महात्मा गांधी ने अपने विचारों के क्रियान्वयन के लिए अनेक संस्थाओं का निर्माण किया था। 48 में, उनके जाने के बाद सभी को मिलाकर दो प्रमुख संस्थाएं बनाई गईं, परन्तु आज इन संस्थाओं के क्या हाल हैं? क्या आज भी…
2 अक्टूबर : गांधी जयंती पिछले महीने गांधी-विचार के एक और महत्वपूर्ण केन्द्र, वाराणसी के ‘राजघाट’ को सरकार की शह पर नेस्त-नाबूद कर दिया गया है। ऐसे समय में जब देश-दुनिया को गांधी-विचार की सर्वाधिक जरूरत थी, इस केन्द्र का…
24 सितम्बर 1969 को शुरु हुई ‘राष्ट्रीय सेवा योजना’ National Service Scheme (एनएसएस) राष्ट्र की युवाशक्ति के व्यक्तित्व विकास हेतु एक सक्रिय कार्यक्रम है जिसने अपने आधी सदी से अधिक के जीवन में अनेक उल्लेखनीय सफलताएं हासिल की हैं। प्रस्तुत…
राष्ट्रपिता की एक बार फिर हत्या की जा रही है। पहले उनके शरीर का नाश किया गया। फिर उनके आश्रमों और उनकी स्मृतियों से जुड़े प्रतीकों पर हमला किया गया। अब उन्हें मुग़लों के साथ-साथ इतिहास और पाठ्यपुस्तकों से या…
रोजमर्रा के आमफहम जीवन को फिलहाल छोड भी दें तो महात्मा गांधी की ‘जयन्ती’ और ‘पुण्यतिथि’ की सालाना कवायद पर हम आम लोग कैसा महसूस करते हैं? ‘सप्रेस’ ने यही सवाल अपने एक वरिष्ठ साथी से किया। प्रस्तुत है, अपने…
हमारे समय की बदहाली से निपटने में महात्मा गांधी और उनके सिद्धांन्त एक कारगर औजार हो सकते हैं। हिंसा, आपसी वैमनस्य, गला-काट प्रतिस्पर्धा, साम्प्रदायिक कटुता आदि से निपटने और उनके सामने सीधे खडे हो पाने में गांधी के विचार ही…
महात्मा गांधी ने आजाद भारत के लिए कई तरह की योजनाओं, कार्यक्रमों और नीतियों की कल्पना की थीं, लेकिन दुर्भाग्य से वे आजादी के साढे पांच महीनों में ही हम से सदा के लिए विदा हो गए। बाद में उनके…
पूंजी के शिखर पर विराजी, शीतल-पेय बनाने वाली कंपनी ‘पेप्सीको’ की सीईओ इंद्रा नूई ने हाल में अपने एक साक्षात्कार में लगभग उन्हीं चिंताओं को साझा किया है जिनके बारे में महात्मा गांधी लगातार चेतावनी देते रहते थे। फर्क सिर्फ…
जातियों, धर्मों, लिंगों और वर्गों में विभाजित हमारे समाज में क्या दंगे यूं ही, बे-वजह या तात्कालिक वजहों से हो जाते हैं? या फिर कईयों के सतत प्रयासों, कारनामों से इन्हें अंजाम दिया जाता है? क्या आपस की मारामार में…
इतिहास के इस दौर में गांधी और उनके विचार सर्वाधिक आलोचना और समीक्षा झेल रहे हैं। शायद यह इसलिए भी है कि आज दुनियाभर को गांधी को अनदेखा कर पाना कठिन हो गया है। बीसवीं और इक्कीसवीं सदी में दुनिया…