किसी राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय महत्व के मुद्दे पर आम लोगों का ध्यान आकर्षित करने की गरज से ‘दिवस’ घोषित किए जाते हैं। करीब तेरह साल पहले 21 मार्च को इसीलिए ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ ने ‘विश्व वानिकी दिवस’ घोषित किया था। अब…
आधुनिक विकास के नाम पर जिन ‘भस्मासुरों’ को बनाया, बढ़ाया जा रहा है, प्लास्टिक उनमें से एक है। कुल-जमा सौ-सवा सौ साल पहले ईजाद किया गया यह कारनामा आज प्रकृति-पर्यावरण और इंसानों के अस्तित्व के लिए संकट बन गया है।…
लंदन, 16 मार्च 2025। जल संरक्षण के क्षेत्र में अपने अद्वितीय कार्यों के लिए पानी वाले बाबा के नाम से ख्यात राजेन्द्र सिंह ने बकिंघम पैलेस, लंदन में यूनाइटेड किंगडम के किंग चार्ल्स तृतीय से मुलाकात की। इस भेंट के…
नई सरकार के गठन की आपाधापी में राजधानी दिल्ली समेत देश के अनके इलाके अपने जल संकट और उबलती गर्मी की ओर अपेक्षित ध्यान नहीं खींच पाए। दिनों-दिन गहराते ये संकट क्या केवल राजनीतिक खींचतान की वजह से ही हैं?…
पृथ्वी की केवल 15 फीसदी जलमग्न भूमि ही प्रदूषण से अप्रभावित है क्योंकि चार करोड़ टन की भारी धातु, जहरीला कीचड़ और अन्य औद्योगिक कचरा दुनियाभर में पानी में फेंका जा रहा है जिससे 85 फीसदी जलमग्न भूमि प्रदूषित हो चुकी है। तीन अरब से…
गंगा मुक्ति आंदोलन की 43वीं वर्षगांठ भागलपुर के कहलगांव क्षेत्र के लोग,जीव–जन्तु और वनस्पति जगत एनटीपीसी से उत्सर्जित राख के प्रदूषण का कहर झेलने को अभिशप्त हैं। बॉटम ऐश के साथ फ्लाई ऐश मिश्रित होकर कहलगांव, पीरपैंती से सबौर तक…
मौजूदा दौर में विकास, खासकर तकनीकी विकास भस्मासुर की उस पौराणिक कथा की तरह हो रहा है जिसमें शिव को प्रसन्न करके अमरता का वरदान पाने वाला भस्मासुर तीनों लोकों समेत खुद शिव के लिए संकट बन जाता है। हाल…
महाकुंभ प्रयागराज में पानी पंचायत पुस्तक का विमोचन महाकुंभ प्रयागराज में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ‘‘कुंभ की आस्था और जलवायु परिवर्तन’’ सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें देश भर से विद्वानों, पर्यावरणविद्, सामाजिक कार्यकर्ता, संतों, विधायक, सांसद आदि ने भाग…
‘वेटलेंड’ यानि आर्द्रभूमि के नाम से पहचाने जाने वाले अपने आसपास के ताल-तलैया, विशाल जलाशय और तटीय इलाके हजारों हजार जैविक इकाइयों का ठिकाना भर नहीं होते, बल्कि उनके भरोसे आज के सबसे बड़े जलवायु परिवर्तन के संकट से भी…
संविधान ने पर्यावरण को खासी अहमियत दी है, लेकिन उसे अमल में नहीं लाया जाता या आधे-अधूरे मन से लाया जाता है। संविधान में पर्यावरण को लेकर किये गए प्रावधान इस विषय की ओर संवेदनशीलता दर्शाते हैं। संविधान के ऐसे…