Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

चंदन तिवारी की गायकी में इतिहास, स्मृति और स्वदेशी चेतना का जीवंत संवाद

लेखक की फोटो

इतिहास की किताबों में दर्ज गांधी और लोकमानस में बसे गांधी के बीच की दूरी लोकगीत मिटा देते हैं। भागलपुर में महात्मा गांधी के आगमन की शताब्दी पर चंदन तिवारी ने जब गांधी के लोकगीतों को स्वर दिया तो लगा, जैसे सौ साल पुरानी स्मृतियां फिर जीवित हो उठी हों। गीतों में गांधी नेता नहीं, लोकजीवन के अपने आदमी बनकर सामने आए।


पिछले कुछ दिनों से स्वास्थ्य ठीक नहीं था। सामान्य परिस्थितियों में ऐसी स्थिति में यात्रा टाल देना ही बेहतर होता है। शरीर जब विश्राम मांगता है तो यात्राओं से दूरी ही समझदारी होती है। लेकिन कुछ यात्राएँ ऐसी होती हैं, जिन्हें शरीर नहीं, मन तय करता है। कुछ आवाजें ऐसी होती हैं, जिन्हें सुनने के लिए थकान भी छोटी लगने लगती है।

5 अगस्त को ‘अमृत भारत’ में प्रख्यात लोकगीत गायिका चंदन तिवारी के संदर्भ में मेरा आलेख प्रकाशित हुआ और 7 अगस्त को महात्मा गांधी के भागलपुर आगमन की शताब्दी वर्ष के अवसर पर चंदन तिवारी का अंग प्रदेश की धरती पर आगमन हुआ। उनके गांधी गीतों और लोक प्रस्तुतियों को सामने से सुनने का लोभ संवरण नहीं कर पाया। मुंगेर से अपने अनुज और मित्र राकेश कुमार मंडल तथा संजय पोद्दार के साथ भागलपुर पहुँचा। स्वास्थ्य की असहजता के बावजूद यह यात्रा अंततः अत्यंत सुखद और स्मरणीय अनुभव बन गई।

यह केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में शामिल होना नहीं था। ऐसा लगा जैसे सौ वर्ष पुरानी इतिहास की एक धारा वर्तमान के बीच आकर फिर प्रवाहित हो रही हो। जैसे इतिहास की किसी पुरानी किताब का एक पन्ना अचानक खुल गया हो और उसमें दर्ज आवाजें हमारे सामने जीवित हो उठी हों।

महात्मा गांधी का भागलपुर आगमन केवल इतिहास की एक घटना नहीं है। वह उस समय के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में गांधी के हस्तक्षेप तथा उनके विचारों के प्रभाव को समझने का अवसर भी है। इसलिए उनके आगमन की शताब्दी पर किसी लोकगायिका का गांधी के गीतों को स्वर देना अपने आप में महत्वपूर्ण सांस्कृतिक घटना है।

चंदन तिवारी ने जब ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए’, ‘चरखवा चालू रहे’ और ‘पिया मत जा पूरबवा के देसवा’ जैसे गीत प्रस्तुत किए, तो वातावरण में एक अलग ही अनुभूति पैदा हुई। यह केवल संगीत नहीं था। इन गीतों के साथ गांधी की वह स्मृति भी लौट रही थी, जो सरकारी दस्तावेजों और इतिहास की पुस्तकों से कहीं अधिक गहराई से भारतीय लोकमानस में सुरक्षित रही है।

गांधी को समझने के लिए उनके राजनीतिक भाषणों और लेखों को पढ़ना जितना आवश्यक है, उतना ही जरूरी उन लोकगीतों को सुनना भी है, जिनमें गाँव के लोगों ने अपने ढंग से गांधी को समझा और अपनाया। गांधी के विचार जब लोकधुनों में ढले तो वे किसी राजनीतिक सिद्धांत की तरह नहीं रहे; वे जनजीवन का हिस्सा बन गए।

लोक के गांधी की अपनी दुनिया है।यही चंदन तिवारी की गायकी की सबसे बड़ी विशेषता है। वे गांधी को केवल मंच पर प्रस्तुत नहीं करतीं, बल्कि उन्हें लोकजीवन के भीतर खोजती हैं। उनके गांधी गाँव की चौखट पर हैं, खेतों में हैं, स्त्रियों के सामूहिक गायन में हैं, चरखे की घरघराहट में हैं और स्वदेशी के आग्रह में हैं।

See also  महात्मा गांधी की धार्मिक आस्था

उनके गीतों में गांधी कोई दूर खड़े ऐतिहासिक पुरुष नहीं लगते। वे अपने समय के लोगों के बीच चलते हुए, उनसे संवाद करते हुए और उनके सुख-दुख में शामिल होते दिखाई देते हैं। यही लोक की ताकत है। वह बड़े से बड़े राष्ट्रीय व्यक्तित्व को भी अपने जीवन का हिस्सा बना लेता है।

गांधी के साथ भी यही हुआ। राजनीतिक इतिहास में वे राष्ट्रपिता हैं, स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक हैं, सत्याग्रह और अहिंसा के प्रणेता हैं। लेकिन लोक में वे इन बड़ी परिभाषाओं से पहले एक ऐसे व्यक्ति हैं, जिनसे आम आदमी अपने दुख, अपनी आशा और अपने संघर्ष को जोड़ सका।

‘चरखवा चालू रहे’ जैसे गीत को आज सुनना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि चरखा गांधी के लिए केवल कपड़ा बनाने का साधन नहीं था। वह स्वावलंबन, श्रम, आत्मसम्मान और औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के प्रतिरोध का प्रतीक था।

चरखा उस दौर में राजनीतिक हथियार भी था और सामाजिक संदेश भी। विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार से लेकर स्वदेशी वस्त्रों के उपयोग तक, गांधी का चरखा भारतीय समाज को यह समझाने का माध्यम बना कि स्वतंत्रता केवल सत्ता परिवर्तन का नाम नहीं है। आर्थिक आत्मनिर्भरता भी स्वतंत्रता का आवश्यक हिस्सा है।

चरखे को केंद्र में रखकर गाए गए लोकगीतों में महिलाओं की भूमिका विशेष रूप से दिखाई देती है। स्वतंत्रता आंदोलन केवल सभाओं और जुलूसों में नहीं चल रहा था। घरों की देहरी के भीतर भी उसकी अपनी दुनिया थी। महिलाएँ गीतों के माध्यम से स्वदेशी, देशप्रेम और आत्मनिर्भरता की चेतना को आगे बढ़ा रही थीं।

‘पिया मत जा पूरबवा के देसवा’ जैसे गीतों में इसी सामाजिक मनःस्थिति की झलक मिलती है। यह लोकगीत हमें बताता है कि स्वतंत्रता आंदोलन का असर परिवार और घरेलू जीवन तक पहुँचा था। स्त्रियाँ प्रत्यक्ष राजनीतिक मंच पर भले कम दिखाई देती रही हों, लेकिन लोकगीतों के माध्यम से उन्होंने राष्ट्रीय चेतना को अपने संसार में जगह दी।

इसलिए लोकगीतों को केवल मनोरंजन मानना इतिहास के एक बड़े हिस्से को नजरअंदाज करना होगा। लोकगीतों में समाज का अपना इतिहास दर्ज है—वह इतिहास जो अक्सर सरकारी अभिलेखों में नहीं मिलता।

चंदन तिवारी ने इन भूली-बिसरी लोकस्मृतियों को खोजकर और मंच पर लाकर एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक कार्य किया है। उनकी ‘पुरबियातान’ जैसी पहल लोक परंपरा को केवल संग्रहालय की वस्तु बनने से बचाती है। वह उसे वर्तमान से जोड़ती है।

लोक परंपरा तभी जीवित रहती है, जब नई पीढ़ी उसे सुनती, समझती और अपने समय के संदर्भ में ग्रहण करती है। केवल पुराने गीतों को रिकॉर्ड कर लेना पर्याप्त नहीं। उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि, उनकी भाषा, उनके प्रतीक और उनके भीतर छिपे संघर्ष को भी समझना जरूरी है।

See also  झारखंड : मधुपुर पधारे गांधी हमारे, सौ साल बेमिसाल

चंदन तिवारी की प्रस्तुतियों की विशेषता यही है कि वे गीत के साथ उसकी स्मृति भी लेकर आती हैं।

गांधी की लोक-स्मृति की चर्चा रसूल मियाँ के बिना अधूरी है। गांधी की हत्या के बाद भोजपुरी के लोककवि रसूल मियाँ ने जो मार्मिक गीत रचा—“के हमरा गांधीजी के गोली मारल हो…”—वह केवल शोकगीत नहीं था। वह उस लोक-मन की करुण पुकार थी, जिसने गांधी को किसी दूर बैठे राष्ट्रीय नेता की तरह नहीं, बल्कि अपने परिवार के सदस्य की तरह स्वीकार किया था।

गांधी की हत्या पर देश स्तब्ध था, लेकिन लोक ने अपने दुख को अपनी भाषा में व्यक्त किया। रसूल मियाँ का गीत बताता है कि गांधी की मृत्यु केवल एक राजनीतिक हत्या नहीं थी; वह लोकमानस के लिए निजी क्षति जैसी थी।

लोक की यही विशेषता है। वह राष्ट्रीय त्रासदी को व्यक्तिगत पीड़ा में बदल देता है। इतिहास कहता है कि गांधी की हत्या हुई; लोक कहता है—हमारे गांधीजी को किसने गोली मार दी?

इसी लोकधारा में कवि कैलाश गौतम की गांधी पर लिखी रचनाएँ भी महत्वपूर्ण हैं। कैलाश गौतम ने जनभाषा और जनसंवेदना के माध्यम से गांधी को सामान्य आदमी के करीब लाने का काम किया।

एक ओर रसूल मियाँ के लोकगीत में गांधी की हत्या का दर्द है, दूसरी ओर कैलाश गौतम की रचनाओं में गांधी की स्मृति और उनके व्यक्तित्व की जनधर्मी छवि दिखाई देती है। चंदन तिवारी के स्वर में यह पूरी परंपरा जैसे वर्तमान से संवाद करने लगती है।

इसलिए चंदन तिवारी को सुनते हुए केवल एक गायिका को सुनना संभव नहीं। उनके पीछे लोक की एक लंबी सांस्कृतिक यात्रा सुनाई देती है।

आज लोकसंगीत एक कठिन दौर से गुजर रहा है। डिजिटल प्लेटफॉर्म और बाजार ने लोकगीतों को अभूतपूर्व विस्तार दिया है, लेकिन इसके साथ उनके स्वरूप और सरोकार को लेकर भी प्रश्न खड़े हुए हैं। लोकप्रियता की दौड़ में कई बार लोक की भाषा, संवेदना और सांस्कृतिक गरिमा पीछे छूट जाती है।

जो गीत कभी खेतों, नदी किनारों, चौपालों और स्त्रियों के सामूहिक जीवन से पैदा होते थे, वे कई बार बाजार की मांग के अनुसार ढाले जाने लगे हैं। ऐसे समय में लोक की आत्मा को बचाए रखना केवल कलाकार का नहीं, समाज का भी दायित्व है।

ऐसे समय में चंदन तिवारी का काम सांस्कृतिक प्रतिरोध की तरह दिखाई देता है। वे लोक को केवल मनोरंजन की सामग्री नहीं मानतीं। उनके लिए लोक समाज की स्मृति है। उसमें किसान का श्रम है, स्त्री का दुख और उल्लास है, ऋतुओं का संगीत है, नदी की आवाज है और संघर्ष की कथा भी है।

उनकी गायकी में शास्त्रीय अनुशासन और लोक की सहजता का सुंदर मेल दिखाई देता है। लेकिन उनकी सबसे बड़ी शक्ति उनकी आवाज की तकनीकी चमक नहीं, बल्कि लोक-स्मृति के प्रति उनकी प्रतिबद्धता है।

भागलपुर में गांधी के आगमन की शताब्दी के अवसर पर चंदन तिवारी की प्रस्तुति इसलिए विशेष महत्व रखती है कि अंग प्रदेश की धरती स्वयं गांधी की स्मृतियों से जुड़ी हुई है। ऐसे अवसर पर गांधी गीतों का गाया जाना अतीत का पुनरावर्तन नहीं, बल्कि वर्तमान से संवाद है।

See also  कस्तूरबा गांधी 81 वीं पुण्यतिथि : ऐसी थीं, कस्तूरबा

आज गांधी को लेकर बहसें बहुत हैं। राजनीतिक विमर्श में गांधी की व्याख्या अपने-अपने ढंग से की जाती है। लेकिन लोक गांधी को बहस में नहीं बाँधता। वह उन्हें गीत में रखता है।

लोक के गांधी सत्य, करुणा, श्रम, स्वदेशी और मनुष्यता के गांधी हैं।

चंदन तिवारी की गायकी में यही गांधी दिखाई देते हैं।

उनकी आवाज में जब ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए’ गूँजता है तो वह केवल एक प्रसिद्ध भजन नहीं रहता। उसमें उस गांधी की छवि उभरती है, जो दूसरे के दुख को अपना दुख मानने की नैतिक क्षमता को मनुष्य की पहचान मानते थे।

जब ‘चरखवा चालू रहे’ सुनाई देता है तो चरखा फिर से स्वावलंबन और आत्मसम्मान का प्रतीक बन जाता है।

और जब ‘पिया मत जा पूरबवा के देसवा’ जैसी लोकधुन सामने आती है, तो स्वतंत्रता आंदोलन का वह घरेलू संसार आँखों के सामने आ जाता है, जिसमें स्त्रियाँ भी अपने गीतों के माध्यम से इतिहास रच रही थीं।

शायद यही लोक की शक्ति है। वह इतिहास को केवल याद नहीं करता, उसे जीता है।

स्वास्थ्य ठीक नहीं था। फिर भी भागलपुर जाना पड़ा। कारण था चंदन तिवारी का आगमन और उनके स्वर को सामने से सुनने की इच्छा। यात्रा ने शरीर को थोड़ी थकान जरूर दी, लेकिन मन को एक ऐसी ताजगी मिली जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना कठिन है।

कभी-कभी किसी कलाकार को सुनना केवल कला का अनुभव नहीं होता। वह अपने अतीत से मिलने का अवसर भी होता है। चंदन तिवारी की प्रस्तुति में मुझे ऐसा ही अनुभव हुआ।

उस शाम अंग प्रदेश की धरती पर लगा कि गांधी को केवल याद नहीं किया जा रहा है। वे लोक के कंठ से फिर गा रहे हैं।

रसूल मियाँ के गीत में गांधी के लिए लोक का दर्द है, कैलाश गौतम की रचनाओं में गांधी की स्मृति है और चंदन तिवारी के स्वर में उस स्मृति का वर्तमान से संवाद।

इतिहास दस्तावेजों में सुरक्षित रहता है, लेकिन लोक उसे पीढ़ियों तक जीवित रखता है। जब कोई कलाकार उस लोक-स्मृति को ईमानदारी से स्वर देता है, तो बीता हुआ समय वर्तमान में लौट आता है।

भागलपुर की उस शाम यही हुआ।

गांधी सौ साल बाद भी वहीं थे—चरखे की धुन में, लोकगीत की पंक्तियों में, स्त्रियों की स्मृतियों में, रसूल मियाँ के दर्द में, कैलाश गौतम की जनभाषा में और चंदन तिवारी के स्वर में।

और शायद यही किसी महान व्यक्तित्व की सबसे बड़ी जीवित स्मृति है—जब वह इतिहास की किताब से निकलकर लोक के कंठ में बस जाए।

Table of Contents

आदिवासी लोकजीवन की सहजता और सहजीवन का दर्शन

आदिवासी लोकजीवन केवल अभाव और गरीबी की कहानी नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सहजीवन, आत्मनिर्भरता और भरोसे की समृद्ध परंपरा भी है। मिट्टी-लकड़ी के घरों से लेकर पशुओं को परिवार का हिस्सा मानने और बिना दरवाजों के रहने तक, आदिवासी

Read More »

प्रकृति ही दुनिया का सबसे बड़ा धर्म, इसकी नाराजी का समाधान अगल-बगल नहीं अंदर झांककर खोजना होगा – पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी

संस्था सेवा सुरभि द्वारा आयोजित “क्यों रूठे हुए हैं मेघराज मालवांचल से” विषय पर हुए व्‍याख्‍यान में शामिल हुए शहर के पर्यावरणविद और प्रबुद्धजन   इंदौर, 7 अगस्त। मालवा में बारिश का बदलता मिजाज केवल मौसम का बदलाव नहीं है,

Read More »

चंदन तिवारी की गायकी में इतिहास, स्मृति और स्वदेशी चेतना का जीवंत संवाद

इतिहास की किताबों में दर्ज गांधी और लोकमानस में बसे गांधी के बीच की दूरी लोकगीत मिटा देते हैं। भागलपुर में महात्मा गांधी के आगमन की शताब्दी पर चंदन तिवारी ने जब गांधी के लोकगीतों को स्वर दिया तो लगा,

Read More »