प्रेमचन्द को केवल हिन्दी के महान कथाकार के रूप में नहीं, बल्कि हमारे समय के एक जीवन्त वैचारिक हस्तक्षेप के रूप में देखने का आग्रह करता है। बढ़ती असमानता, बाजारवाद, लोकतान्त्रिक संकट और सामाजिक विघटन के दौर में यह विमर्श हमें याद दिलाता है कि किसी भी समाज का भविष्य उसकी तकनीकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि सबसे कमजोर मनुष्य के प्रति उसके व्यवहार से तय होता है।
31 जुलाई, प्रेमचन्द जयन्ती
किशन कालजयी
इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में जब लोकतन्त्र बाजार की भाषा बोल रहा है, राजनीतिक सत्ता नैतिकता से दूर होती जा रही है और साहित्य का सार्वजनिक प्रभाव सिकुड़ रहा है, तब कार्ल मार्क्स, महात्मा गाँधी और प्रेमचन्द हमारे समय के तीन ऐसे बौद्धिक स्रोत बनकर सामने आते हैं, जिनके बिना भारत और उसकी लोकतान्त्रिक चुनौतियों को समझना कठिन है। तकनीकी प्रगति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आर्थिक विकास के अभूतपूर्व दावों के बावजूद समाज के भीतर असमानता, असुरक्षा और विभाजन की खाइयाँ लगातार गहरी होती जा रही हैं।
सूचना के विस्फोट के इस दौर में संवाद की जगह शोर, नागरिकता की जगह उपभोक्तावाद और सार्वजनिक विवेक की जगह तात्कालिक उत्तेजनाएँ चरम पर हैं। ऐसे समय में इन तीनों की ओर लौटना केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि वर्तमान को समझने और भविष्य की दिशा तलाशने का बौद्धिक दायित्व भी है। तीनों अलग-अलग भूगोल, परम्पराओं और वैचारिक पृष्ठभूमियों से आते हैं, लेकिन उनके चिन्तन का केन्द्र एक ही है—मनुष्य, उसकी गरिमा और अन्याय से उसकी मुक्ति।
मार्क्स ने आधुनिक पूँजीवादी व्यवस्था की संरचना का विश्लेषण करते हुए बताया कि पूँजी केवल आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि मनुष्य के श्रम, सम्बन्धों और चेतना को भी नियन्त्रित करती है। उन्होंने यह समझाया कि सामाजिक संरचनाएँ शाश्वत नहीं होतीं; वे मनुष्यों द्वारा निर्मित होती हैं और इसलिए बदली भी जा सकती हैं। इसीलिए उनका चिन्तन आज भी आर्थिक असमानता, श्रम की असुरक्षा और बढ़ते कॉरपोरेट वर्चस्व के बीच प्रासंगिक बना हुआ है।
गाँधी ने आधुनिक सभ्यता की आलोचना एक अलग धरातल पर की। उनके लिए संकट केवल आर्थिक नहीं था, बल्कि नैतिक भी था। उन्होंने चेताया कि यदि विकास का केन्द्र मनुष्य के बजाय मशीन, उपभोग और केन्द्रीकृत सत्ता बन जाए तो समाज अपनी आत्मा खो देगा। स्वराज उनके लिए केवल राजनीतिक स्वतन्त्रता नहीं, बल्कि आत्मानुशासन, आत्मनिर्भरता, विकेन्द्रीकरण और नैतिक नागरिकता की प्रक्रिया थी। जलवायु संकट, पर्यावरण विनाश और सामाजिक विघटन के इस दौर में गाँधी के प्रश्न पहले से अधिक अर्थपूर्ण दिखाई देते हैं।
मार्क्स और गाँधी के बीच गहरे मतभेद हैं। मार्क्स वर्ग-संघर्ष और संरचनात्मक परिवर्तन की बात करते हैं, जबकि गाँधी नैतिक परिवर्तन और आत्मशुद्धि पर बल देते हैं। मार्क्स औद्योगिक विकास को ऐतिहासिक प्रक्रिया का हिस्सा मानते हैं, वहीं गाँधी मशीनवादी सभ्यता के प्रति सन्देह व्यक्त करते हैं। फिर भी दोनों के बीच एक साझा चिन्ता है—मनुष्य को साधन में बदल देने वाली व्यवस्था का विरोध और उसकी गरिमा की रक्षा।
यहीं प्रेमचन्द का महत्त्व और बढ़ जाता है। उन्होंने न तो कोई राजनीतिक दर्शन लिखा और न ही आर्थिक सिद्धान्त, लेकिन भारतीय समाज की आत्मा को जिस गहराई से उन्होंने देखा, वह उन्हें मार्क्स और गाँधी के बीच एक महत्त्वपूर्ण सेतु बना देता है। उन्होंने किसान, मजदूर, स्त्री, दलित, निम्न मध्यवर्ग और गाँव के जीवन को इस तरह चित्रित किया कि भारतीय समाज के अन्तर्विरोध पूरे यथार्थ के साथ सामने आते हैं।
‘गोदान’ का होरी केवल एक किसान नहीं, बल्कि उस समाज का प्रतीक है जहाँ श्रम करने वाला मनुष्य सबसे अधिक असुरक्षित है। प्रेमचन्द दिखाते हैं कि भारतीय समाज में आर्थिक शोषण जाति, पितृसत्ता, धार्मिक रूढ़ियों और सामाजिक प्रतिष्ठा की जटिल संरचनाओं से जुड़कर और भी कठोर हो जाता है। इसलिए भारतीय यथार्थ को केवल वर्ग की कसौटी पर नहीं समझा जा सकता।
प्रेमचन्द की रचनाएँ—’महाजनी सभ्यता’, ‘सद्गति’, ‘ठाकुर का कुआँ’, ‘कफन’, ‘पूस की रात’, ‘नमक का दारोगा’, ‘ईदगाह’, ‘बड़े घर की बेटी’, ‘पंच परमेश्वर’, ‘निर्मला’, ‘सेवासदन’, ‘रंगभूमि’, ‘कर्मभूमि’ और ‘गोदान’—आज भी इसलिए प्रासंगिक हैं कि वे हमें उस साधारण मनुष्य की दुनिया में ले जाती हैं, जो विकास, राष्ट्रवाद और राजनीति के बड़े आख्यानों में अक्सर अदृश्य रह जाता है। उनकी कहानियों और उपन्यासों में किसान, मजदूर, स्त्री, दलित, निम्न मध्यवर्ग, बच्चे और हाशिये पर खड़े समुदाय सिर्फ पात्र नहीं हैं, बल्कि वे भारतीय समाज के जरूरी प्रश्न बनकर उपस्थित होते हैं। उन्होंने बाजारवादी मानसिकता, सामन्ती वर्चस्व, धार्मिक पाखण्ड, नौकरशाही की संवेदनहीनता और सामाजिक असमानताओं की जिस गहराई से पड़ताल की, वह आज भी प्रासंगिक है।
प्रेमचन्द की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि वे विचार को जीवन के अनुभव में बदल देते हैं; इसलिए उनका साहित्य केवल करुणा नहीं जगाता, बल्कि अन्याय के विरुद्ध विवेक और प्रतिरोध की चेतना भी निर्मित करता है। प्रेमचन्द के साहित्य में गाँधी का प्रभाव भी दिखाई देता है। ग्रामीण जीवन, नैतिकता और स्वदेशी चेतना के अनेक सूत्र उनसे जुड़ते हैं। लेकिन प्रेमचन्द गाँव का रोमानीकरण नहीं करते। वे उसकी गरीबी, जातिगत विभाजन और स्त्री उत्पीड़न को भी उतनी ही निर्भीकता से सामने रखते हैं। उनकी धनिया जैसी स्त्रियाँ केवल करुणा की पात्र नहीं, बल्कि प्रतिरोध की सशक्त आवाज भी हैं।
आज का भारत अभूतपूर्व अन्तर्विरोधों से घिरा हुआ है। एक ओर तकनीकी विस्तार और आर्थिक विकास का उत्सव है, दूसरी ओर बेरोजगारी, किसान संकट, श्रम की असुरक्षा, सामाजिक ध्रुवीकरण और लोकतान्त्रिक संस्थाओं पर बढ़ता अविश्वास भी है। ऐसे समय में मार्क्स हमें आर्थिक संरचनाओं की आलोचना करना सिखाते हैं, गाँधी नैतिक विवेक और अहिंसा की याद दिलाते हैं, जबकि प्रेमचन्द मनुष्य की पीड़ा और उसकी जिजीविषा से हमारा परिचय कराते हैं।
भारतीय समाज की जटिलता को केवल किसी एक दृष्टि से नहीं समझा जा सकता। यहाँ वर्ग के साथ जाति, धर्म, लिंग और क्षेत्रीय असमानताओं का भी गहरा सम्बन्ध है। इसीलिए डॉ. भीमराव अम्बेडकर की उपस्थिति इस विमर्श को और व्यापक बनाती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सामाजिक लोकतन्त्र के बिना राजनीतिक लोकतन्त्र अधूरा है और जाति-आधारित असमानता भारतीय समाज की सबसे बड़ी चुनौती है। गाँधी की ग्राम-स्वराज की अवधारणा पर उनके प्रश्न और भारतीय जाति-यथार्थ की उनकी व्याख्या इस संवाद को और समृद्ध करती है।
निस्सन्देह, मार्क्स, गाँधी और प्रेमचन्द—तीनों अपने-अपने समय की ऐतिहासिक सीमाओं से मुक्त नहीं थे। लेकिन किसी विचारक या रचनाकार का महत्त्व उसकी त्रुटिहीनता में नहीं, बल्कि उन प्रश्नों में होता है जिन्हें वह समाज के सामने रखता है। यही कारण है कि प्रेमचन्द जयन्ती पर उन्हें केवल एक महान कथाकार के रूप में याद करना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें उस लेखक के रूप में भी पढ़ना होगा, जिसने भारतीय समाज की आत्मा में छिपे अन्याय, करुणा और परिवर्तन की सम्भावनाओं को शब्द दिये।
मार्क्स, गाँधी और प्रेमचन्द को साथ पढ़ना किसी वैचारिक समरूपता की तलाश नहीं, बल्कि आर्थिक न्याय, नैतिक राजनीति और मानवीय संवेदना के बीच एक आवश्यक संवाद स्थापित करना है। आज जब बाजार मनुष्य को उपभोक्ता में और लोकतन्त्र को केवल चुनावी प्रक्रिया में बदल देने का दबाव बढ़ा रहा है, तब इन तीनों की ओर लौटना महज अतीत की शरण में जाना नहीं, बल्कि भविष्य को अधिक न्यायपूर्ण, संवेदनशील और लोकतान्त्रिक बनाने की बौद्धिक यत्न है। किसी भी सभ्यता की वास्तविक कसौटी उसकी तकनीकी शक्ति या आर्थिक समृद्धि नहीं, बल्कि यह है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिक के साथ कैसा व्यवहार करती है। प्रेमचन्द का साहित्य हमें इसी कसौटी पर समाज और सत्ता दोनों का मूल्यांकन करना सिखाता है। इसलिए प्रेमचन्द आज भी केवल हिन्दी के महान कथाकार नहीं, बल्कि भारतीय लोकतन्त्र की मानवीय आत्मा और हमारे समय के सबसे विश्वसनीय नैतिक आवाजों में एक हैं।


