Year: 2025

सोने का धुंधलका, डालर का सच : सत्ता की राजनीति के साये में अर्थव्यवस्था

देश की राजनीतिक हलचल और चुनावी बयानबाजी के बीच मुद्रा बाजार में गंभीर उतार-चढ़ाव नजर आ रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपये की तेज गिरावट और सोने के भंडार को लेकर उठे सवालों पर न तो स्पष्ट संवाद हो रहा…

‘पेसा’ की पहल से बढ़ेगा जनजातियों का गौरव

लगभग तीन दशक पहले भारत की संसद ने आदिवासी इलाकों के लिए एक बेहद जरूरी कानून ‘पेसा’ पारित किया था। इसमें आदिवासी समाज को उनकी पारंपरिक स्वायत्तता और उसी के मुताबिक आसपास के संसाधनों को वापरने की अनुमति दी गई…

ब्राज़ील कोप सम्मेलन के मौके पर पर्यावणविद राजेंद्र सिंह की अमेज़न यात्रा

कोप सम्मेलन में अमेज़न संरक्षण पर निर्णायक कदम उठाने का आह्वान बेलेम (ब्राज़ील), 10 नवंबर । अमेज़न नदी की उपधारा बामो की अध्ययन यात्रा के दौरान विश्वप्रसिद्ध जल संरक्षण कार्यकर्ता, तरूण भारत संघ के संंस्‍थापक, पानी वाले बाबा के नाम…

बिहार चुनाव : जाति का वर्चस्व बनाम विकास और ‘पावरलेस’ की राजनीति’

बिहार, जिसे भारतीय लोकतंत्र की प्रयोगशाला कहा गया है, आज फिर एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। ऐतिहासिक राजनीतिक चेतना और आंदोलनों की भूमि होने के बावजूद, यहां चुनावी परिदृश्य अब भी जाति, वर्चस्व, बूथ प्रबंधन और पैसों के प्रभाव…

विश्वास से परिवर्तन की ओर भविष्य को गढ़ता विज्ञान

हर वर्ष 10 नवंबर को मनाया जाने वाला ‘शांति एवं विकास के लिए विश्व विज्ञान दिवस’ हमें याद दिलाता है कि भविष्य की चुनौतियों का समाधान विज्ञान की प्रगति और समाज के विश्वास पर आधारित है। यूनेस्को की इस वर्ष…

ब्राजील : जलवायु शिखर सम्मेलन कोप 30 और पृथ्वी की पुकार

ब्राजील के बेलेम शहर में जलवायु पर शिखर सम्मेलन COP30 शुरू हो रहा है, जिसमें 200 देशों के 50,000 से अधिक प्रतिनिधि शामिल होंगे। सम्मेलन 10 से 21 नवंबर तक चलेगा और इसका मुख्य उद्देश्य जलवायु परिवर्तन से निपटना है।…

हर अल्फ़ाज़ में जादू, हर तर्ज़ में एहसास — यही है उर्दू

प्रो. आरके जैन “अरिजीत” 9 नवंबर: विश्व उर्दू दिवस उर्दू… यह महज़ एक ज़ुबान नहीं, एक रूहानी धड़कन है — जिसमें मोहब्बत की महक है, अदब की नर्मी है, और इंसानियत की गर्माहट है। इस ज़ुबान के लफ़्ज़ होंठों से नहीं, दिल से निकलते हैं — जब कोई “जान-ए-मन” कहता है, तो उसकी आवाज़…

गांधी का ‘हिंद स्वराज’ : उथल-पुथल में उपयोगी

दुनिया के अधिकांश देशों में मची भीषण उथल-पुथल आमतौर पर लोकतंत्र के हवाले से की जा रही है। ऐसे में गांधी होते तो क्या कहते/करते? इंग्लेंड-अफ्रीका की अपनी जहाज-यात्रा में 116 साल पहले लिखी पुस्तिका ‘हिंद स्वराज’ में उन्होंने मौजूदा…

रेल सुरक्षा : सुधार की पटरियों पर कब चढ़ेगा सिस्टम?

भारत की रेल पटरियां देश की जीवनरेखा हैं, लेकिन बार-बार होने वाली दुर्घटनाएं इस तंत्र की सुरक्षा संस्कृति पर गंभीर सवाल उठाती हैं। बिलासपुर के लालखदान में मेमू ट्रेन और मालगाड़ी की टक्कर में 11 यात्रियों की मौत सिर्फ एक…

शिक्षा व्यवस्था : रट्टामार परीक्षा प्रणाली का रचनात्मक विकल्प

पीढियों से हमारे यहां परीक्षा की एकमात्र तरकीब वापरी जा रही है – सालभर रट्टा मारकर आखिरी कुछ दिनों में उसे उत्तर- पुस्तिकाओं में ‘उगलते’ रहने की, लेकिन क्या इससे विद्यार्थियों में प्रतिभा, समझ और रचनात्मकता विकसित होती है? यदि…