‘गुना’ से फिर गूंजी, पुलिस-सुधारों की बात !

अभिलाष खांडेकर

देशभर में आए दिन पुलिस वालों के कारनामे उजागर होते रहते हैं और यदि बवाल न मचे तो ठंडे भी पड जाते हैं, लेकिन क्‍या पुलिस की मौजूदा बनक में ये कारनामे कोई अजूबा माने जा सकते हैं? क्‍या किसी भी आम-फहम गफलत पर जरूरत से ज्‍यादा हिंसा और बडी-बडी हरकतों पर मौन या अनदेखी मौजूदा पुलिस की बुनियाद में ही नहीं है? तो क्‍या अब वह वक्‍त नहीं आ गया है जब हमें पुलिस-सुधार पर गंभीरता से ध्‍यान देना चाहिए? प्रस्‍तुत है, इसी विषय की गहरी पडताल करता अभिलाष खांडेकर का यह लेख.

पिछले कई दशकों से इस देश की आम जनता ‘पुलिस सुधार’ नामक झुनझुने की आवाज़ सुन रही है। सुन क्या रही है, सुन-सुन कर अब उक्ता चुकी है और नाराज़ भी है, किंतु सरकार और पुलिस के सामने निरीह जनता अपने आप को असहाय भी पाती है।

मध्यप्रदेश में पुलिस को लेकर हाल ही में जो तीन बड़ी घटनायें एक-के-बाद-एक तेज़ी से घटीं, उससे पुलिस सुधार पर एक़ बार पुनः फ़ोकस आना लाज़मी है। बहस भी ज़रूरी है। यद्यपि उन घटनाओं का आपस में कोई सीधा सम्बंध नहीं था, जनता के दृष्टिकोण से और प्रजातंत्रीय मूल्यों के रक्षण हेतु भी उन सभी पहलुओं पर चर्चा महत्वपूर्ण है जो इन घटनाओं से जुड़े हैं। उन्हें देश के तथाकथित पुलिस सुधारों से भी जोड़कर देखा जाना समय की माँग है।

पहली घटना थी, उत्तरप्रदेश के ख़तरनाक गुण्डे विकास दुबे की उज्जैन में हुई नाटकीय गिरफ़्तारी और महज़ 24 घंटे में उत्तरप्रदेश पुलिस द्वारा किया गया उसका ‘एन्काउन्‍टर।’ दूसरी, गुना में एक ग़रीब किसान दम्पती पर पुलिस का बर्बर हमला और तीसरी, प्रदेश के बहुत बड़े पुलिस अफ़सर का वह वीडीओ जिसमें वे उज्जैन में अपने लम्बे कार्यकाल के दौरान मातहतों से (शायद) पैसे के लिफ़ाफ़े लेते दिखाई दे रहे हैं। सरकार ने उन्हें ग्वालियर से रातों-रात एक ‘सज़ा’ के बतौर भोपाल पुलिस मुख्यालय स्थानांतरित कर जनता की वाहवाही लूटने का असफल प्रयास किया। संभवत: मुख्यमंत्री या गृहमंत्री से निकटता के चलते वे किसी कड़ी और बड़ी सज़ा से फ़िलहाल बच गये। यदि ऐसा ही कोई वीडीओ नगर निगम या वन विभाग के किसी छोटे बाबू का होता तो क्या वह तत्काल निलंबित ना हो जाता? ख़ैर, इसे अभी लोकायुक्त पर या सीबीआई पर छोड़ते हैं, क्योंकि कुछ तकनीकी कारणों के चलते वे इस प्रकरण से बच भी सकते हैं, किंतु इस घटना ने पुलिस की छवि को बेहद धूमिल कर दिया है।

समाज में भिन्न-भिन्न क़िस्म के गुंडातत्वों को क़ानून के ज़रिए नियंत्रण में रखने या यूँ कहिये कि ठीक करने के लिये पुलिस की आवश्यकता अनादि काल से चली आ रही है। क़ानून-प्रिय व सभ्य नागरिकों को पुलिस की उपस्थिति से मिलने वाला अदृश्य संरक्षण किसी भी अच्छे समाज के लिये उतना ही ज़रूरी है जितना क़ानून तोड़ने वाले गुनाहगारों में पुलिस का ख़ौफ़। गुनाहगारों में बलात्कारी, चोर-उचक्‍के, लोगों की जान लेने वाले जघन्य अपराधी, दूसरे आदतन बदमाश, तस्कर, साइबर गुनहगार, आर्थिक अपराधी, बलवा करने या करवाने वाले समाज के दुश्मन, रिश्वतख़ोर इत्यादि अनेक प्रकार के शातिर शामिल हैं और रहेंगे। इनसे लगातार लड़ने हेतु सक्षम पुलिस तंत्र की आवश्यकता पर कोई दो मत नहीं होंगे, किन्तु पुलिस प्रशासन को मानवीयता से भी काम करना होगा, ठीक वैसे ही जैसे क़ोरोना के गम्भीर दौर में अपनी जान हथेली पर रखकर पुलिस जवानों और बड़े अधिकारियों ने बेहतर तरीक़े से कर दिखाया था।

अलबत्‍ता, एक प्रश्न जिसे मैं गम्भीरता से यहाँ उठाना चाहता हूँ वो यह है कि क्या ब्रितानी क़ानून (द पुलिस ऐक्ट-1861) को बदलने की भरपूर (असफल) कोशिशों के पश्चात, मॉडल पुलिस ऐक्ट – 2015 की लम्बी बहस के बाद, पुलिस और समाज के रिश्तों में क्या अपेक्षित ठोस सुधार वाक़ई हो पाए हैं? सुधारों का उद्देश्य पुलिस को पेशेवर बनाना था, समाज के प्रति जवाबदेह बनाना था और राजनीतिक हस्तक्षेप से रोधित करना था। यदि अपेक्षित सुधार हुए होते तो गुना जैसी बर्बर घटना सम्भव थी क्या? असली गुनहगार, जिसने सरकारी ज़मीन पर अवैध क़ब्ज़ा कर रखा था उस दबंग गब्बू पारधी के बजाए ग़रीब किसान परिवार की बेरहमी से हुई पुलिसिया पिटाई कैसे मान्य हो सकती है? उस दंपति को जैसे पीटा गया वैसे तो ‘पत्रकार’ प्यारे मियाँ को ठोकना था, पर पुलिस उसे हवाई सफ़र करवाती, श्रीनगर से भोपाल पकड़ कर लाई। उसे किसी ने ज़ोरदार चांटा भी जड़ा हो, सुनने में नहीं आया। गुना की घटना से मैं उद्वेलित इसलिए हूँ क्योंकि स्थानीय पुलिस ने उनके पास अपराध अनुसंधान का भरपूर समय होने के बावजूद असली अतिक्रमणकर्ता के ख़िलाफ़ पेशेवर तरीक़े से तफ़तीश करना छोड़, ग़रीब किसान-दम्पती को डंडों से मार-मार कर अपनी ‘शक्ति’ और क़ानूनी अधिकारों का वीभत्स प्रदर्शन किया जो क़तई ज़रूरी नहीं था। कहा जाता है कि घटनास्थल पर एक महिला कॉस्टेबल पर हुए सीधे शारीरिक हमले से गुस्साई पुलिस ने फिर सबकी जमकर धुलाई कर दी। पर मूल प्रश्न अनुत्तरित ही है कि क्या गुना ज़िले के कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक और पूरे अमले को यह सामान्य-सी जानकारी भी नहीं थी कि गब्बू पारधी कौन है, उसकी ज़िले में क्या अवैध गतिविधियाँ हैं? यदि पुलिस में इतनी ताक़त थी जो किसान दम्पती को मारने में दिखाई तो उसे क़ानूनन, गब्बू के ख़िलाफ़ प्रयोग में लाना था। बताया जाता है कि ‘रासुका’ के तहत उस पर मामला दर्ज करने में, कांग्रेस के कतिपय नेताओं के डर से, ज़िलाधीश टालमटोल कर रहे थे। मैं यहाँ उस ग़रीब दंपति की जाति का अपरोक्ष उल्लेख भी एक अपराध मानता हूँ। ज़ाति के चश्मे से ऐसे अपराधों को देखना राजनेताओं का शौक़ हो सकता है, जिसका समर्थन भी अपराध की परिधि में ही रखा जाना ज़्यादा उचित होगा। अन्यत्र भी, बिना अनुसंधान किए, रिपोर्ट लिख लेना, थानेदारों के लिये आम बात है, उससे ‘उगाही’ जो आसान हो जातीं है।

ख़ैर, बात हो रही थी पुलिस सुधार की और उसके ज़रिए सम्भव होने वाले पुलिस और समाज के बेहतर तालमेल व रिश्तों की। स्वतंत्र भारत में पुलिस सुधार की दिशा में कई ठोस क़दम उठाये गए जिनमें जनता पार्टी द्वारा 1977 में किए गए पुलिस कमीशन का गठन या प्रकाश सिंह (पूर्व पुलिस महानिदेशक, उत्तरप्रदेश) द्वारा 1996 में उच्चतम न्यायालय में दाख़िल जनहित याचिका और उस पर दिया गया 2006 का निर्णय या समय-समय पर गठित उच्चस्तरीय समितियाँ जैसे (जूलियस रिबेरो समिति, पद्मनाभैया समिति या सोली सोराबजी समिति) और उनकी अनुशंसाएँ या सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय शामिल हैं। सर्वोच्‍च न्यायालय के निर्णय (2006) के मुताबिक़, पुलिस सुधार के 6-7 प्रमुख बिंदु थे जिनको कुछ राज्यों ने माना, कईयों ने अपनी-अपनी दलीलें देकर उसे कमज़ोर कर दिया।

सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार सारे राज्यों को क़ानून व्यवस्था और अपराध अनुसंधान को अलग-अलग विभागों में बाँटकर रखना चाहिए। यह महत्वपूर्ण अनुशंसा थीं। मध्यप्रदेश और देश के अन्य राज्यों में यह व्यवस्था लागू ही नहीं हो सकी। मुख्य कारण रहा – ज़रूरी, प्रशिक्षित बल की कमी और बजट का अभाव।

दूसरी अनुशंसा थी कि पुलिस महानिदेशक को बहुतेरा अनुभव होना चाहिए, उसे ईमानदार होना चाहिये एवं उसे पूरे दो वर्ष काम करने का मौक़ा होना चाहिए। सन् 2006 के बाद यदि उसका पालन हुआ है तो वह मार्च 2020 में, शायद पहली बार श्री विवेक ज़ौहरी की मध्‍यप्रदेश के पुलिस महानिर्देशक के रूप में नियुक्ति के साथ हुआ है।

पुलिस शिकायत प्राधिकरण एवं राज्य स्तरीय सुरक्षा कमीशन भी बनाने की बातें उसी आदेश का हिस्सा रहीं हैं। पुलिस का कम बजट, रिक्त पदों को भरना इस पर भी अन्यत्र ज़ोर दिया गया है, किंतु परिणाम सिफ़र रहा। संविधान के तहत पुलिस राज्य सरकार के आधीन होती है, किंतु आईपीएस अधिकारियों को केंद्र सरकार का गृह मंत्रालय नियंत्रित करता है। इसके फ़ायदे और नुक़सान दोनों हैं।

पुलिस तंत्र को आधुनिक बनाने, बेहतर हथियार से फ़ोर्स को लैस करने, नित नये प्रशिक्षण हेतु योजनाएँ, जवानों को रहने हेतु अच्छे मकान, उनका वेतन, पुलिस को राजनीतिक दबाव से मुक्त रखने की बातें भी समय-समय पर पिछले कई वर्षों में हुईं हैं, उनमें से कुछ कार्यान्वित भी हुईं हैं, किंतु इन सभी का सीधा लाभ जनता को मिलता नहीं दिखा। इस सच्चाई से मुँह छुपाना ग़लत होगा, क्योंकि गुना जैसे कई उदाहरण अभी और सामने आएँगे और सरकार उसका सामना नहीं कर सकेगी।

अब अंतिम बात ….भारी-भरकम वेतन मिलने के बाद भी एक एडीजी स्तर का अफ़सर खुले आम लिफ़ाफ़े लेता दिखता है, उसे क्या कहा जाय? हमारी व्यवस्था कितनी सड़-गल चुकी है यह एकबारगी पुनः जनता के सामने स्पष्ट दिखाई दिया है जो ना सिर्फ़ शर्मनाक है, सरकार की सोच को भी दर्शाता है। ट्रॉन्‍सपोर्ट कमिशनर का पद भ्रष्टाचार से सीधा सम्पर्क वाला वह सेतु है जो अफ़सर और मुख्यमंत्री को जोड़ता हैं। यह सर्व विदित है, कोई मुख्यमंत्री इससे मुँह नहीं मोड़ सकता है। मेरी जानकारी में कोई ईमानदार अधिकारी इस पद पर किसी भी सरकार ने कभी नियुक्त नहीं किया। पुलिस में भरपूर भ्रष्टाचार है और उसे सत्ताधारी लोग पालते-पोसते हैं।

यदि सेवानिवृत्ति के पहले बड़ी पोस्टिंग की लालसा है तो अफ़सर, मातहतों से और जनता से पैसे तो ऐंठेंगे ही, ऊपर जो पहुँचाना होते हैं। लगभग, हर ट्रॉन्‍सपोर्ट कमिशनर जनता और पत्रकारों की नज़रों में अपार श्रेणी का भ्रष्ट ही मिलता है। ईमानदार परिवहन आयुक्त जैसी कोई जादुई वस्तु मध्यप्रदेश में या अन्य राज्यों में देखने को मिले, तो बताइएगा ज़रूर।

भोपाल में ही 2010-11 की बात है, प्रशासनिक सेवा के बड़े अधिकारी अरविंद जोशी और उनकी पत्नी टीनू जोशी को आयकर विभाग ने धर दबोचा था। दोनों को आईएएस से हाथ धोना पड़ा था। मामला घोर भ्रष्टाचार का ही था, किंतु पुलिस विभाग का एक आला अफ़सर अपने ही लोगों द्वारा रंगे हाथों धरा जाएगा, यह शायद किसी ने सोचा नहीं होगा। कई बार लगता है कि पुलिस सुधार की बजाए अफ़सर अपने सुधार में काफ़ी मुस्तैद हैं। अब यह हक़ीक़त पुनः दुनिया के सम्मुख आ चुकी है। गेंद अब मुख्यमंत्री के पाले में है। देखिए आगे क्या होता है, अगर होता है तो ! (सप्रेस)

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