यदि हम थोड़े धीरज और ध्यान से देखें तो आसानी से पता चल जाता है कि मौजूदा दौर की तमाम झंझटें असहमति को अनदेखा करने, उसे गरियाने की वजह से पैदा हुई हैं। किसी लोकतांत्रिक समाज में असहमति की क्या कीमत होती है? असहमति की अनदेखी क्या गुल खिला सकती है?
किसी बात से सहमत होना बहुत आसान होता है, असहमत होना थोड़ा कठिन और असहमति को सह पाना शायद उससे भी कठिन। इन दिनों देशभर में उभरे प्रतिरोध ने फिर इस सवाल को हमारे सामने ला खड़ा किया है कि आखिर हम वैचारिक असहमति के साथ कैसा बर्ताव करते हैं। असहमति तो रहेगी ही, लेकिन चिंता उस तेजी से बदलते सार्वजनिक वातावरण की है जिसमें विचार पर प्रतिक्रिया देने के बजाय व्यक्ति पर हमला करना आम और आसान होता जा रहा है। तर्क में मेहनत लगती है, गाली देने में नहीं।
हम धीरे-धीरे एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो चाहिए, लेकिन केवल अपनी पसंद की अभिव्यक्ति की। अपनी बात कहने का अधिकार हमें मौलिक और स्वाभाविक लगता है, दूसरे की बात सुनना – विशेषकर वह बात जो हमें नागवार गुजरती हो – असहनीय। लोकतंत्र की असली परीक्षा यहीं होती है। जब कोई हमारी बात दोहराता है तब नहीं, बल्कि तब, जब कोई हमारे विश्वास, हमारी मान्यताओं और हमारी भावनाओं के ठीक उलट कुछ कहता है। क्या हम उस समय भी उसे बोलने देंगे और उसके जवाब में अपने तर्क रखेंगे?
हाल के समय में हमारे यहाँ असहमति को देशद्रोह या संस्कृति-विरोध की तरह परोसा जाने लगा है। हम किसी ऐसी बात का, जिससे हमारी सहमति नहीं होती, उत्तर तर्क और प्रमाण से देने के बजाय संबंधित व्यक्ति को ही गलत साबित करने लगते हैं। सोशल मीडिया पर तो कई बार ऐसा लगता है जैसे भीड़ ने सजा देने का अधिकार भी अपने हाथों में ले लिया है। अगर कोई किसी बात से सहमत नहीं है और अपनी असहमति को गाली के रूप में व्यक्त करता है, तो यह तर्कहीनता की परिणति तो नहीं है?
किसी को कोई बात गलत लगती है तो यह बात निस्संकोच कही जानी चाहिए। तर्कों के साथ कही जानी चाहिए। यही तो अभिव्यक्ति की आजादी है, लेकिन इस आजादी का दुरुपयोग किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकता। यहाँ से आशय अभद्र भाषा और व्यक्तिगत लांछनों से है। हम बहुत जल्दी ‘तुम्हारी बात गलत है’ के बजाय ‘तुम घटिया हो’ कहने लग जाते हैं। शायद ऐसा इसलिए होता है कि व्यक्ति को खारिज करना आसान होता है, विचार को खारिज करना कठिन। अगर हमारे निशाने पर कोई स्त्री हो तो हम ऐसा करने में कुछ अधिक ही उत्साही हो जाते हैं। इसी तरह जिस विचारधारा को हम नापसंद करते हैं, उसे भी बहुत बार बिना औचित्य के अपनी कटु आलोचना का शिकार बना बैठते हैं।
यहाँ यह सवाल उठाना भी प्रासंगिक होगा कि आखिर अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब क्या है? क्या यह आजादी असीमित और नियंत्रणहीन होती है? किसी के मन में बहुत सारी बातें आती हैं तो क्या हरेक बात को सार्वजनिक रूप से कह ही देना चाहिए? क्या अपनी बात कहते हुए मुझे दूसरों की भावनाओं की तनिक भी चिंता नहीं करनी चाहिए? जरूरी नहीं कि हर वह बात, जिस पर मैं विश्वास करता हूँ, सार्वजनिक रूप से कहूँ ही। मैं उसे अपने तक भी रख सकता हूँ। यह बात किसी एक पक्ष पर ही लागू नहीं होती। जो इस बात से असहमत हैं, उनकी अभिव्यक्ति की आजादी भी असीमित नहीं हो सकती। उन्हें भी मर्यादा में रहकर अपनी बात कहनी चाहिए।
बात बहुत सीधी है – जिसके पास तर्क होते हैं, वह तर्क की बात करता है; जिसके पास तर्क नहीं होते, वह बहुत जल्दी व्यक्ति पर उतर आता है। किसी भी समाज की परिपक्वता का परिचय इस बात से मिलता है कि वह अपने से भिन्न तरह से सोचने वालों के साथ कैसा बर्ताव करता है। इस कसौटी पर देखें तो हमारे समाज की बहुत अच्छी तस्वीर नहीं उभरती। हमें विचार करना होगा कि आखिर हम असहमति से इतना डरते क्यों हैं? क्यों असहमति के मामले में हमारी पाचन-शक्ति इतनी कमजोर है? क्यों हमें शब्द के बजाय गाली का इस्तेमाल अधिक रुचिकर लगता है?
शायद इसलिए कि असहमति हमें केवल दूसरे की बात से नहीं, अपने भीतर की असुरक्षा से भी सामना कराती है। दूसरे का अलग सोचना हमारे विश्वास को चुनौती देता है और तब सबसे आसान रास्ता होता है उसकी बात का जवाब देने के बजाय उसे ही चुप करा देना, लेकिन लोकतंत्र में असहमति को चुप कराना समाधान नहीं है। असहमति को सुनना, समझना और फिर उससे असहमत होना ही लोकतांत्रिक संस्कार है। किसी समाज की ताकत इस बात में नहीं है कि वहाँ सब एक जैसा सोचते हैं। उसकी ताकत इस बात में है कि वहाँ अलग-अलग सोचने वाले लोग एक-दूसरे को सुन सकते हैं। इसलिए सवाल है – क्या हम असहमति के साथ रहना सीख सकते हैं? और क्या हम असहमति से डरना बंद कर सकते हैं? (सप्रेस)