबिज रहीं, भांति-भांति के रंगों-झंडों वाली अनेक सरकारों ने गंगा को स्वच्छ और अविरल बनाने की बार-बार कसमें खाईं, ढेरों धनराशि उडेली, लेकिन आज भी भारत की सर्वाधिक पूज्यनीय और जीवनदायिनी यह नदी जहां-की-तहां भर नहीं हैं, बल्कि लगातार और बदतर, बदहवास होती जा रही हैं। क्या है, सरकारों और समाज का यह कारनामा?
सनातन संस्कृति और आस्था के मुख्य केंद्र, प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में पवित्र गंगा नदी को निर्मल और अविरल बनाने के लिए पिछले दो दशकों में हज़ारों करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। केंद्र सरकार के बहुचर्चित ‘नमामि गंगे मिशन’ और उससे पहले चली ‘गंगा एक्शन प्लान’ की विभिन्न योजनाओं के तहत काशी को विशेष फोकस में रखा गया, लेकिन भारी-भरकम व्यय के बावजूद आज भी गंगा की स्थिति अत्यंत चिंताजनक और दयनीय बनी हुई है। नाले यथावत पवित्र गंगा को दूषित कर रहे हैं और पानी की गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं है।
बनारस में ‘मणिकर्णिका’ और ‘हरिशचंद्र’ जैसे प्रमुख श्मशान घाटों पर अंतिम संस्कार के दौरान बड़ी संख्या में मृत शरीर के अवशेष, अधजली लकड़ियाँ, राख और अन्य सामग्रियां सीधे गंगा नदी में प्रवाहित होती हैं। हालांकि प्रशासन और विभिन्न योजनाओं के तहत घाटों पर स्वच्छता और आधुनिक शवदाहगृहों के प्रयोग के दावे किए जाते हैं, लेकिन पूरी तरह से रोक न लग पाने के कारण अवशेष और राख आज भी गंगा में जा रहे हैं। इस समस्या के कारण नदी के जल में कार्बनिक प्रदूषण और बैक्टीरिया का स्तर काफी बढ़ जाता है, जो पहले से ही वरुणा और असी के सीवर तथा अवैज्ञानिक रूप से बहाई जा रही गाद (सिल्ट) से जूझ रही गंगा की स्थिति को और अधिक गंभीर बना देता है।
गंगा सफाई के नाम पर पिछले दो दशकों में वित्तीय आवंटन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, लेकिन अधिकांश योजनाएं प्रशासनिक सुस्ती और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई हैं। जून 2014 में जब ‘नमामि गंगे मिशन’ शुरू हुआ था, तब इसके लिए शुरुआती केंद्रीय बजट 20,000 करोड़ रुपये तय किया गया था, जिसे बाद में बढ़ाकर 26,800 करोड़ रुपये से अधिक कर दिया गया। ‘राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन’ द्वारा विभिन्न क्रियान्वयन एजेंसियों को 21,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि बांटी जा चुकी है।
अकेले वाराणसी शहर और उससे जुड़े क्षेत्रों में ‘सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट,’ ‘सीवर लाइनों’ के जाल, पम्पिंग स्टेशनों और ‘रिवरफ्रंट डेवलपमेंट’ के लिए अरबों रुपये झोंक दिए गए। काशी के दीनापुर, रामनगर और भगवानपुर ‘एसटीपी’ के निर्माण व क्षमता विस्तार पर भी बेहिसाब धन बहाया गया, लेकिन ज़मीनी स्तर पर विफलताएं इन सभी दावों की पोल खोलती नजर आती हैं। ‘केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ और स्वतंत्र शोध रिपोर्ट्स के अनुसार, गंगाजल की गुणवत्ता मापने के तय मानकों – जैसे ‘बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड’ (बीओडी), घुलनशील ऑक्सीजन (डीओ) और फीकल कोलीफॉर्म के लिहाज से वाराणसी में स्थिति बेहद खराब है।
बनारस में गंगा पर तो धन बहाया जाता है, लेकिन असलियत यह है कि वरुणा और असी नदियों के जरिए गंगा में ज़हर उतरता है और वहाँ बेपरवाही और भ्रष्टाचार ने गंगा के हालात और खराब कर दिए हैं।शहर का गंदा पानी सीधे गंगा में न जाने के तमाम दावों के विपरीत, हालिया प्रशासनिक और जल-निगम के सर्वे ने एक डरावनी तस्वीर पेश की है। इसके मुताबिक गंगा की प्रमुख सहायक नदी वरुणा में अड़तालीस नाले मिल रहे हैं, जिनमें तैंतालीस नाले नगर सीमा के भीतर और पांच बाहरी क्षेत्र के हैं।
‘आदिकेशव’ घाट पर गंगा से मिलने वाली वरुणा नदी आज अपनी पहचान खोकर एक बड़े नाले में तब्दील हो चुकी है। इसके अलावा, असी नदी पर बढ़ते अतिक्रमण के कारण उसकी चौडाई, जो कभी दस मीटर हुआ करती थी, घटकर मात्र ढाई मीटर रह गई है। भू-संरक्षण विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक, कंदवा झील से असी घाट तक लगभग आठ किलोमीटर लंबी इस नदी का प्राकृतिक प्रवाह सीवर और मलबे का प्रवाह हो रहा है। इसके साथ ही रामघाट, भैरवघाट, असीघाट, नमोघाट और सामने घाट के आसपास बने होटल, मकान और डेयरियों का गंदा पानी भी बिना किसी ट्रीटमेंट के सीधे गंगा में मिल रहा है।
बरसात के दिनों में बहकर आने वाली गाद या सिल्ट का अवैज्ञानिक प्रबंधन नदी की पारिस्थितिकी पर तगड़ा प्रहार कर रहा है।बाढ़ के समय मैदानी भागों से बहकर आने वाली गाद कार्बनिक और सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर होती है, जो खेतों के लिए वरदान है, लेकिन नगर-निगम और प्रशासन आसान व सस्ती सुविधा के चक्कर में हर साल घाटों से लाखों टन गाद दोबारा गंगा में ही प्रवाहित कर रहे हैं।
पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. बीडी त्रिपाठी और प्रोफेसर यूके चौधरी का कहना है कि गाद को वापस पानी में डालने से उसमें बायो-मैग्निफिकेशन बढ़ता है और पानी में ठहराव के कारण छोटे-छोटे वॉटर पॉकेट्स बन जाते हैं। इनमें पानी सड़ने से हानिकारक शैवाल पैदा होते हैं, जिससे पानी में घुली ऑक्सीजन घटती है और जलीय जीवों के लिए भयंकर संकट पैदा होता है। लगातार गाद जमा होने से गंगा का तल उथला और ऊंचा होता जा रहा है और गर्मियों में काशी के घाटों से गंगा की धारा सौ से दो सौ मीटर दूर चली जाती है, जिससे काशी की ऐतिहासिक अर्धचंद्राकार पहचान पर संकट खड़ा हो गया है।
विशेषज्ञों के हवाले से यह तथ्य भी सामने आया है कि 1983 से 85 के बीच असी नदी के संगम को रविदास घाट की ओर ले जाकर कृत्रिम रूप से समकोण पर मोड़ दिया गया था। इससे असी का कचरा और गाद मुख्यधारा में आगे बहने की बजाय घाटों के पास ही इकट्ठा होने लगी और हरिश्चंद्र, मणिकर्णिका तथा पंचगंगा घाट तक इसके जमा होने की समस्या विकराल हो गई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद 8 नवंबर 14 को असी घाट पर फावड़ा चलाकर गाद सफाई की थी और उसे ट्रैक्टर-ट्रॉलियों से लादकर बाहर भिजवाया था, लेकिन इसके उलट आज की अफसरशाही पूरी तरह बेरहम हो चुकी है। जब मीडिया ने इस अवैज्ञानिक तरीके से सिल्ट गंगा में बहाए जाने पर सवाल किया, तो अधिकारी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते नजर आए। कोई इसे तकनीकी मामला बताता है, तो कोई खुद को केवल समिति का सदस्य मात्र कहकर पल्ला झाड़ लेता है।
अधिकारी बालू खनन पर रोक के नियमों का हवाला देकर बाढ़ की गाद को नदी में वापस बहाने को मजबूरी बताते हैं, जबकि पर्यावरणविदों का स्पष्ट कहना है कि बाढ़ द्वारा लाई गई गाद को हटाना खनन श्रेणी में नहीं आता, बल्कि यह नदी का कचरा और अवशेष है जिसे वैज्ञानिक तरीके से बाहर ले जाना चाहिए। काशी में गंगा की मौजूदा बदहाली सिर्फ एक पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि दशकों की असफल योजनाओं, अवैध निर्माण, सहायक नदियों की उपेक्षा, सिल्ट के अवैज्ञानिक निस्तारण और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी का मिला-जुला परिणाम है। जब तक वरुणा और असी को पूरी तरह सीवर-मुक्त नहीं किया जाता, गाद को नदी में डालने की प्रवृत्ति पर रोक नहीं लगती और पर्याप्त बहाव सुनिश्चित नहीं किया जाता, तब तक अरबों रुपये खर्च होने के बाद भी गंगा का कायाकल्प कागजी ही साबित होता रहेगा। बनारस में गंगा को नारे या झूठे वायदे की नहीं , बल्कि ईमानदार, वैज्ञानिक प्रयास की दरकार है। (सप्रेस)