‘मोहन से महात्मा’ के 15 राज्यों के 201 जिलों में 15 हजार से अधिक प्रदर्शन
इंदौर, 2 अक्टूबर। मोहनदास से महात्मा बनने की गांधी की यात्रा को कठपुतलियों के जरिए मंच पर उतारने वाले वाराणसी के निर्देशक मिथिलेश दुबे के लिए यह महज एक नाटक नहीं, बल्कि दो दशक से जारी एक सांस्कृतिक यात्रा है। ‘मोहन से महात्मा’ नाम से तैयार इस कठपुतली नाटक के 2 अक्टूबर 2006 से शुरू हुए सफर को अब दो दशक पूरे हो गए हैं। श्री दुबे गुरूवार सुबह इंदौर पहुंचे हैं। वे यहां आयोजित भारतीय पत्रकारिता महोत्सव में इस ‘मोहन से महात्मा’ नाटक का प्रदर्शन करेंगे।
सप्रेस प्रतिनिधि से बातचीत में क्रियेटिव पपेट थियेटर ट्रस्ट वाराणसी के डायरेक्टर मिथिलेश दुबे ने बताया कि पिछले 20 वर्षों में ‘मोहन से महात्मा’ के 15 राज्यों के 201 जिलों में 15 हजार से अधिक प्रदर्शन किए जा चुके हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, झारखंड, पंजाब, दिल्ली, केरल, गोवा, त्रिपुरा, हरियाणा और ओडिशा तक यह प्रस्तुति पहुंची है।
मिथिलेश दुबे के लिए इस यात्रा की खास बात केवल प्रस्तुतियों की संख्या नहीं है। वे कहते हैं कि गांधी के जीवन को कठपुतली के माध्यम से कहने का उद्देश्य उनके जीवन की घटनाओं को दोहराना भर नहीं, बल्कि मोहनदास के भीतर धीरे-धीरे विकसित होते उस व्यक्तित्व को सामने लाना है, जिसने आगे चलकर महात्मा का रूप लिया। कठपुतली इस कहानी को दृश्यात्मक और सहज तरीके से दर्शकों तक पहुंचाने का माध्यम बनती है।

वे कठपुतली को केवल बच्चों के मनोरंजन से जोड़कर देखने को भी उचित नहीं मानते। उनके मुताबिक, एक कठपुतली प्रस्तुति के पीछे कलाकार का लंबा अभ्यास होता है। कठपुतली की गति, संवाद, आवाज, लय और मंच पर उसकी स्थिति इन सबको एक साथ साधना पड़ता है। इसलिए यह शिल्प, अभिनय और नाट्य-तकनीक का मिला-जुला कला रूप है।
कलाकार बचेंगे तो कला भी बचेगी
दो दशक तक एक ही प्रस्तुति को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में जाना मिथिलेश दुबे के लिए कठपुतली कला को जीवित रखने की कोशिश भी है। वे मानते हैं कि किसी पारंपरिक कला को बचाने के लिए केवल उसके पुराने गौरव की चर्चा पर्याप्त नहीं है। कलाकारों को काम मिलना, उनका लगातार मंच से जुड़े रहना और अगली पीढ़ी तक कला का हस्तांतरण होना जरूरी है।
मिथिलेश दुबे की चिंता यह भी है कि लोककलाएं यदि नई पीढ़ी के अनुभवों और वर्तमान सामाजिक संदर्भों से नहीं जुड़ेंगी तो धीरे-धीरे केवल अतीत की स्मृति बनकर रह जाएंगी। इसीलिए उन्होंने कठपुतली को ऐतिहासिक चरित्रों और सामाजिक सरोकारों से जोड़कर प्रस्तुत करने की कोशिश की है।
‘मोहन से महात्मा’ की 15 हजार से अधिक मंचनों के बावजूद यह प्रस्तुति उनके लिए पूरी हुई यात्रा नहीं, बल्कि कठपुतली के जरिए दर्शकों से संवाद बनाए रखने का सिलसिला है।
गांधी जयंती के अवसर पर इंदौर में होने वाला प्रदर्शन इस यात्रा का एक और पड़ाव होगा। कठपुतली के धागों से मोहनदास की कहानी कहने वाला यह मंच अब दो दशक बाद भी दर्शकों को उसी सवाल की ओर ले जाता है एक सामान्य मनुष्य किन अनुभवों और संघर्षों से गुजरकर महात्मा बनता है।