चंद्रमा पर कदम रखने के बाद मानव की निगाहें अब मंगल और उससे आगे की दुनिया पर हैं। लेकिन अंतरिक्ष की लंबी यात्राएं केवल रॉकेट और तकनीक से संभव नहीं होंगी; उनकी सफलता इंसानी व्यवहार, मानसिक मजबूती और टीम के तालमेल पर भी निर्भर करेगी। इसी चुनौती को समझने की कोशिश कर रहा है इसरो का ‘MITRA’ अध्ययन।
इंसान ने चंद्रमा पर कदम रखा है और अब उसकी निगाहें मंगल और उससे भी दूर के ग्रहों पर टिकी हैं। लेकिन अंतरिक्ष की लंबी यात्राएं केवल शक्तिशाली रॉकेटों और अत्याधुनिक मशीनों के भरोसे तय नहीं की जा सकतीं। एक सफल अंतरिक्ष मिशन की सबसे बड़ी कुंजी वह ‘इंसान’ है, जो उस यान के भीतर बैठा होता है। अंतरिक्ष की शून्यता, एकाकीपन और अत्यधिक तनावपूर्ण वातावरण में मानव व्यवहार कैसे बदलता है? कठिन परिस्थितियों में एक टीम के रूप में तालमेल कैसे बैठता है? इन्हीं जटिल सवालों के जवाब खोजने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अपना महत्वाकांक्षी अभियान ‘MITRA’ शुरू किया है।
क्या है मिशन MITRA?
‘MITRA’ का पूरा नाम ‘मैपिंग ऑफ इंटरऑपरेबल ट्रेड्स एंड रिस्पॉन्स असेसमेंट’ (मैपिंग ऑफ़ इंटरआपरेबल ट्रेट्स एंड रिस्पांस असेसमेंट) है। यह मिशन तकनीकी से ज्यादा मनोवैज्ञानिक और व्यवहारिक विज्ञान पर आधारित है। इसका प्राथमिक उद्देश्य उन मानवीय गुणों और प्रतिक्रियाओं का वैज्ञानिक मानचित्रण करना है, जो एक अंतरिक्ष यात्री को मिशन के दौरान दिखाने होते हैं। सरल शब्दों में कहें तो, यह इस बात का अध्ययन है कि मुश्किल हालात और भारी तनाव के बीच अंतरिक्ष यात्रियों की टीम एक-दूसरे के साथ मिलकर कैसे काम करती है और उनके निर्णय लेने की क्षमता पर क्या असर पड़ता है।
3,500 मीटर की ऊंचाई पर ‘मंगल‘ का अहसास
इसरो का ‘ह्यूमन स्पेस फ्लाइट सेंटर’ इस अध्ययन को निजी साझेदार ‘आका स्पेस स्टूडियो’ के साथ मिलकर लद्दाख के लेह में समुद्र तल से लगभग 3,500 मीटर की ऊंचाई पर संचालित कर रहा है। लेह को इस मिशन के लिए चुनने के पीछे ठोस वैज्ञानिक कारण हैं। यहाँ की भौगोलिक स्थितियाँ बहुत हद तक अंतरिक्ष या किसी अन्य ग्रह (जैसे मंगल) जैसी ‘एनालॉग’ परिस्थितियाँ प्रदान करती हैं। यहाँ की हवा पतली है जिसमें ऑक्सीजन की कमी होती है, जो शरीर पर वैसा ही दबाव डालती है जैसा अंतरिक्ष मॉड्यूल में हो सकता है। साथ ही, यहाँ का शून्य से नीचे का तापमान और अत्यधिक अलगाव अंतरिक्ष यात्रियों को मनोवैज्ञानिक रूप से उस ‘आइसोलेशन’ का अनुभव कराता है, जो पृथ्वी से लाखों किलोमीटर दूर अंतरिक्ष यान में होता है।
तनाव में तालमेल, निर्णय क्षमता और बंद हैबिटेट की दिनचर्या
मिशन ‘MITRA’ के दौरान वैज्ञानिकों की टीम यह समझने की कोशिश कर रही है कि जब शारीरिक और मानसिक तनाव अपने चरम पर होता है, तब टीम का आपसी तालमेल कैसा रहता है। 8 से 10 दिनों के इस एनालॉग आइसोलेशन मिशन के दौरान ‘एनालॉग एस्ट्रोनॉट्स’ एक विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए बंद हैबिटेट में रहते हैं। वे सीमित पानी और संसाधनों का प्रबंधन करते हैं, दैनिक स्वास्थ्य डेटा दर्ज करते हैं और कठिन वैज्ञानिक कार्य पूरे करते हैं।
अंतरिक्ष मिशनों में अक्सर ऐसी स्थितियाँ आती हैं जहाँ पलक झपकते ही सही फैसला लेना होता है। लेह के इस अभियान के जरिए यह देखा जा रहा है कि कठिन हालात में अंतरिक्ष यात्री कैसे एक-दूसरे का साथ देते हैं और तनाव के बीच उनकी निर्णय लेने की क्षमता (डिसिशन मेकिंग) कितनी सटीक रहती है। इस शोध में न केवल वैज्ञानिक बल्कि नागरिक स्वयंसेवकों को भी शामिल किया गया है ताकि विविध व्यवहारिक डेटा प्राप्त हो सके।
गगनयान और भविष्य के मिशनों का आधार
भारत अपने ‘गगनयान’ मिशन की तैयारी के अंतिम चरणों में है, जिसके बाद भारत का अपना अंतरिक्ष स्टेशन बनाने और चंद्रमा पर मानव भेजने की योजना है। ‘MITRA’ जैसे अध्ययन इन बड़े मिशनों के लिए ‘मानव व्यवहार की तैयारी’ में मील का पत्थर साबित होंगे। तकनीकी परीक्षणों के साथ-साथ यह मनोवैज्ञानिक परीक्षण सुनिश्चित करेगा कि हमारे अंतरिक्ष यात्री न केवल शारीरिक रूप से फिट हैं, बल्कि मानसिक रूप से भी इतने मजबूत हैं कि वे महीनों तक एक बंद कैप्सूल में रहकर भी अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकें।
स्वदेशी तकनीक और भविष्य के ‘हैबिटेट‘
इस मिशन का एक और महत्वपूर्ण पहलू ‘स्पेस एनालॉग ह्यूमन हैबिटेट’ का परीक्षण करना है। इसरो यह देख रहा है कि लद्दाख जैसे दुर्गम क्षेत्र में कम संसाधनों के साथ इंसानी बस्तियां (हैबिटैटस) कैसे बनाई और चलाई जा सकती हैं। इसमें 3 डी प्रिंटिंग और स्थानीय संसाधनों के उपयोग पर भी काम हो रहा है, जो भविष्य में चंद्रमा या मंगल की सतह पर मानव बस्तियां बसाने के काम आएगा। यह भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में खड़ा करता है जो ‘एनालॉग रिसर्च’ के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व कर रहे हैं। अंततः कोई भी अंतरिक्ष मिशन उतना ही सफल होता है जितना कि उसे चलाने वाला इंसानी दिमाग। मिशन ‘MITRA’ के जरिए इसरो लद्दाख की बर्फीली वादियों में उन मानसिक मांसपेशियों को मजबूत कर रहा है, जिन्हें कल अंतरिक्ष की अनंत गहराइयों में अज्ञात चुनौतियों का सामना करना है। यह अध्ययन न केवल अंतरिक्ष यात्राओं में मदद करेगा, बल्कि भविष्य में उन परिस्थितियों के लिए भी मार्गदर्शक बनेगा जहाँ इंसानों को कठिन और एकाकी वातावरण में लंबे समय तक मिलकर काम करना होता है। (सप्रेस)