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मानसून नहीं, शहरों की व्यवस्था समस्या है

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देश की राजधानी दिल्ली में हाल की बरसात में, हर साल की तरह, एक बार फिर जो हुआ वह क्या ‘चरम मौसम’ की वजह से होने वाली भारी वर्षा भर की करामात है? क्या यही कारनामा देशभर के लगभग सभी शहरों, कस्बों और गांवों तक में नहीं दोहराया जाता? क्या हैं, इसकी वजहें?


हर मानसून में भारत के शहर एक जैसी कहानी दोहराते हैं। तेज़ बारिश की पहली बौछार पड़ते ही सड़कें पानी में डूब जाती हैं, लोग घंटों जाम में फँसे रहते हैं, वाहन खराब हो जाते हैं और सोशल मीडिया जलमग्न सड़कों, उफनती नालियों तथा धँसती सड़कों की तस्वीरों से भर जाता है। पानी उतरने के बाद सरकारें जाँच के आदेश देती हैं, संबंधित एजेंसियाँ सुधार के वादे करती हैं और अस्थायी मरम्मत शुरू हो जाती है, लेकिन अगले मानसून तक वही स्थिति फिर सामने आ जाती है।

हाल ही में दिल्ली-एनसीआर (नेशनल केपिटल रीजन) में हुई भारी वर्षा ने एक बार फिर भारत के शहरी बुनियादी ढाँचे की कमजोरियों को उजागर कर दिया है। दिल्ली में प्रमुख सड़कें जलमग्न हो गईं, जिससे यातायात पूरी तरह प्रभावित हुआ और अनेक रिहायशी इलाके पानी में डूब गए। गुरुग्राम – जो वर्षों से मानसून के दौरान जलभराव के लिए कुख्यात रहा है – में दिल्ली-गुरुग्राम एक्सप्रेसवे, गोल्फ कोर्स एक्सटेंशन रोड, हीरो होंडा चौक और सोहना रोड जैसे प्रमुख मार्ग पानी में डूब गए, जिससे देश के प्रमुख कॉर्पोरेट केंद्रों में से एक लगभग ठहर गया।

नोएडा में अंडरपास जलमग्न हो गए, नालियाँ उफनने लगीं और भीषण जाम लग गया। वहीं गाज़ियाबाद और फरीदाबाद में कई कॉलोनियाँ पानी में डूब गईं, सड़कें क्षतिग्रस्त हुईं और लोगों की आवाजाही बुरी तरह बाधित हुई। एनसीआर के कई हिस्सों में बारिश के बाद सड़कें धँस गईं, जिसने केवल निर्माण की खामियों को ही नहीं, बल्कि शहरी नियोजन, इंजीनियरिंग और रखरखाव की गहरी संरचनात्मक कमजोरियों को भी उजागर कर दिया।

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ये बार-बार होने वाली विफलताएँ केवल असामान्य रूप से अधिक वर्षा का परिणाम नहीं हैं। ये इस बात के संकेत हैं कि भारतीय शहरों की योजना, शासन व्यवस्था, वित्तपोषण और रखरखाव की पूरी प्रणाली में गंभीर संरचनात्मक कमियाँ मौजूद हैं। अब बहस इस बात पर नहीं रह गई है कि जलवायु परिवर्तन अत्यधिक वर्षा की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ा रहा है या नहीं – यह निर्विवाद सत्य है। अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या हमारे शहर इस नई जलवायु वास्तविकता के अनुरूप स्वयं को पर्याप्त गति से ढाल पा रहे हैं? उपलब्ध साक्ष्य बताते हैं कि ऐसा नहीं हो रहा है।

भारत के अधिकांश शहरी बुनियादी ढाँचे का निर्माण उन ऐतिहासिक वर्षा पैटर्न के आधार पर किया गया था, जो आज की जलवायु परिस्थितियों से मेल नहीं खाते। दूसरी ओर, तीव्र शहरीकरण ने मिट्टी और हरित क्षेत्रों की जगह कंक्रीट बिछा दिया है, जिससे भूजल का पुनर्भरण कम हुआ है और वर्षा जल का बहाव कई गुना बढ़ गया है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में झीलें, आर्द्रभूमियाँ, गाँवों के तालाब और प्राकृतिक जल-निकासी मार्ग या तो अंधाधुंध शहरी विस्तार की भेंट चढ़ गए हैं या फिर इतनी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं कि वे अपना प्राकृतिक कार्य नहीं कर पा रहे हैं। जो पानी पहले प्राकृतिक रूप से बाढ़ क्षेत्रों में फैल जाता था, वह अब घनी आबादी वाले कंक्रीट के जंगलों में फँस जाता है। नतीजा स्पष्ट है – जब भारी बारिश होती है तो पानी के निकलने के लिए कोई जगह नहीं बचती। फिर भी केवल जलवायु परिवर्तन यह नहीं समझा सकता कि हर वर्ष वही दृश्य क्यों दोहराए जाते हैं। इसके लिए शासन व्यवस्था की विफलताएँ भी समान रूप से जिम्मेदार हैं।

एनसीआर संस्थागत विखंडन का एक स्पष्ट उदाहरण है। केवल दिल्ली में ही नगर निगम, लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी), दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए), दिल्ली जल बोर्ड, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) तथा कई अन्य एजेंसियाँ शहरी बुनियादी ढाँचे के अलग-अलग हिस्सों की जिम्मेदारी संभालती हैं। दिल्ली के बाहर गुरुग्राम, नोएडा, गाज़ियाबाद और फरीदाबाद अलग-अलग नगर निकायों, विकास प्राधिकरणों और राज्य सरकारों के विभागों द्वारा संचालित होते हैं, लेकिन वर्षा का पानी प्रशासनिक सीमाओं को नहीं पहचानता।

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इसके परिणाम हर जगह दिखाई देते हैं। सड़कों का पुनर्निर्माण भूमिगत उपयोगिताओं के साथ समन्वय किए बिना कर दिया जाता है। नालियाँ आगे के बड़े जल निकासी नेटवर्क से जुड़े बिना ही समाप्त हो जाती हैं। बुनियादी ढाँचे की परियोजनाएँ व्यापक जल-विज्ञान (हाइड्रोलॉजी) अध्ययन के बिना शुरू कर दी जाती हैं। रखरखाव की जिम्मेदारियाँ कई एजेंसियों में बँटी होने के कारण बाढ़ आने पर जवाबदेही भी बिखर जाती है।

भारत के शहरी बुनियादी ढाँचे की सबसे कमजोर कड़ी उसका रखरखाव है। राजनीतिक प्राथमिकताएँ स्वाभाविक रूप से एक्सप्रेसवे, फ्लाईओवर, मेट्रो विस्तार और स्मार्ट सिटी जैसी दिखाई देने वाली परियोजनाओं पर केंद्रित रहती हैं। इसके विपरीत मानसून से पहले नालों की सफाई, रिटेनिंग वॉल की जाँच, पुलियों की मरम्मत, भूमिगत उपयोगिताओं का मानचित्रण और पुराने हो चुके बुनियादी ढाँचे की नियमित निगरानी जैसे कम आकर्षक लेकिन अत्यंत आवश्यक कार्यों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता।

दिल्ली-एनसीआर में हाल ही में हुई सड़क धँसने की घटनाएँ इसी उपेक्षा का परिणाम हैं। सड़कें किसी एक बारिश से नहीं धँसतीं। ऐसी घटनाएँ आमतौर पर वर्षों से पाइपलाइन रिसाव, ठीक से न दबाई गई मिट्टी, पुराने उपयोगिता नेटवर्क, अपर्याप्त जल निकासी या बार-बार खुदाई के बाद उचित पुनर्स्थापन न होने के कारण सतह के नीचे जमा होती कमजोरियों का परिणाम होती हैं। भारी बारिश केवल उन कमजोरियों को उजागर कर देती है जो लंबे समय से विकसित होती रही हैं। इसलिए ‘जलवायु अनुकूलता’ (क्लाइमेट रेज़िलिएंस) को केवल पर्यावरणीय चिंता के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसे शहरी बुनियादी ढाँचे की योजना का केंद्रीय सिद्धांत बनाना होगा।

इस परिवर्तन में प्रकृति-आधारित समाधानों को कहीं अधिक महत्व दिया जाना चाहिए। पुनर्जीवित आर्द्रभूमियाँ, शहरी वन, पानी सोखने वाले फुटपाथ, बायोस्वेल, वर्षा उद्यान, विकेंद्रीकृत वर्षा-जल संचयन प्रणाली और संरक्षित शहरी झीलें वर्षा-जल के बहाव को काफी हद तक कम कर सकती हैं तथा भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा दे सकती हैं। गुरुग्राम के लुप्त होते प्राकृतिक नाले और दिल्ली की सिकुड़ती आर्द्रभूमियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि पारिस्थितिक बुनियादी ढाँचे की उपेक्षा अंततः इंजीनियरिंग आधारित ढाँचे को भी कमजोर कर देती है।

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नागरिकों को यह प्रश्न पूछने का भी अधिकार है कि सार्वजनिक निवेश वास्तव में कितनी स्थायी सुरक्षा प्रदान कर रहा है। एनसीआर में हर वर्ष करदाताओं के करोड़ों रुपये सुरंगों, अंडरपासों और प्रमुख सड़क परियोजनाओं पर खर्च किए जाते हैं, लेकिन सामान्य से थोड़ी अधिक वर्षा होते ही इनमें से अनेक संरचनाएँ जलमग्न हो जाती हैं—चाहे वह प्रगति मैदान सुरंग हो या क्षेत्र के अनेक अंडरपास। इससे एक बड़ा सवाल उठता है—क्या हमारी सड़कें केवल वाहनों की आवाजाही के लिए बनाई जा रही हैं, या उन्हें उन जलवायु परिस्थितियों में भी सुचारु रूप से कार्य करने योग्य बनाया जा रहा है जिनका उन्हें सामना करना है? जैसे-जैसे जलवायु की चरम स्थितियाँ सामान्य होती जा रही हैं, भारत के शहरों के सामने एक निर्णायक विकल्प है। वे हर मानसून को एक अप्रत्याशित आपदा मानते हुए उसी पुराने ढर्रे पर चलते रह सकते हैं, या फिर इसे शहरी शासन और बुनियादी ढाँचे की वार्षिक परीक्षा के रूप में स्वीकार कर सकते हैं। दिल्ली-एनसीआर ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वास्तविक लचीलापन केवल चौड़ी सड़कें या बड़े नाले बनाने से नहीं आता। इसके लिए ऐसे शहरों का निर्माण करना होगा जिनकी योजना दूरदर्शी हो, शासन प्रभावी हो, रखरखाव नियमित और जिम्मेदार हो तथा जो बदलती जलवायु की वास्तविकताओं का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार हों। (सप्रेस)

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