ताजा आलेख

हैसियत खोती ‘सिविल सोसायटी’

‘सिविल सोसाइटी’ के बढ़ते ‘संस्थानीकरण’ के दौर में काम को ‘सुव्यवस्थित’ रूप से करने का चलन बढ़ा है। इसका अर्थ यह है कि ‘सिविल सोसाइटी’ अब एक सुरक्षित माहौल में काम करना चाहती है, पर दबे-कुचलों की आवाज़ उठाना सुरक्षित…

‘गुना’ से फिर गूंजी, पुलिस-सुधारों की बात !

देशभर में आए दिन पुलिस वालों के कारनामे उजागर होते रहते हैं और यदि बवाल न मचे तो ठंडे भी पड जाते हैं, लेकिन क्‍या पुलिस की मौजूदा बनक में ये कारनामे कोई अजूबा माने जा सकते हैं? क्‍या किसी…

राजनीति से रुसवाई के स्वयंसेवी पडाव

राजनीति से रुसवाई की एक और कमजोरी अपने समाज को कम-से-कम जानने के रूप में उभरती है। यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि अधिकांश ‘एनजीओ’ अपने आसपास रहने, गुजर-बसर करने वाले समाज को न्यूनतम जानते हैं। समाज-कार्य में लगे…

जी. डी. अग्रवाल के बलिदान को कैसे स्मरण करेगें?

जन्म दिवस (20 जुलाई) स्मरण प्रसंग प्रोफेसर जी डी अग्रवाल गंगा को अविरल और निर्मल बनाने के लिए प्रतिबद्ध संत थे. उन्हें स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद के नाम से भी जाना जाता था. आईआईटी का यह एक प्रोफेसर था, जिसे…

घुमावदार लोकतंत्र जनता की भावना समझता ही नहीं

घुमावदार लोकतंत्र के रेत में से तेल निकालने वाले बिन पेंदी के महारथी विधायक जब इस्तीफा देकर मंत्री बन कर दोबारा चुनाव में आते हैं तो अपनी विचारधारा में परिवर्तन के ऐसे-ऐसे कुतर्क जनता के सामने रखते हैं, की जनता…

आसान नहीं ऑनलाइन पढ़ना-पढ़ाना

शिक्षा अकादमिक विषयों की पढ़ाई तक सीमित होकर रह गयी है| खेल-कूद, और हॉबी क्लासेज के लिए ऑनलाइन पढ़ाई में कोई जगह नहीं रह गयी है| अब बच्चा संगीत कैसे सीखेगा बच्चा, खेल-कूद की बारीकियां कहाँ से सीखेगा, पेंटिंग और…

घुमक्कड़ी का आनन्द

आजकल हमारे रोजमर्रा के जीवन में सुबह की सैर एक जरूरी क्रिया हो गई है, लेकिन क्‍या इसी घुमक्‍कडी को जीवन के व्‍यापक आनंद और ज्ञानार्जन में तब्‍दील किया जा सकता है ? संत विनोबा और आदि शंकराचार्य ने इसी…

सचिन पायलट का विद्रोह तो वास्तव में राहुल के ख़िलाफ़ है !

इसे अतिरंजित प्रचार माना जा सकता है कि सचिन की समस्या केवल गेहलोत को ही लेकर है। उनकी समस्या शायद राहुल गांधी को लेकर ज़्यादा बड़ी है। राहुल का कम्फ़र्ट लेवल या तो अपनी टीम के उन युवा साथियों के…

निजी कोल खनन के विरोध से लोक जुम्बिश की शुरूआत

राजेंद्र सिंह लोकतंत्र में जब ’तंत्र’ ही ’लोक’ के विरोध में खड़ा हो जाता है, तो लोक भी संगठित होकर अपने को मजबूत बना लेता है। लेकिन सरकार ने यह काम एक महामारी के दौरान किया है; जिसमें सामाजिक दूरियों…

एनजीओ की बढती अप्रासंगिकता

‘सेवा,’ ‘विकास,’ ‘राजनीतिक प्रशिक्षण’ और ‘गैर-दलीय राजनीति’ के इन विभिन्‍न सोपानों से गुजरे और मौजूदा भेडियाधसान में ‘एनजीओ’ पुकारे जाने वाले इन व्‍यक्तियों, समूहों के बीच समझ, तेवर और उद्देश्‍यों को लेकर गहरी भिन्‍नता रही है। अव्‍वल तो, परिभाषा से…