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45 वर्ष बाद नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण (नर्मदा अवार्ड) की अब पुनर्समीक्षा संभव, राष्ट्रीय विस्थापित पुनर्वास आयोग गठित करने की सिफारिश : जन आयोग

इंदौर प्रेस क्लब में रिपोर्ट जारी; कहा- सभी विस्थापितों को मिले न्यायपूर्ण पुनर्वास

इंदौर, 1 अगस्त। नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण (नर्मदा अवार्ड) के 45 वर्ष पूरे होने के बाद अब सरदार सरोवर परियोजना की व्यापक और निष्पक्ष समीक्षा का समय आ गया है। स्वतंत्र एवं निष्पक्ष ‘जन-आयोग’ ने शनिवार को इंदौर प्रेस क्लब में जारी अपनी रिपोर्ट में कहा कि दिसंबर 2025 में नर्मदा अवार्ड के 45 वर्ष पूरे हो चुके हैं। ऐसे में परियोजना के सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभावों का नए सिरे से मूल्यांकन किया जाना चाहिए। आयोग ने साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर एक स्वतंत्र एवं जवाबदेह “राष्ट्रीय विस्थापित पुनर्वास आयोग” गठित करने की सिफारिश की है, जो देशभर की बड़ी विकास परियोजनाओं में पुनर्वास, पर्यावरणीय दायित्वों तथा परियोजनाओं की लागत और लाभ की नियमित समीक्षा कर जवाबदेही सुनिश्चित करे।

रिपोर्ट का विमोचन इंदौर प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस वार्ता में किया गया। इस अवसर पर जलबिरादरी (महाराष्ट्र) के नरेंद्र चुग सहित विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि उपस्थित थे। जन आयोग का गठन जल बिरादरी (महाराष्ट्र), डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट (ओडिशा) और हिमधारा (हिमाचल प्रदेश) द्वारा किया गया था। आयोग की अध्यक्षता सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति अंजना प्रकाश ने की, जबकि मानवाधिकार विशेषज्ञ इनाक्षी गांगुली और पर्यावरण शोधकर्ता डॉ. गोर्की चक्रवर्ती इसके सदस्य रहे।

आयोग की अध्यक्षता सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति अंजना प्रकाश एवं जल बिरादरी के नरेंद्र चुग ने बताया कि उसने अगस्त 2025 में मध्यप्रदेश के धार और बड़वानी जिलों सहित नर्मदा घाटी के 14 स्थानों का दौरा किया। आयोग ने डूब प्रभावित गांवों, पुनर्वास स्थलों तथा मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के आदिवासी, किसान, मजदूर, मछुआरे, नाविक और अन्य प्रभावित समुदायों की सुनवाई की। इसके अलावा सरकारी अभिलेखों, न्यायालयों के आदेशों, शोध अध्ययनों और विभिन्न संगठनों द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों का अध्ययन कर यह रिपोर्ट तैयार की गई।

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लाभ के दावों और धरातल की स्थिति में बड़ा अंतर

रिपोर्ट के अनुसार सरदार सरोवर परियोजना से जुड़े कई मूल वादे आज भी पूरे नहीं हुए हैं। नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण के निर्णय के 45 वर्ष बाद भी गुजरात, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के अनेक क्षेत्रों को सिंचाई, पेयजल और बिजली का अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका है। गुजरात में लगभग 5000 किलोमीटर नहर निर्माण अभी भी अधूरा है। कच्छ और सौराष्ट्र जैसे सर्वाधिक जरूरतमंद क्षेत्रों तक पर्याप्त पानी नहीं पहुंच पाया, जबकि बड़े शहरों और औद्योगिक इकाइयों को अपेक्षाकृत अधिक जल उपलब्ध कराया गया।

हजारों परिवार अब भी पुनर्वास से वंचित

रिपोर्ट में कहा गया है कि तीनों राज्यों में 50 हजार से अधिक परिवारों का पुनर्वास होने के बावजूद मध्यप्रदेश के हजारों तथा महाराष्ट्र और गुजरात के सैकड़ों परिवार अब भी पूर्ण पुनर्वास से वंचित हैं। अनेक पुनर्वास स्थलों पर पेयजल, सड़क, स्वास्थ्य केंद्र, निकासी व्यवस्था, चरागाह और श्मशान जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। आयोग ने इसे नर्मदा न्यायाधिकरण के निर्णय, पुनर्वास नीति और न्यायालयों के आदेशों का उल्लंघन बताया है।

रिपोर्ट में मध्यप्रदेश के 15,946 परिवारों का विशेष उल्लेख करते हुए कहा गया है कि बैकवॉटर लेवल के पुनर्निर्धारण के कारण उन्हें पुनर्वास लाभों से वंचित कर दिया गया। इनमें से अनेक परिवार वर्षों से अस्थायी टीनशेड, सरकारी भवनों या क्षतिग्रस्त मकानों में रहने को विवश हैं। वर्ष 2023 की बाढ़ ने भी बैकवॉटर निर्धारण की गंभीर खामियों को उजागर किया।

भ्रष्टाचार और पर्यावरणीय दायित्वों पर भी सवाल

जन आयोग ने पुनर्वास प्रक्रिया में सामने आए भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई नहीं होने पर भी चिंता जताई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मध्यप्रदेश में झा आयोग द्वारा अनेक अधिकारियों और कर्मचारियों को दोषी ठहराए जाने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।

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पर्यावरणीय पक्ष पर आयोग का कहना है कि वैकल्पिक वनीकरण, जलग्रहण क्षेत्र उपचार और अन्य क्षतिपूरक उपाय अपेक्षित स्तर पर नहीं किए गए। नर्मदा नदी में अवैध रेत खनन, औद्योगिक प्रदूषण और शहरी अपशिष्ट से नदी तथा जलाशय की स्थिति लगातार बिगड़ रही है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि परियोजना के आर्थिक मूल्यांकन में पुनर्वास, पर्यावरण और सामाजिक लागतों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। इसलिए इसकी वास्तविक लागत और लाभ का स्वतंत्र पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है।

जन आयोग की प्रमुख सिफारिशें

जन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण सिफारिशें की हैं, जिनमें प्रमुख हैं—

  • नर्मदा अवार्ड के 45 वर्ष पूरे होने के बाद सरदार सरोवर परियोजना की व्यापक एवं निष्पक्ष पुनर्समीक्षा कराई जाए।
  • किसी स्वतंत्र संस्था से परियोजना की वास्तविक आर्थिक लाभ-हानि का पुनर्मूल्यांकन कराया जाए।
  • परियोजना से प्रभावित प्रत्येक पात्र परिवार का कानून और न्यायालयों के आदेशों के अनुरूप पूर्ण एवं न्यायपूर्ण पुनर्वास सुनिश्चित किया जाए तथा पुनर्वास से बाहर रह गए सभी परिवारों को शामिल किया जाए।
  • सभी पुनर्वास स्थलों पर पेयजल, सड़क, स्वास्थ्य, निकासी, चरागाह सहित सभी बुनियादी सुविधाएं तत्काल उपलब्ध कराई जाएं।
  • नई परियोजनाओं से पहले लंबित पुनर्वास कार्य पूरे किए जाएं तथा नर्मदा बेसिन की नई लिंक परियोजनाओं पर स्थानीय समुदायों की सहमति के आधार पर पुनर्विचार किया जाए।
  • राष्ट्रीय स्तर पर एक स्वतंत्र एवं जवाबदेह “राष्ट्रीय विस्थापित पुनर्वास आयोग” का गठन किया जाए, जो पुनर्वास, पर्यावरणीय दायित्वों, परियोजनाओं की लागत, लाभ और वित्तीय प्रबंधन की सतत निगरानी और समीक्षा करे। आयोग ने कहा कि भविष्य में किसी भी बड़ी परियोजना की स्वीकृति से पहले पुनर्वास और पर्यावरणीय कार्यों के लिए पर्याप्त वित्तीय प्रावधान सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
  • नर्मदा नदी में अवैध रेत खनन तत्काल रोका जाए, प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण हो तथा स्थानीय आदिवासियों के अधिकार सुरक्षित किए जाएं।
  • कच्छ और सौराष्ट्र जैसे वास्तविक जरूरतमंद क्षेत्रों तक मूल योजना के अनुरूप सिंचाई और पेयजल पहुंचाया जाए।
  • बड़े पैमाने पर विस्थापन और पर्यावरणीय क्षति पहुंचाने वाली विकास परियोजनाओं की अवधारणा पर पुनर्विचार करते हुए विकेंद्रीकृत, लोकतांत्रिक और स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर आधारित विकास मॉडल अपनाया जाए।
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प्रेस वार्ता में वक्ताओं ने कहा कि यह रिपोर्ट केवल सरदार सरोवर परियोजना का आकलन नहीं है, बल्कि देश में विकास, विस्थापन, पुनर्वास और पर्यावरणीय न्याय से जुड़ी नीतियों की व्यापक समीक्षा का अवसर भी प्रदान करती है। उन्होंने केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों से रिपोर्ट की सिफारिशों पर गंभीरता से विचार कर प्रभावित समुदायों के साथ न्याय सुनिश्चित करने की अपील की।

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