मार्क्स, गाँधी और प्रेमचन्द : हमारे समय का संवाद
प्रेमचन्द को केवल हिन्दी के महान कथाकार के रूप में नहीं, बल्कि हमारे समय के एक जीवन्त वैचारिक हस्तक्षेप के रूप में देखने का आग्रह करता है। बढ़ती असमानता, बाजारवाद, लोकतान्त्रिक संकट और सामाजिक विघटन के दौर में यह विमर्श…
मानसून नहीं, शहरों की व्यवस्था समस्या है
देश की राजधानी दिल्ली में हाल की बरसात में, हर साल की तरह, एक बार फिर जो हुआ वह क्या ‘चरम मौसम’ की वजह से होने वाली भारी वर्षा भर की करामात है? क्या यही कारनामा देशभर के लगभग सभी…

