जल, जंगल, जमीन विकास समसामयिक

मधुबन में विकास के मॉडल पर सवाल : पानी चाहिए, पर खेत क्‍यों डुबें ?

मधुबन में विकास के मॉडल पर सवाल : पानी चाहिए, पर खेत क्‍यों डुबें ?
लेखक की फोटो

मधुबन और मोतनाजे के किसानों के खेतों पर प्रस्तावित जलाशय के चलते जमीन डूबने की आशंका के बीच जल परियोजना के विकल्पों पर सवाल उठे हैं। गंगाजल आपूर्ति योजना के तहत भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया के बीच जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने स्थानीय नदियों और जलस्रोतों के पुनर्जीवन की संभावनाओं पर विचार करने की जरूरत बताई है।


मधुबन का किसान इन दिनों खेत में खड़ा होकर फसल नहीं देख रहा, अपनी जमीन का भविष्य देख रहा है। उसे डर है कि जिस खेत में आज धान की हरियाली है, कल वहां जलाशय का पानी होगा। जिस मेड़ पर उसके पिता चले थे, वहां मशीनें चलेंगी। जिस जमीन से उसके परिवार की रोटी चलती है, वह सरकारी कागज में किसी योजना का हिस्सा बन जाएगी। किसान का डर केवल जमीन छिनने का डर नहीं है। जमीन गई तो खेती जाएगी, खेती गई तो रोजी जाएगी और रोजी गई तो गांव में बचेगा क्या? मुआवजा मिल भी गया तो क्या उससे वह खेत लौट आएगा, जिसमें पीढ़ियों की मेहनत, मिट्टी की पहचान और जीवन की स्मृतियां जुड़ी हैं?

मधुबन और मोतनाजे के किसान इसी सवाल के साथ खड़े हैं। सरकार गंगाजल लाकर नवादा और दक्षिण बिहार की प्यास बुझाना चाहती है। किसान पूछ रहा है—पानी हमें भी चाहिए, लेकिन पानी के लिए हमारा खेत ही क्यों चाहिए? यही वह सवाल है, जिसे किसी विकास योजना की लागत में नहीं, उसके सामाजिक हिसाब में लिखा जाना चाहिए।

गंगाजल आपूर्ति योजना फेज-2 पार्ट-1 के तहत मधुबन जलाशय के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया सरकारी स्तर पर आगे बढ़ी है। नवादा जिला प्रशासन ने इसके लिए सार्वजनिक सूचना भी जारी की थी। यानी किसानों की आशंका अब केवल आशंका नहीं रह गई है। जमीन, जलाशय और विस्थापन का सवाल उनके दरवाजे पर खड़ा है। हाल में मधुबन और मोतनाजे में हुई किसानों की महापंचायत ने इसी चिंता को सार्वजनिक किया। किसानों की ओर से बड़ी मात्रा में उपजाऊ जमीन और हजारों परिवारों के प्रभावित होने की बात कही जा रही है। अलग-अलग रिपोर्टों में प्रभावित जमीन और परिवारों की संख्या अलग-अलग सामने आई है। इसलिए अंतिम आंकड़ा सरकार को सार्वजनिक करना चाहिए—कितनी जमीन ली जा रही है, कितने परिवार प्रभावित होंगे, कितने खेत और कितने घर इसकी चपेट में आएंगे और कितनों को मुआवजा मिला है।

यहीं से विकास का असली सवाल शुरू होता है। किसी जल परियोजना का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं हो सकता कि उससे कितने लोगों को पानी मिलेगा। यह भी देखना होगा कि उसके लिए कितने लोगों से क्या लिया जा रहा है। जलाशय में पानी भरने के बाद पानी पाने वालों की संख्या गिनी जाएगी, लेकिन अपनी जमीन खोने वालों की जिंदगी का हिसाब कौन रखेगा? बक्सर के सांसद सुधाकर सिंह ने महापंचायत में इसी सवाल को राजनीतिक भाषा में उठाया है। उनका कहना है कि मधुबन और मोतनाजे की जमीन लेकर जलाशय बनाने के बजाय पंचाने नदी की गाद निकालकर उसमें पानी का भंडारण क्यों नहीं किया जाता। उन्होंने मोकामा से पानी लाने वाली हजारों करोड़ रुपये की योजना की जरूरत पर भी सवाल उठाया और पूछा कि स्थानीय जलस्रोतों की संभावनाओं की जांच क्यों न की जाए। इन दावों और सवालों की तकनीकी जांच जरूरी है।

See also  आचार्य विनोबा भावे: अहिंसा, सेवा और सामाजिक न्याय की शाश्वत दृष्टि

इन सवालों को केवल राजनीतिक बयान कहकर खारिज करना आसान है। लेकिन किसी सवाल का जवाब इसलिए जरूरी नहीं होता कि उसे किसने पूछा है; जवाब इसलिए जरूरी होता है कि उसके पीछे तथ्य जांचे जाने योग्य हैं। क्या पंचाने नदी में पर्याप्त जल उपलब्धता है? क्या उसकी गाद निकालने और जल संग्रहण से स्थानीय जरूरत का कितना हिस्सा पूरा हो सकता है? क्या ऐसा करने पर भूजल, नदी की धारा और पर्यावरण पर कोई प्रतिकूल असर पड़ेगा? दूसरी ओर, मोकामा से पानी लाने की योजना की तकनीकी आवश्यकता क्या है? उसकी लागत कितनी है? मधुबन जलाशय के बिना योजना चल सकती है या नहीं? इन सवालों के उत्तर जल संसाधन विभाग की तकनीकी रिपोर्ट, जल उपलब्धता के आंकड़े और परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट से मिलने चाहिए। यानी बहस नारे से नहीं, नक्शे, आंकड़े और पानी के विज्ञान से होनी चाहिए।

लेकिन इस बहस में जलपुरुष राजेंद्र सिंह की उपस्थिति एक और महत्वपूर्ण सवाल उठाती है। उनका मूल आग्रह सिर्फ इतना नहीं रहा है कि पानी बचाया जाए। उनका जोर इस बात पर रहा है कि पानी को स्थानीय भूगोल, स्थानीय समुदाय और स्थानीय जल-संरचनाओं से जोड़कर देखा जाए। उनके काम का केंद्रीय विचार यह रहा है कि जब समाज अपने पानी के स्रोतों—तालाबों, जोहड़ों, छोटी नदियों, वर्षाजल और पारंपरिक जल-संरचनाओं—को पुनर्जीवित करता है, तो पानी केवल किसी दूरस्थ परियोजना से आने वाली वस्तु नहीं रहता, वह स्थानीय जीवन का हिस्सा बनता है। इसलिए मधुबन में राजेंद्र सिंह का सवाल केवल एक जलाशय का सवाल नहीं है। वह विकास की उस सोच पर सवाल है जिसमें पानी को दूर से लाने की योजना पहले बनती है और स्थानीय जल-संभावनाओं की तलाश बाद में।

See also  सतत जीवन शैली : आज की ज़रूरत, कल का भविष्य—डॉ. जनक पलटा मगिलिगन

अगर किसी इलाके में नदी है, पुराने जलस्रोत हैं, वर्षाजल है और सामुदायिक जल-संरचनाओं को पुनर्जीवित करने की गुंजाइश है, तो बड़ी परियोजना को अंतिम विकल्प मानने से पहले उन विकल्पों की वैज्ञानिक पड़ताल क्यों न हो? राजेंद्र सिंह का अनुभव यह भी बताता है कि पानी का समाधान केवल इंजीनियरिंग का विषय नहीं है। यह समाज, भूगोल और पारिस्थितिकी का भी विषय है। पानी को पाइप में डालकर एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना तकनीकी समाधान हो सकता है, लेकिन जल-सुरक्षा तभी टिकाऊ होगी जब जिस भूभाग से पानी लिया जा रहा है और जहां पानी पहुंचाया जा रहा है—दोनों की प्राकृतिक और सामाजिक जरूरतों को साथ देखा जाए।

इसका अर्थ यह नहीं कि हर बड़ी जल परियोजना गलत है या हर स्थानीय उपाय अपने आप पर्याप्त है। राजेंद्र सिंह के विचार को भी किसी एक मॉडल की नकल के रूप में नहीं समझना चाहिए। राजस्थान में सफल रहा कोई जल-संरक्षण मॉडल नवादा में उसी रूप में काम करे, यह जरूरी नहीं। नवादा की वर्षा, मिट्टी, भूजल, नदी-तंत्र, खेती और आबादी की जरूरतें अलग हैं। लेकिन यही तो वैज्ञानिक जांच का आधार होना चाहिए—पहले स्थानीय जल-व्यवस्था को समझिए, फिर तय कीजिए कि बड़ी परियोजना की कितनी और कैसी जरूरत है।

राजेंद्र सिंह की सबसे महत्वपूर्ण सीख शायद यही है कि पानी पर फैसला केवल सरकार और इंजीनियरों की मेज पर नहीं होना चाहिए। जिस समाज की जमीन, नदी और जलस्रोत उस फैसले से प्रभावित होंगे, उसकी आवाज भी जल-नीति का हिस्सा होनी चाहिए। पानी को बचाने वाला समाज यदि अपने ही खेत खोकर पानी पाने को मजबूर हो, तो विकास की परिभाषा पर फिर से विचार करना पड़ेगा।

इसीलिए मधुबन के किसानों के सवाल को केवल जमीन बचाने का आंदोलन मानना इस पूरे प्रसंग को छोटा कर देना होगा। यह बिहार में जल विकास के मॉडल का सवाल है। क्या शहरों और उद्योगों को पानी देने के लिए गांवों की उत्पादक जमीन को लगातार बलिदान देना होगा? क्या हर जल संकट का उत्तर बड़े जलाशय और लंबी पाइपलाइन ही है? क्या स्थानीय जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने की लागत और लाभ का तुलनात्मक अध्ययन किसी भी बड़ी परियोजना से पहले अनिवार्य नहीं होना चाहिए?

इस बीच किसानों के डर को भी केवल आंकड़ों में बदल देना ठीक नहीं होगा। खेत जमीन का एक टुकड़ा नहीं होता। वह किसान की पूंजी है, उत्पादन का साधन है और कई बार परिवार की सामाजिक सुरक्षा भी। खेत चला गया तो किसान मजदूर बन सकता है। लेकिन मुआवजा देकर किसी को मजदूर बनने के लिए मजबूर करना पुनर्वास नहीं कहा जा सकता। मुआवजा और पुनर्वास एक चीज नहीं हैं। मुआवजा जमीन की कीमत का भुगतान हो सकता है; पुनर्वास जीवन के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया है। खेती करने वाले परिवार को केवल चेक देकर यह मान लेना कि उसका जीवन फिर पहले जैसा हो जाएगा, विकास की बड़ी भूल हो सकती है।

See also  कोरोना वायरस से स्थायी मुक्ति के लिए युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने का प्रशिक्षण

सरकार को इस विवाद में सबसे पहले पारदर्शिता लानी चाहिए। कितनी जमीन अधिग्रहित हो रही है, कितने परिवार प्रभावित होंगे, किसे कितना मुआवजा मिला, कितने परिवारों का पुनर्वास होगा, जलाशय की क्षमता कितनी है, परियोजना की कुल लागत क्या है और स्थानीय विकल्पों का अध्ययन हुआ है या नहीं—इन सभी सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए। और उससे भी जरूरी है संवाद। जिस किसान की जमीन जा रही है, उसे केवल नोटिस पाने वाला व्यक्ति नहीं, निर्णय प्रक्रिया का पक्षकार समझना होगा। सार्वजनिक सुनवाई अगर केवल औपचारिकता बन जाए तो कागज पर सहमति मिल सकती है, जमीन पर नहीं।

पानी किसी एक गांव का नहीं होता। नदी किसी एक जिले की नहीं होती। लेकिन यह भी सच है कि विकास के लिए किसी गांव की जमीन ली जाती है तो उस गांव के लोगों को यह पूछने का पूरा अधिकार है कि क्यों, कितनी और किस कीमत पर। नवादा को पानी चाहिए। दक्षिण बिहार को पानी चाहिए। खेती को भी पानी चाहिए और शहरों को भी। लेकिन पानी की समस्या का समाधान ऐसा नहीं होना चाहिए जिसमें पानी पाने वालों की प्यास बुझाने के लिए पानी पैदा करने वाले खेत ही डूब जाएं।

मधुबन का किसान आज सिर्फ अपनी जमीन के लिए नहीं पूछ रहा—वह विकास से उसके तरीके का हिसाब मांग रहा है। और राजेंद्र सिंह की मौजूदगी इस सवाल को और व्यापक बनाती है: क्या पानी लाने के लिए पहले पानी के अपने घरों को ही उजाड़ना जरूरी है? सवाल बहुत सीधा है—अगर पानी तक पहुंचने के कई रास्ते हो सकते हैं, तो सबसे पहले वही रास्ता क्यों चुना जाए जिसमें किसान का खेत डूबता हो?

पानी चाहिए। विकास भी चाहिए। लेकिन विकास का पहला धर्म यही है कि वह जिस जीवन को बेहतर बनाने निकला है, उसी जीवन को उजाड़ने की कीमत पर अपना रास्ता न बनाए।

जुड़ें - हमारे व्हाट्सएप चैनल से

सप्रेस मीडिया - नवीनतम आलेख, रिपोर्ट, समाचार अपडेट सीधे अपने व्हाट्सएप पर प्राप्त करें।

व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ें →

निष्पक्ष पत्रकारिता का समर्थन करें

आज के दौर में निष्पक्ष, स्वतंत्र और जन-सरोकार की पत्रकारिता को जीवित रखना बड़ी चुनौती है। विज्ञापनदाताओं और कॉर्पोरेट के दबाव से मुक्त होकर आप तक सही और सटीक खबरें पहुंचाना हमारा मुख्य उद्देश्य है। हमारी स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए आपके आर्थिक सहयोग की आवश्यकता है। आपकी दी हुई छोटी-सी सहयोग राशि हमें सच्ची पत्रकारिता करते रहने का संबल देगी।

सहयोग राशि →

नवीन आलेख