अस्सी के दशक में जिस पर्यावरण के दुख में सरकार और समाज दूबरा हुआ जाता था, अब वही पर्यावरण आंख की किरकिरी बनकर महज टालने योग्य प्रक्रिया बनकर रह गया है। नर्मदा की मुख्यधारा पर बने पहले बडे बांध ‘रानी…
कोरोना के बाद हमें अपनी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्थाएं पटरी पर लाने के लिए क्या–क्या करना होगा? मसलन-क्या हम मजदूरों के काम के घंटों समेत कई तरह की कानूनी सुविधाओं को निरस्त करने की तर्ज पर कंपनियों के मुनाफे…
कोरोना के बाद विश्व को टिकाने का रास्ता प्रकृति अनुकूलन ही है। प्रकृति के विपरीत समाजवाद में भी पूंजी की परिभाषा अच्छी नहीं थी, इसलिए पूंजीवाद और समाजवाद दोनों में ही प्राकृतिक आस्था नहीं है और प्राकृतिक संरक्षण सिमटा है। जब भी विश्व में प्रकृति के विपरीत ही सब काम होने लगे तो प्रकृति का बडा हुआ क्रोध महाविस्फोट बनता है और उससे प्राकृतिक आपदाएं निर्मित होती है। कोरोना को आपदा भी मान सकते है। महामारी केा प्रलय भी कहा जा सकता है। भारत इस महामारी से अपने परंपरागत ज्ञान आयुर्वेद द्वारा बहुत से कोरोना प्रभावितों को स्वस्थ बना सका है। बहुत लोगों के प्राण बचे है। इस आधुनिक आर्थिक तंत्र ने आयुर्वेद जैसी आरोग्य रक्षण पद्धति को सफल बनने का मौका ही नहीं दिया गया। उसने आर्थिक लाभ के लिए केवल चिकित्सा तंत्र को ही बढावा है।
सुरेंद्रसिंह शेखावत कोविड-19 से बचने के लिए लगाए गए ‘लॉक डाउन’ के तीसरे चरण में यह सवाल उठना लाजिमी है कि अब कोरोना के बाद क्या? आजादी के सत्तर सालों में हमने उद्योग, शहरीकरण और मशीनीकरण का उपयोग करके देख…
कोरोना के कहर ने राहत की राजनीति को भी उजागर कर दिया है। प्राकृतिक, मानव-निर्मित आपदाओं में पीडित-प्रभावितों की मदद के लिए बहत्तर सालों से सक्रिय ‘प्रधानमंत्री राष्ट्रीय सहायता कोष’ को खिसकाकर अब नया ‘प्रधानमंत्री केयर्स फंड’ लाया जा रहा है। कहा जा…
आज, जब कोरोना वायरस की चपेट में आकर समूची दुनिया अपने इतिहास के पहले व्यापक वैश्विक बंद को भुगत रही है, क्या मोहनदास करमचंद गांधी याद नहीं किए जाना चाहिए? करीब सत्तर साल पहले एक सिरफिरे की गोली से संसार त्यागने वाले गांधी…
अदालतों में हिंदी और स्थानीय भाषाओं में कार्रवाई की मांग को लेकर बरसों से बहस चलती रही है, लेकिन अब सुप्रीमकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की पहल पर इसे मंजूर किया गया है। न्याय की आस में अदालतों के दरवाजे ठक-ठकाते…
दुनियाभर में वायु प्रदूषण के लिए वाहनों की बढ़ती संख्या भी जिम्मेदार है। फैलते बाजार और उसकी मार्फत कमाए जाते राजस्व ने सरकारों को इसे अनदेखा करने को उकसाया भी है, लेकिन बढ़ते तापक्रम और नतीजे में जलवायु परिवर्तन की…
एक जमाने में अमीरों के मंहगे परिवहन का सुविधाजनक साधन माना जाने वाला हवाई यातायात अब अनेक शहरों, व्यक्तियों के लिए आम बात हो गया है। जाहिर है, बडे़ पैमाने पर बढ़ते-फैलते हवाई परिवहन ने उसी दर्जे की पर्यावरणीय समस्याएं…
पानी को सिर्फ प्रकृति का प्रसाद मानने वाले नादान लोगों को यह जानकारी भौंचक कर सकती है कि एन लोकसभा चुनाव की बेला में मध्यप्रदेश की बे-पानी होती आबादी को ठेंगे पर मारते हुए गुजरात को उदारतापूर्वक पानी दिया जा…