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पांच दशक की मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता के लिए देवप्रिय अवस्थी को नरेश मेहता स्मृति लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड

पांच दशक की मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता के लिए देवप्रिय अवस्थी को नरेश मेहता स्मृति लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड

भाषा और पत्रकारिता की विश्वसनीयता के प्रति हमेशा प्रतिबद्ध रहे

इंदौर, 3 अक्टूबर। वरिष्ठ पत्रकार और संपादक देवप्रिय अवस्थी को भारतीय पत्रकारिता में उनके दीर्घकालीन योगदान, पत्रकारिता मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता और पांच दशक की सक्रिय पत्रकारिता के लिए नरेश मेहता स्मृति लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। स्टेट प्रेस क्लब, मध्यप्रदेश, इंदौर द्वारा आयोजित भारतीय पत्रकारिता महोत्सव के दूसरे दिन शनिवार आयोजित सम्मान समारोह में उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किया गया। सम्मान प्राप्त करते समय सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।

प्रशिक्षु पत्रकार से संपादक तक का सफर

देवप्रिय अवस्थी का पत्रकारिता जीवन अनुभव, संघर्ष और निरंतर सक्रियता का परिचायक रहा है। उन्होंने पत्रकारिता को केवल समाचार संप्रेषण का माध्यम न मानते हुए सामाजिक सरोकारों, जनहित और लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़कर अपनी भूमिका निभाई।

देवप्रिय अवस्थी की मूल्‍यानुगत पत्रकारिता यात्रा करीब पांच दशक में हिंदी पत्रकारिता के कई महत्वपूर्ण पड़ावों से होकर गुजरी है। उन्होंने 1 जुलाई 1976 को दैनिक जागरण, कानपुर से प्रशिक्षु पत्रकार के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। इसके बाद वे जनसत्ता की शुरुआती टीम का हिस्सा बने। चौथा संसार, नईदुनिया और दैनिक भास्कर जैसे संस्थानों में संपादकीय जिम्मेदारियां संभालते हुए वे आगे चलकर अमर उजाला में कार्यकारी संपादक की भूमिका तक पहुंचे।

दैनिक भास्कर में उन्होंने भोपाल और रायपुर संस्करणों की संपादकीय जिम्मेदारियां संभालीं। बाद में जयपुर में केंद्रीय डेस्क जैसी महत्वपूर्ण व्यवस्था खड़ी करने में भी उनकी भूमिका रही। उन्होंने पत्रकारिता प्रशिक्षण को लेकर भी प्रयोग किए। वे उन संपादकों में हैं, जिनसे मिलने पर आज भी ‘पत्रकारिता’ शब्द थोड़ा बड़ा और थोड़ा गंभीर लगता है।

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गांधी-विनोबा के विचारों से अनुप्राणित देवप्रिय अवस्थी के जीवन पर उनके पारिवारिक संस्कारों का भी गहरा प्रभाव रहा। उनके पिता विनय भाई अवस्थी सर्वोदय आंदोलन के प्रमुख स्तंभों में थे और लंबे समय तक विनोबा भावे के सान्निध्य में सर्वोदय विचार के प्रसार में सक्रिय रहे। देवप्रिय अवस्थी ने भी आजीवन खादी को अपने जीवन का हिस्सा बनाए रखा।

पदों से आगे पत्रकारिता की चिंता

श्री अवस्थी की पहचान केवल उनके द्वारा संभाले गए पदों और संस्थानों तक सीमित नहीं रही। उनकी पत्रकारिता में भाषा, तथ्य और पाठक के प्रति जवाबदेही लगातार महत्वपूर्ण रही है। 73 वर्ष की उम्र में भी पत्रकारिता की भाषा और उसकी विश्वसनीयता को लेकर उनकी चिंता बनी हुई है।

वे भाषा के छोटे-छोटे पहलुओं को भी पत्रकारिता की गुणवत्ता से जोड़कर देखते हैं। चंद्रबिंदु का इस्तेमाल कहां हो, नुक्ता कहां जरूरी है, भाषा कितनी शुद्ध हो और कितनी सहज—इन सवालों के साथ उनका एक बड़ा सवाल यह भी रहा है कि क्या खबर की हिंदी ऐसी है, जिसे आम पाठक बिना शब्दकोश खोले समझ सके। दरअसल, यह पत्रकारिता के उस दौर की चिंता थी जिसमें शब्द सिर्फ खबर लिखने का माध्यम नहीं थे, बल्कि पाठक और पत्रकार के बीच भरोसे का पुल थे।

यह चिंता केवल भाषा की शुद्धता तक सीमित नहीं है। खबर को अनावश्यक रूप से चटखारेदार बनाने के बजाय तथ्य और भाषा की गरिमा बनाए रखने पर वे जोर देते रहे हैं। उनके लिए भाषा पाठक और पत्रकार के बीच भरोसा कायम करने का माध्यम भी है।

नई पीढ़ी के लिए अनुभव की विरासत

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समारोह में वक्ताओं ने कहा कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता और उसकी सामाजिक जिम्मेदारी को मजबूत करने में वरिष्ठ पत्रकारों का योगदान नई पीढ़ी के पत्रकारों के लिए मार्गदर्शक है। देवप्रिय अवस्थी का सम्मान पत्रकारिता के प्रति उनके दशकों के समर्पण और योगदान को सम्मान देने के साथ-साथ उस पूरी पत्रकार बिरादरी का भी सम्मान है, जिसने कठिन परिस्थितियों में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की भूमिका को मजबूती दी है।

भारतीय पत्रकारिता महोत्सव में इस अवसर पर देश और प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े पत्रकार, संपादक और मीडिया जगत के प्रतिनिधि मौजूद रहे।

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