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अरावली की नई परिभाषा : संरक्षण बचेगा या रास्ता खुलेगा खनन का?

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सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला की प्रस्तावित नई परिभाषा के पर्यावरणीय, पारिस्थितिक और कानूनी प्रभावों के स्वतंत्र मूल्यांकन के लिए विशेषज्ञ समिति गठित की है। यदि नई परिभाषा से संरक्षित क्षेत्र घटता है या नियामकीय रिक्तियाँ पैदा होती हैं, तो इससे अरावली की पारिस्थितिक निरंतरता और संरक्षण पर गंभीर तथा संभावित रूप से अपरिवर्तनीय खतरा उत्पन्न हो सकता है।


विक्रांत शर्मा

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने दिनांक 29 दिसंबर 2025 तथा 25 मई 2026 के आदेशों के माध्यम से अरावली पर्वतमाला की अनुशंसित परिभाषा के क्रियान्वयन से उत्पन्न होने वाले संभावित पारिस्थितिक, पर्यावरणीय तथा नियामकीय परिणामों की स्वतंत्र एवं विशेषज्ञ समीक्षा का निर्देश दिया। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि यदि अनुशंसित परिभाषा के क्रियान्वयन से संरक्षित क्षेत्र का दायरा संकीर्ण होता है अथवा ऐसी नियामकीय रिक्तियाँ उत्पन्न होती हैं जिनके परिणामस्वरूप पारिस्थितिक दृष्टि से जुड़े क्षेत्रों में खनन अथवा अन्य विघटनकारी गतिविधियाँ संभव हो जाती हैं, तो इससे अरावली क्षेत्र की पारिस्थितिक अखंडता पर ऐसे प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकते हैं जिन्हें भविष्य में पलटना कठिन, यदि असंभव नहीं तो, हो सकता है।

इसी उद्देश्य से गठित समिति का दायित्व केवल यह निर्धारित करना नहीं है कि कौन-से क्षेत्र अनुशंसित परिभाषा के अंतर्गत आते हैं अथवा उससे बाहर रह जाते हैं, बल्कि यह भी है कि परिभाषा के क्रियान्वयन से उत्पन्न विधिक, नियामकीय एवं पारिस्थितिक परिणामों का व्यापक, समग्र तथा वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन कर न्यायालय को यह निर्णय लेने में सहायता प्रदान की जाए कि अनुशंसित परिभाषा का क्रियान्वयन न्यायालय के आदेशों के अनुरूप किया जा सकता है या नहीं।

अरावली की पारिस्थितिक अखंडता का संरक्षण

न्यायालय की प्राथमिक चिंता अरावली क्षेत्र की पारिस्थितिक अखंडता का संरक्षण है। न्यायालय ने यह आशंका व्यक्त की कि यदि अनुशंसित परिभाषा के कारण संरक्षित क्षेत्र का दायरा उल्लेखनीय रूप से संकीर्ण हो जाता है, तो पारिस्थितिक रूप से जुड़े अनेक क्षेत्र केवल तकनीकी कारणों से संरक्षण से बाहर हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में “गैर-अरावली” क्षेत्रों का विस्तार होगा, जिसके परिणामस्वरूप उन क्षेत्रों में अनियंत्रित अथवा विनियमित खनन तथा अन्य विघटनकारी गतिविधियों की संभावना उत्पन्न हो सकती है। इससे पारिस्थितिक निरंतरता बाधित हो सकती है, निम्न श्रेणी की पर्वतमालाएँ संरक्षण से वंचित हो सकती हैं तथा महत्वपूर्ण नियामकीय रिक्तियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

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इन्हीं आशंकाओं के कारण न्यायालय ने अनुशंसित परिभाषा तथा उससे संबंधित निर्देशों के क्रियान्वयन को स्थगित रखा, ताकि किसी अपरिवर्तनीय प्रशासनिक अथवा पारिस्थितिक परिणाम से पूर्व सभी संभावित प्रभावों का विशेषज्ञ परीक्षण किया जा सके।

समिति से अपेक्षा की गई है कि वह भूवैज्ञानिक संरचना, मृदा, जैव विविधता, वनस्पति, जीव-जंतु, खनिज संसाधन तथा प्राकृतिक संसाधनों सहित समस्त पारिस्थितिक कारकों का व्यापक एवं समग्र परीक्षण करे। साथ ही उसे प्रभावित राज्यों, स्थानीय समुदायों, किसानों, ग्रामीणों, खदान श्रमिकों, खनन पट्टा धारकों तथा परियोजना प्रवर्तकों सहित सभी हितधारकों के परस्पर प्रतिस्पर्धी हितों का भी संतुलित मूल्यांकन करना होगा।

अनुशंसित परिभाषा के क्रियान्वयन का परीक्षण

न्यायालय के समक्ष सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि अनुशंसित परिभाषा का वास्तविक क्रियान्वयन किन क्षेत्रों को संरक्षण के अंतर्गत रखेगा और किन क्षेत्रों को उससे बाहर कर देगा। यह केवल भौगोलिक सीमांकन का प्रश्न नहीं है, बल्कि इस बात का भी परीक्षण है कि क्या परिभाषा के कारण पारिस्थितिक रूप से जुड़े हुए क्षेत्र संरक्षण से बाहर चले जाएँगे, क्या इससे पर्यावरणीय क्षरण अथवा क्रमिक पारिस्थितिक लोप का जोखिम उत्पन्न होगा तथा संपूर्ण अरावली पर्वतमाला की पारिस्थितिक निरंतरता पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा।

इसलिए समिति को अनुशंसित परिभाषा के अंतर्गत सम्मिलित एवं बहिष्कृत क्षेत्रों की स्पष्ट पहचान करनी होगी तथा यह भी निर्धारित करना होगा कि इन परिवर्तनों के अल्पकालिक एवं दीर्घकालिक पर्यावरणीय परिणाम क्या होंगे।

क्रियान्वयन से उत्पन्न नियामकीय प्रभाव

न्यायालय ने केवल पारिस्थितिक प्रभावों का ही नहीं, बल्कि उन विधिक एवं नियामकीय परिस्थितियों का भी परीक्षण अपेक्षित किया है जो अनुशंसित परिभाषा के क्रियान्वयन से उत्पन्न होंगी।

यदि कोई क्षेत्र परिभाषा से बाहर हो जाता है, तो यह निर्धारित करना आवश्यक होगा कि उस क्षेत्र पर कौन-कौन से कानून, न्यायिक अथवा प्रशासनिक निर्देश तथा नियामकीय व्यवस्थाएँ लागू रहेंगी अथवा समाप्त हो जाएँगी। इसी प्रकार यह भी परीक्षण आवश्यक है कि किन परिस्थितियों में खनन अथवा अन्य गतिविधियाँ प्रतिबंधित, अनुमेय, सुगम अथवा पूर्णतः अनियंत्रित हो सकती हैं।

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स्पष्टतः संरक्षण से बहिष्करण अथवा नियामकीय रिक्तियाँ अपने आप में अंतिम परिणाम नहीं हैं; वे उन विधिक परिस्थितियों का निर्माण करती हैं जिनके माध्यम से बाद में पारिस्थितिक एवं पर्यावरणीय परिणाम उत्पन्न होते हैं। इसलिए इन विधिक एवं नियामकीय परिवर्तनों की पहचान न्यायालय की जांच का अनिवार्य अंग है।

 नियामकीय परिवर्तनों के पारिस्थितिक परिणाम

जब यह स्पष्ट हो जाए कि क्रियान्वयन से कौन-सी विधिक एवं नियामकीय परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी, तभी उनके परिणामस्वरूप उत्पन्न पारिस्थितिक प्रभावों का वैज्ञानिक परीक्षण किया जा सकता है।

समिति को यह मूल्यांकन करना होगा कि क्या तकनीकी रूप से संरक्षण से बाहर हो चुके किन्तु पारिस्थितिक दृष्टि से जुड़े क्षेत्रों में खनन अथवा अन्य गतिविधियाँ पारिस्थितिक क्षरण को बढ़ाएँगी। साथ ही यह भी परीक्षण आवश्यक होगा कि क्या संरक्षण प्राप्त क्षेत्रों के भीतर भी विनियमित अथवा सतत खनन स्वयं प्रतिकूल पारिस्थितिक परिणाम उत्पन्न कर सकता है।

इन सभी मूल्यांकनों में भूविज्ञान, मृदा, जैव विविधता, वनस्पति, जीव-जंतु, जल संसाधन तथा प्राकृतिक संसाधनों के पारस्परिक संबंधों का समग्र अध्ययन आवश्यक होगा। समिति को अल्पकालिक एवं दीर्घकालिक दोनों प्रकार के परिणामों का मूल्यांकन करते हुए यह भी निर्धारित करना होगा कि क्या ये परिणाम भविष्य में अपरिवर्तनीय हो सकते हैं।

हितधारकों पर प्रभाव का परीक्षण

न्यायालय ने विशेष रूप से निर्देश दिया है कि समिति विभिन्न हितधारकों के हितों का पृथक-पृथक परीक्षण करे। अरावली क्षेत्र की पारिस्थितिकी से स्थानीय समुदायों, किसानों, ग्रामीणों, खदान श्रमिकों, उद्योगों, परियोजना प्रवर्तकों तथा राज्य सरकारों के हित भिन्न-भिन्न प्रकार से जुड़े हुए हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक वर्ग पर क्रियान्वयन से उत्पन्न विधिक, नियामकीय तथा पारिस्थितिक प्रभावों का स्वतंत्र विश्लेषण किया जाए।

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ऐसा विश्लेषण ही यह स्पष्ट कर सकेगा कि विभिन्न वर्गों के जीवन, आजीविका तथा कल्याण पर इन प्रभावों की प्रकृति, सीमा तथा व्यापकता किस प्रकार भिन्न होगी।

आवश्यक एवं अपरिहार्य निर्धारण

उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि समिति के समक्ष तीन प्रमुख स्तरों पर निर्धारण आवश्यक हैं।

प्रथम, यह निर्धारित करना होगा कि अनुशंसित परिभाषा एवं उससे संबंधित निर्देशों के क्रियान्वयन से कौन-कौन से विधिक एवं नियामकीय परिवर्तन उत्पन्न होंगे तथा उनका प्रभाव विभिन्न क्षेत्रों पर किस प्रकार पड़ेगा।

द्वितीय, इन नियामकीय परिवर्तनों के परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाले पारिस्थितिक, पर्यावरणीय तथा अन्य प्रभावों का वैज्ञानिक एवं वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन करना होगा, जिसमें पारिस्थितिक निरंतरता, पर्यावरणीय क्षरण, नियामकीय रिक्तियों तथा संभावित अपरिवर्तनीय परिणामों का परीक्षण सम्मिलित हो।

तृतीय, यह निर्धारित करना होगा कि इन सभी परिणामों का प्रभाव विभिन्न हितधारकों पर किस प्रकार पड़ेगा तथा क्या इन प्रभावों की प्रकृति और सीमा विभिन्न वर्गों के बीच भिन्न होगी।

समिति के समक्ष अपेक्षित निर्धारण क्रमिक, परस्पर संबद्ध तथा एक-दूसरे पर आधारित हैं। सर्वप्रथम यह निर्धारित करना आवश्यक है कि अनुशंसित परिभाषा के क्रियान्वयन से कौन-सी विधिक एवं नियामकीय परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी। उन्हीं के आधार पर पारिस्थितिक एवं पर्यावरणीय परिणामों का वैज्ञानिक मूल्यांकन संभव है, और अंततः उन्हीं परिणामों के आधार पर विभिन्न हितधारकों पर पड़ने वाले प्रभावों का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण किया जा सकता है।

इसी क्रमबद्ध प्रक्रिया के माध्यम से समिति न्यायालय को वह व्यापक, संतुलित एवं तथ्याधारित विशेषज्ञ प्रतिवेदन उपलब्ध करा सकती है जिसकी अपेक्षा न्यायालय ने अपने आदेशों में व्यक्त की है। ऐसा प्रतिवेदन न्यायालय को यह निर्धारित करने में सहायता प्रदान करेगा कि क्या अनुशंसित परिभाषा का क्रियान्वयन बिना किसी नियामकीय रिक्ति उत्पन्न किए, पारिस्थितिक निरंतरता से समझौता किए तथा ऐसे अपरिवर्तनीय पर्यावरणीय परिणाम उत्पन्न किए बिना किया जा सकता है जो भविष्य में सुधार से परे हों।

विक्रांत शर्मा वरिष्‍ठ अभिभाषक है।

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