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उपभोक्ताओं पर लादी जाती महंगी बिजली

उपभोक्ताओं पर लादी जाती महंगी बिजली
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मध्यप्रदेश में बिजली के निजीकरण के नतीजे अब बेशर्मी से उजागर होने लगे हैं। हालत यहां तक पहुंच गई है कि आम उपभोक्ताओं को मंहगी बिजली बेचने के अलावा कमी बताकर खरीदी गई गैर-जरूरी बिजली निजी उद्योगों को बेहद सस्ती कीमतों में मुहैय्या करवाई जा रही है। इसके साथ-साथ कंपनियों द्वारा खुल्लमखुल्ला की जा रही गलतियों-गफलतों की एवज में उपभोक्ताओं से नियमित अंतराल पर रकम वसूली जारी ही है। क्या है, यह गोरखधंधा?


पहले से महंगी बिजली को लेकर परेशान मध्यप्रदेश के उपभोक्ताओं की जेब पर 10 प्रतिशत का अतिरिक्त बोझ डालने की तैयारी चल रही है। इसके लिए ‘मध्यप्रदेश विद्युत नियामक आयोग’ द्वारा आगामी 1 अप्रेल से लागू होने वाले रिटेल टैरिफ का ड्राफ्ट तैयार किया जा रहा है। हालांकि पहले से ही मध्यप्रदेश में अतिरिक्त बिजली 3.81 रूपये प्रति यूनिट में बेचने और उपभोक्ताओं से 7 से 8 रुपये प्रति यूनिट वसूलने, बिजली कंपनियों का घाटा, कर्ज, महंगे बिजली खरीद समझौते और ट्रांसमिशन एवं वितरण हानियों का बोझ उपभोक्ताओं पर डालने का कारनामा बिजली कंपनियां कर ही रही हैं।

मध्यप्रदेश में बिजली व्यवस्था का मौजूदा संकट केवल बिजली की दरों में वृद्धि का मामला नहीं है। इसके पीछे बिजली उत्पादन, खरीद, मांग का गलत आंकलन, अतिरिक्त बिजली की बिक्री, बिजली कंपनियों की वित्तीय अक्षमता, महंगे बिजली खरीद समझौते, ट्रांसमिशन एवं वितरण हानियां और बढ़ता कर्ज जैसी कई परतें हैं। इन तमाम अक्षमताओं का आर्थिक बोझ अंततः राज्य के बिजली उपभोक्ताओं पर ही डाला जा रहा है।

एक तरफ बिजली की दरों में बढ़ोतरी का बोझ उपभोक्ताओं पर पड़ा है, वहीं दूसरी तरफ राज्य में उपलब्ध अतिरिक्त बिजली को खुले बाजार में लगभग आधी कीमत पर बेचे जाने की स्थिति सामने आई है। यह अंतर बिजली व्यवस्था की आर्थिक संरचना पर गंभीर सवाल खड़े करता है। नवीनतम टैरिफ आदेश के अनुसार वर्ष 2026-27 के दौरान खुले बाजार में लगभग 10,198 मिलियन यूनिट (एमयू) अतिरिक्त बिजली बेचे जाने का अनुमान है। इसके अलावा लगभग 899 ‘एमयू’ बिजली औद्योगिक क्षेत्रों को दी जाएगी।

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इस प्रकार कुल नियोजित अतिरिक्त बिक्री लगभग 11,100 ‘एमयू’ होगी, लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सिस्टम में उपलब्ध कुल अतिरिक्त बिजली 20,000 ‘एमयू’ से अधिक होने का अनुमान है। यानी बड़ी मात्रा में बिजली राज्य के भीतर पूरी तरह उपयोग नहीं हो पा रही है और उसका एक हिस्सा कम कीमत पर दूसरे खरीदारों को बेचना पड़ रहा है।

एक ओर उपभोक्ता महंगी बिजली खरीदने के लिए मजबूर हैं और दूसरी ओर उसी व्यवस्था की अतिरिक्त बिजली काफी कम कीमत पर बेची जा रही है, तो बिजली नियोजन और मांग आंकलन की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है। मध्यप्रदेश के सेवानिवृत्त अतिरिक्त मुख्य अभियंता राजेंद्र अग्रवाल इस स्थिति को बिजली नियोजन की कमजोरी से जोड़ते हुए कहते हैं कि बिजली ऊंची कीमत पर खरीदी जा रही है, लेकिन जब उसका उपयोग नहीं होता तो उसे कम दर पर बेचना पड़ता है। उनके अनुसार इस अंतर का वित्तीय बोझ अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ता है। 

सवाल है कि यदि राज्य की बिजली कंपनियां ऐसी बिजली खरीद रही हैं जिसकी तत्काल आवश्यकता नहीं है, तो उसकी कीमत कौन चुकाएगा? यदि 7 से 8 रूपये प्रति यूनिट की मंहगी बिजली का उपयोग नहीं हो पाता और उसे 3.81 रुपये प्रति यूनिट में बेच दिया जाता है, तो खरीद और बिक्री के बीच का अंतर बिजली कंपनियों की वित्तीय स्थिति को प्रभावित करेगा। बिजली कंपनियों के घाटे की भरपाई टैरिफ, सरकारी सहायता अथवा सार्वजनिक धन से ही होती है। इसका सीधा अर्थ है कि उपभोक्ता केवल अपने द्वारा इस्तेमाल की गई बिजली की कीमत नहीं चुका रहा, बल्कि गलत योजनाओं और अतिरिक्त बिजली की लागत का भी बोझ उठा रहा है। सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि राज्य को कितनी बिजली चाहिए, बल्कि यह भी होना चाहिए कि किस कीमत पर, कितने समय के लिए और किन शर्तों पर बिजली खरीदी जा रही है।

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बिजली व्यवस्था की एक अन्य बड़ी समस्या ट्रांसमिशन और वितरण हानियां हैं। बिजली उत्पादन केंद्र से उपभोक्ता तक पहुंचने के दौरान तकनीकी तथा अन्य कारणों से होने वाली हानियां बिजली की वास्तविक लागत बढ़ाती हैं। यदि इन हानियों को नियंत्रित नहीं किया जाता, तो उसकी कीमत भी अंततः उपभोक्ता से वसूली जाती है। बिजली कंपनियों की तकनीकी दक्षता जितनी कम होगी, प्रति यूनिट बिजली की प्रभावी लागत उतनी ही बढ़ेगी।

पुराने नेटवर्क, ट्रांसफार्मरों पर दबाव, लाइन लॉस, बिजली चोरी और वितरण व्यवस्था की कमजोरियों को दूर किए बिना केवल टैरिफ बढ़ाते रहना उपभोक्ताओं के लिए न्यायसंगत समाधान नहीं हो सकता। बिजली दरों के निर्धारण में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि बिजली कंपनियों की कितनी लागत वास्तविक और अपरिहार्य है तथा कितनी लागत प्रबंधन और परिचालन की अक्षमताओं से पैदा हुई है।

राज्य सरकार के अनुसार कुल लगभग 1.9 करोड़ बिजली उपभोक्ताओं में से लगभग 1.4 करोड़ उपभोक्ताओं को सब्सिडी के माध्यम से सुरक्षा प्राप्त है, विशेष रूप से 150 यूनिट प्रतिमाह तक बिजली उपयोग करने वाले उपभोक्ताओं को। यह निश्चित रूप से उपभोक्ताओं को तत्काल राहत देता है, लेकिन सब्सिडी का भुगतान भी आखिर सरकारी बजट से ही होता है। इसलिए यह मान लेना पर्याप्त नहीं है कि सब्सिडी मिलने से बिजली व्यवस्था की वास्तविक लागत का बोझ समाप्त हो जाता है।

यदि बिजली कंपनियां अक्षमता के कारण घाटे में जाती हैं और सरकार उस घाटे या सब्सिडी को पूरा करती है, तो इसका बोझ व्यापक रूप से जनता पर ही पड़ता है। लगातार बढ़ती बिजली लागत से घरेलू उपभोक्ता, उद्योग, छोटे व्यवसाय, कृषि और सेवा क्षेत्र भी प्रभावित होते हैं। महंगी बिजली उत्पादन लागत बढ़ाती है और अंततः वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतों पर भी उसका प्रभाव पड़ता है। घरेलू उपभोक्ता के लिए बिजली का बढ़ता बिल सीधे परिवार के मासिक बजट को प्रभावित करता है। छोटे व्यापारियों और उद्योगों के लिए बिजली की कीमत बढ़ने से रोजगार, निवेश और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी दबाव पड़ता है।

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मध्यप्रदेश में बिजली नीति पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ाना अपने आप में उपलब्धि नहीं है। असली सवाल है कि उत्पादित बिजली का कितना उपयोग हो रहा है, किस कीमत पर बिजली खरीदी जा रही है, कितनी बिजली तकनीकी एवं वितरण हानियों में जा रही है और कितनी बिजली बाजार में कम कीमत पर बेचनी पड़ रही है। यदि राज्य में एक ओर अतिरिक्त बिजली उपलब्ध है और दूसरी ओर उपभोक्ताओं को महंगी बिजली खरीदनी पड़ रही है, तो बिजली खरीद समझौतों की सार्वजनिक समीक्षा की जानी चाहिए।  

क्या बिजली कंपनियों की अक्षमता, गलत नियोजन और महंगी बिजली खरीद की कीमत भी राज्य का उपभोक्ता ही चुकाएगा? एक तरफ 4.8 फीसदी की टैरिफ बढ़ोतरी, दूसरी तरफ 11,100 ‘एमयू’ से अधिक बिजली की कम कीमत पर बिक्री और तीसरी तरफ 20,000 ‘एमयू’ से अधिक अतिरिक्त बिजली की उपलब्धता के आंकड़े बिजली व्यवस्था की योजना और वित्तीय प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। उपभोक्ता को केवल महंगी बिजली ही नहीं, बिजली व्यवस्था की अक्षमता की कीमत भी चुकानी पड़ रही है। बिजली दरों में वृद्धि से पहले सरकार और नियामक संस्था को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बिजली कंपनियों की प्रत्येक लागत उचित, आवश्यक और दक्षतापूर्ण है।

महंगी बिजली खरीदकर सस्ती बिजली बेचने की नीति और उससे पैदा होने वाले घाटे का बोझ उपभोक्ताओं पर डालना बंद होना चाहिए। मध्यप्रदेश के बिजली उपभोक्ताओं को अब केवल सस्ती बिजली की मांग नहीं, बल्कि पारदर्शी, जवाबदेह और आर्थिक रूप से दक्ष बिजली व्यवस्था की मांग करनी होगी। (सप्रेस)

लेखक का परिचय

राज कुमार सिन्हा

बरगी बांध विस्थापित संघ के वरिष्ठ कार्यकर्त्‍ता हैं।

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