बांध और विस्थापन समसामयिक

अलकनंदा और भागीरथी घाटियों में बांध बनाने पर प्रतिबंध

अलकनंदा और भागीरथी घाटियों में बांध बनाने पर प्रतिबंध
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बिजली उत्पादन का केन्द्र माना जाने वाला हिमालय अब विशालकाय बांधों से मुक्त होने जा रहा है। पहाडों में आसानी से बिजली बनाने के नशे ने लगभग समूचे हिमालय में जलविद्युत परियोजनाओं का जाल बिछा दिया था, लेकिन अभी चार-साढ़े चार महीने पहले सरकार और अदालतों ने इस पर रोक लगा दी है। क्या है, इसकी प्रक्रिया?


‘केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय,’ ‘जल शक्ति मंत्रालय’ और ‘विद्युत मंत्रालय’ ने 19 मई 2026 के एक संयुक्त हलफनामे में उच्चतम न्यायलय को बताया था कि उन्होंने अब अलकनंदा और भागीरथी घाटियों में नये बांधों के निर्माण न करने का फैसला किया है। वजह थी, क्षेत्र की भूगर्भीय स्थिति व भूकम्पनीयता। क्षेत्र की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विशिष्टता और अमूल्य जैव-विविधता भी इस हृदय-परिवर्तन का कारण थीं, हालांकि इनमें से सात मौजूदा परियोजनायें पूरी की जायेंगी।

ये ही मुद्दे थे जो 1970 के दशक में ‘टिहरी बांध विरोधी संघर्ष समिति’ ने महाकाय टिहरी बांध के विरोध में उठाये थे और आज भी विशाल जलाशय वाली बांध परियोजनाओं के विरोध में उठाये जाते हैं। निस्संदेह तब जलवायु परिवर्तन जनित आपदाओं पर बात नहीं होती थी, आज यही महत्वपूर्ण हो गया है। भूकम्पनीयता व पारिस्थितिकीय संवेदनशीलता की बात तब भी थी और अब भी है। इसका तोड़ टिहरी बांध निर्माण के समय भी यह कहकर दिया जाता रहा था कि हमारे बांधों की डिजाइन ऐसी है कि वह ‘रिक्टर पैमाने’ पर आठ तीव्रता के भूकम्प सह सकती है।

विश्व में ऐसी घटनाओं की कमी नहीं है जब भूकम्पों से बांधों और जान-माल के नुकसान हुये हैं। ‘फ्लैश फ्लड्स’ में पानी, मलबे के भारी दबाव में बांध टूटकर दूर-दूर तक तबाही ले जाते हैं। इससे अन्यत्र बाढ़ के हालात पैदा हो जाते हैं। पिछले चार दशकों में दुनिया में करीब 1000 बांध क्षतिग्रस्त हुये हैं। वर्ष 2000 से 2009 के बीच संज्ञान लायक 200 बांध दुर्घटनायें हुई थीं। भारत के गुजरात में 1979 में माच्छू नदी पर बने माच्छू-2 बांध टूटने से मोरबी नगर व आसपास 25000 से ज्यादा लोग मरे थे। बांध टूटा और 15 मिनट में मोरबी में 30 फीट पानी चढ़ गया था। मोरबी के कई इलाके 20 फीट पानी में डूब गये थे, अगले 6 घंटे तक ऐसा ही रहा।

ऐसा ही घटनाक्रम 4 अक्टूबर 2023 सिक्किम के 17,100 फीट की ऊंचाई पर ‘साउथ ल्होनक ग्लेशियर लेक’ टूटने का है। सिक्किम सरकार इसके टूटने के लिये उस दिन के क्लाउड बर्स्ट को जिम्मेदार मानती है, किन्तु कहते हैं कि वैज्ञानिकों ने 2021 में ही इस झील के टूटने की आशंका व्यक्त की थी। दशकों से बनी यह लेक हर साल फैलती जा रही थी। ग्लेश्यिर झील की परिधि में मोरेन यानि हिमबहाव में हिमनद संग आता रहा। अतिवृष्टि में जो दीवार अचानक बर्स्ट हुई थी उसकी ऊंचाई तब करीब 16.3 मीटर थी। झील टूटने के पहले करीब 168 हेक्टेयर तक फैली थी। उसका 100 हेक्टयर का हिस्सा टूटा था। ग्लेशियल झील टूटने के बाद पानी, बर्फ व कीचड़ बहकर 62 किमी चुंगथांघ बांध तक पहुंच गया था जो 1200 मेगावाट की ‘जल-विद्युत्त परियोजना, स्टेज 3’ का हिस्सा था। 2017 से इसने काम करना शुरू किया था। इसकी ऊंचाई 817 मीटर्स थी।

चुंगथांघ बांध इतने पानी, मलबा की मात्रा व भार न सह सकने के कारण 4 अक्टूबर 2023 टूट गया था। इस कारण तीस्ता नदी का जलस्तर 15 से 20 मीटर्स बढ़ गया था। ‘फ्लैश फ्लड’ से 74 से ज्यादा लोगों की जान गई थी और कई लापता हुए थे। कई जिलों में सम्पतियों को भारी नुकसान हुआ था। चुंगथांघ बांध त्रासदी और हाल में नेपाल में आये भूकम्प की तुलना से पता चलता है कि अत्यंत भूकम्प सक्रिय हिमालय में बड़े बांधों को ग्लेशियर डिपॉजिट के हॉटस्पॉट के दायरे में नहीं बनाया जाना चाहिये। उत्तराखंड, गढ़वाल के बांध तो हिमनद पोषित नदियों पर ही हैं। बांध भूकम्पों व भूस्खलनों को उत्प्रेरित भी कर सकते हैं।

7 फरवरी 2021 को उत्तराखंड में भी जलवायु परिवर्तन उत्प्रेरित भारत-तिब्बत सीमा पर ‘नीती घाटी’ के रेणी गांव के पास चमोली में नंदादेवी पार्क के कोर-जोन में अप्रत्याशित रूप से ठण्ड के दिनों में 5600 मीटर पर हैंगिग ग्लेशियर के टूटने का हादसा हुआ था। इससे ऋषिगंगा और धौलीगंगा नदियों में आकस्मिक बाढ़-जनित त्रासदी हुई थी। दो सौ के करीब लोग मरे या लापता हुये थे। कहते हैं इसके पहले क्षेत्र में अतिवृष्टि भी हुई थी।

ऋषिगंगा से शुरू व धौलीगंगा तक पहुंची तबाही ‘ऋषिगंगा लघु पावर प्रोजेक्ट’ का एक हिस्सा बहा ले गई थी। ‘तपोवन विष्णुगाड जलविद्युत्त परियोजना’ भी क्षतिग्रस्त हुई थी। ‘तपोवन सुरंग’ में भी कई लोग फंसे थे। ऋषिगंगा और धौलीगंगा आगे अलकनंदा नदी से मिलती है। अलकनंदा गंगा की एक प्रमुख सहायक नदी भी है। हादसा न बढ़े इसलिये सावधानी के अंतर्गत टिहरी बांध से नदी में पानी छोड़ना बंद कर दिया गया था। तब भी पूर्व चेतावनी देने वाली प्रणाली की आवश्यकता महसूस की गई थी।

वर्ष 2013 की ‘केदार आपदा’ के बाद सुप्रीमकोर्ट व्दारा बनाई गई विशेषज्ञ समिति ने भी उच्च हिमालयी क्षेत्रों के आंकलन के बाद बताया था कि वहां कई परियोजनायें पैराग्लेशियर के दायरे में है। लिहाजा, सुप्रीमकोर्ट ने मई 2014 में ऋषिगंगा-1, ऋषिगंगा-2 और एनटीपीसी के ‘लाटा तपोवन प्रोजेक्ट’ सहित कुल 24 प्रोजेक्ट पर रोक लगा दी थी।

निस्संदेह ग्लेशियरों को जर्जर करने में मानवीय कारणों की बड़ी भूमिका है। इक्कीसवीं सदी के प्रारंभ से ही हिमालयी ग्लेशियर दुगुनी दर से पिघलने लगे हैं। वे हर साल करीब आधा मीटर मोटाई खो रहे हैं व कहीं-कहीं पीछे भी खिसक रहे हैं। गढ़वाल हिमालय में ही पिछले चार दशकों में ये औसतन 18 मीटर्स प्रतिवर्ष पीछे खिसक रहे हैं। इनका संरक्षण करना होगा। पिघलते ग्लेशियरों की ही देन तो गंगा-ब्रम्हपुत्र-सिंधु नदियों जैसी हिम-पोषित सदानीरा नदियों की प्रणालियां हैं। इन पर ही अधिकांश बांध बने हैं।

अत्यंत आवश्यक है कि हिमालयी सीमांत क्षेत्रों में जनभागीदारी, वैज्ञानिक व तकनीकी विधाओं से बांधों को आकस्मिक क्षतिग्रस्त होने व टूटने की दुर्भाग्यपूर्ण स्थितियों से बचाने के लिये पूर्व चेतावनियों के प्रावधानों के साथ आपदा प्रबंधन योजनायें बनाई जायें। सीमा क्षेत्र के बड़े जलाशयी बांध विध्वंसक बम बन सकते हैं। बांध जनित हादसों को कम करने के लिये पूर्व चेतावनी तंत्रों को पुष्ट करना भी बहुत जरूरी है। कई बार चेतावनी-तंत्र एन आपदा के समय मृतप्राय रहते हैं। चेतावनी तंत्र के काम न करने के आरोप 2021 में रेणी में भी लगे थे व अक्टूबर 2023 सिक्किम में भी लग रहे हैं। ग्लेशियल झील ल्होनक के आसपास यदि ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ काम करता होता तो शायद लोगों के बचाव प्रयासों के लिये करीब एक घंटे का समय मिल ही जाता। (सप्रेस)

श्री वीरेन्द्र कुमार पैन्यूली स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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