समाज

नगर नियोजन का नजरिया : बुच साहब के बहाने भोपाल

जिस तेजी से शहरों के विकास हो रहे हैं, उसने नगर-नियोजन की अहमियत कई गुना बढ़ा दी है। इसमें उस आबादी का खास महत्व है जो आसपास के गांव-खेडों से रोजगार की आस में शहरों की तरफ खिंची चली आती…

बुलडोजर न तो कानून है, न कोर्ट है और न संविधान है : मेधा पाटकर

सर्व सेवा संघ के परिसर को जमींदोज करने के खिलाफ चल रहा सौ दिनी सत्याग्रह के 89वें दिन पूर्ण वाराणसी, 8 दिसंबर। सर्व सेवा संघ के राजघाट परिसर को वाराणसी एवं नॉर्दर्न रेलवे द्वारा षडयंत्र पूर्वक कब्जा कर अधिकांश भवनों…

भोपाल गैस त्रासदी : 40 साल की जद्दोजेहद

आज़म खान दुनिया की भीषणतम औद्योगिक त्रासदी से चार दशक पहले निपटने वाले भोपाल में इसे लेकर आज क्या हो रहा है? क्या सरकारों, सेठों और समाज ने अपनी-अपनी जिम्मेदारी सलीके से निभाई है? प्रस्तुत है, इसी की पड़ताल करता…

वेपराइजेशन ऑफ़ हिंदू फेस्टिवल : त्यौहारों के तनाव

हमारे यहां त्यौहार सदियों से आपसी मेल-जोल और सामूहिक आनंद के प्रतीक रहे हैं और आमतौर पर इन्हें धर्म की बजाए क्षेत्रीय विशेषताओं के आधार पर मनाया जाता है। बंगाल में दुर्गा-पूजा या गुजरात में नवरात्रि धर्म की बजाए स्थानीयता…

स्‍मरण : अन्न परंपरा के लिए जूझ रहा था – देबजीत सरंगी

आज के खाऊ-उडाऊ विकास के सामने कई लोग अपनी परम्पराओं, पद्धतियों को लेकर निष्ठा से डटे हैं। उनमें से एक देबजीत सरंगी भी थे। पिछली मई में करीब 54 साल की उम्र में उनका सदा के लिए विदा होना दुखद…

“हमारे बुजुर्ग हमारा सम्मान” सामुदायिक रेडियो कनेक्ट एफएम 107.8 पर नई रेडियो श्रृंखला

दिल्ली। वरिष्ठ नागरिकों को सशक्त बनाने और उन्हें सम्मानित जीवन प्रदान करने की दिशा में सामुदायिक रेडियो कनेक्ट एफएम 107.8 (एस एम सहगल फाउंडेशन की एक पहल) पर  सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय और सामुदायिक रेडियो एसोसिएशन के सहयोग से…

गांधीवादी मूल्यों और विचारों को साकार करने में राधाकृष्ण जी के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता

केएस राधाकृष्ण जन्म शताब्दी समारोह राधाकृष्णजी एक समर्पित गांधीवादी थे, जिन्होंने उदार विचारों वाले लोगों को परस्पर मिलाकर हर काम को आसान बनाया। वे महान विचारक और दूरदर्शी व्यक्ति थे। वे सभी तरह की समस्याओं का समाधान गांधीवादी नजरिए से खोजते थे और अपने…

प्रजा के हित में प्रजातंत्र

अपनी शुरुआत में भले ही प्रजातंत्र ने गहरी असहमतियां झेली हों, लेकिन धीरे-धीरे वह एक ऐसी शासन-प्रणाली बन गया जिसके बिना दुनिया के अधिकांश देश अपने काम-काज नहीं चला पाते। जिन देशों में प्रजातंत्र नहीं है वहां उसे लाने के…

दीपावली की दहशत : पटाखे और प्रदूषण

हमारे यहां त्यौहारों का ताना-बाना कृषि-चक्र से गहरा जुडा है। मसलन इन दिनों खरीफ की फसलों के आने और रबी की फसलों के इंतजार के अंतराल में दीपावली मनाई जाती है। बाजारों से लदी-फंदी आज की उत्सव-धर्मिता ने इस प्राकृतिक…

देसी दीपावली की अहमियत 

हमारे देश में सभी त्यौहार खेती-किसानी से सीधे जुड़े रहे हैं, लेकिन हाल के वर्षों में बाजारों की आमद ने इन्हें उपभोग के रंग-बिरंगे बाजारू अवसरों में तब्दील कर दिया है। अब कोई अपने त्यौहारों तक पर कृषि की सुध…