विद्यार्थियों की घटती संख्या को केवल नामांकन के आंकड़े के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज की रिपोर्ट शिक्षकों की उपलब्धता, विषय-विशेषज्ञता, बहु-कक्षा शिक्षण और सरकारी स्कूलों की बदलती सामाजिक संरचना की ओर भी संकेत करती है। ये बदलाव शिक्षा की गुणवत्ता, समान अवसर और सरकारी स्कूलों की भूमिका पर व्यापक बहस की जरूरत बताते हैं।
यह हैरान करने वाली बात है कि देश में शिक्षा की स्थिति को लेकर एक नामी और विश्वसनीय संस्था के सर्वेक्षण से निकले निष्कर्षों पर कोई चर्चा ही नहीं हुई है। खबर के रूप में कहीं यह बात आई कि टाटा इंस्टिट्यूट आफ सोशल साइंस की रिपोर्ट ‘स्टेट आफ टीचर्स, टीचिंग एंड टीचर एजुकेशन इन इंडिया’ नामक रिपोर्ट बताती है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू होने के बाद से बच्चों की संख्या में तीन साल में ही सवा तीन करोड़ की कमी आ गई है। 2021-22 में यह संख्या 26.5 करोड़ थी जो 2024-25 में घटकर 23.2 करोड़ रह गई है। शिक्षा अधिकार कानून और विकलांग लोगों के अधिकार कानून को लागू करने के बाद विद्यार्थियों की संख्या में बहुत तेज वृद्धि हुई थी और इन कानूनों के विरोधी कहते थे कि यह भीड़ सिर्फ खिचड़ी खाने वाले बच्चों की है, पढ़ने वालों की नहीं।
‘टिस’ के इस सर्वेक्षण में इस तरह की मान्यता से शुरुआत नहीं हुई है लेकिन कुछ आँकड़े यह जरूर बताते हैं कि पढ़ाई का स्तर गिरा है और बच्चों के सीखने के बुनियादी स्तर में गिरावट आई है । शिक्षा के स्थिति संबंधी दो एनी सर्वेक्षणों से यह नतीजा आया है कि बच्चों के ज्ञान के स्तर के साथ सीखने के क्षमता में भी कमी आई है ।
पर इस रिपोर्ट की खूबी यह है कि इसने इस गिरावट को गरीब और फटेहाल बच्चों के स्कूल पहुँचने की परिड़घटना के रूप में न बताकर शिक्षकों की कमी और उनके भी ज्ञान में कमी से भी जोड़ा है। यह सर्वेक्षण महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना,, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, पंजाब, ऑडिसा और मिजोरम में किया गया और यह नतीजा निकाला कि स्कूलों में गणित और विज्ञान के अध्यापकों की भारी कमी है। जो लोग गणित पढ़ा भी रहे हैं उनमें से पचास फीसदी ने ही हाई स्कूल में भी गणित की पढ़ाई की थी। अंग्रेजी और भाषा पढ़ाने वालों का हाल इससे बेहतर है लेकिन वह भी 30 फीसदी की कमी वाला इलाका हैं। सरकारी स्कूलों में भी अध्यापकों की भर्ती में काफी ढील वाला माहौल है और 33 फीसदी कमी की रिपोर्ट इसमें है। मजेदार सूचना यह है की इस मामले में निजी स्कूलों का रिकार्ड सरकार से बेहतर है। इसके साथ ही यह भी हुआ है कि शहरी प्राइवेट स्कूलों में अध्यापकों को सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के मुकाबले बेहतर वेतन मिलता है लेकिन ग्रामीण इलाकों में शिक्षकों को वेतन कम मिलता है ।
एक अन्य रिपोर्ट भी इसी प्रवृत्ति को बताती है जो पंजाब के स्कूलों को लेकर किया गया था। वहां की मुख्य शिकायत तो यही रही कि सरकारी स्कूल दलित स्कूल में बदल गए हैं क्योंकि बाकी लोग अपने बच्चों को निजी और अंग्रेजी मीडियम स्कूल में भेजते हैं। ऐसे स्कूल अब गाँव गाँव में खुल गए है। यह बदलाव दिल्ली से लेकर बिहार तक में देखा जा सकता है।पंजाब के सरकारी स्कूलों में अच्छे भवन है, शिक्षक हैं, पढ़ने के बाकी साधन हैं लेकिन समाज के ऊंचे तबके के बच्चे नदारद हैं। बिहार के देहात तक में पहुंचे पाइवेट स्कूल, जो असल में बेरोजगार और पढे-लिखे लड़के-लड़कियों के बल पर ही चलते हैं अब होस्टल और ट्रांसपोर्ट का इंतजाम कराके दूर-दूर से बच्चे जुटाने लगे हैं। ‘टिस’ वाली रिपोर्ट में छात्रों की संख्या की गिरावट को रेखांकित करने के साथ यह भी बताया गया है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 लागू होने के बाद से शिक्षकों की संख्या में छह लाख की बढ़ोत्तरी हो गई है। ऐसे में छात्रों की संख्या गिरना ज्यादा चिंता की बात है ।
रिपोर्ट में एक दूसरी धनात्मक प्रवृत्ति को भी रेखांकित किया गया है कि अध्यापकों में महिला शिक्षिकाओं का हिस्सा तेजी से बढ़ा है। अब यह 54 फीसदी तक पहुँच गया है जो भारत के लिए गर्व की बात होनी चाहिए। पर इसमें एक कमी है। यह वृद्धि शहरी ज्यादा है ग्रामीण कम। शहरी शिक्षकों में महिलाओं का हिस्सा जहां 67 फीसदी है वही ग्रामीण इलाकों में उनका अनुपात 47 फीसदी है। यह चिंता की खास बात नहीं है लेकिन रिपोर्ट में एक कक्षा में कई कई वर्ग के विद्यार्थियों को साथ पढ़ाने का मर्ज बढ़ता गया है। पहले वाले सर्वेक्षण में ऐसा 39 फीसदी कक्षाओं के साथ था तो अब यह बढ़कर लगभग आधा हो गया है। यह अनुपात सरकारी स्कूलों का है। बल्कि कई स्कूल तो अकेले मास्टर के बाल पर चल रहे हैं।
फिर संसाधनों के प्रबंधन और विद्यार्थियों की कमी के नाम पर उनको बंद करने की परिघटना अलग चिंता का विषय है । बंद होने वाले स्कूलों के मामले में उत्तर प्रदेश चैंपियन है । ऐसा दिल्ली में भी हुआ है जहाँ लंबे समय तक शासन करने वाले आप के लोग सरकारी स्कूलों पर ज़्यादा ध्यान देने का दावा करते रहे हैं । निजी स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए अनहोमने जरूर काफ़ी प्रयास किया लेकिन उनके शासन में भी सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों के संख्या घटी। शिक्षा के अंदर के बदलावों के साथ यह भी अच्छा हुआ है कि शिक्षा का मामला चुनावी मुद्दा बन रहा है। इस बार उत्तर प्रदेश में भी स्कूलों का बड़े पैमाने पर बंद होना मुद्दा बन गया है । दिल्ली में यह लगातार एक मुद्दा रहा है। ऐसे में इस रिपोर्ट के नतीजों पर चर्चा न होना हैरान करता है ।