कड़े कानूनों के बावजूद क्यों नहीं थम रहा बच्चों का शोषण ?
देश में बाल अधिकारों की सुरक्षा के लिए सख्त कानून और संवैधानिक प्रावधान मौजूद हैं, फिर भी बाल मजदूरी, तस्करी, यौन शोषण और बच्चों के लापता होने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और मानवाधिकार…
पर्यावरण संरक्षण : केवल पौधारोपण नहीं, जीवनशैली में बदलाव भी जरूरी
विश्व पर्यावरण दिवस केवल पौधे लगाने का संदेश नहीं देता, बल्कि प्रकृति के प्रति जिम्मेदार जीवनशैली अपनाने का आह्वान करता है। जल संरक्षण, प्लास्टिक का कम उपयोग, प्रदूषण नियंत्रण, जैविक खेती और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपभोग जैसे छोटे-छोटे प्रयास…
कैसे रोकें, राजस्थान के फैलते मरूस्थल को?
आधुनिक विकास के धतकरमों ने जिस तरह के संकट खड़े किए हैं, उनका निदान अब वापस पुरानी पारंपरिक पद्धतियों में ही दिखाई दे रहा है। मसलन, राजस्थान में फैलते मरुस्थलों को स्थानीय तौर-तरीकों, वनस्पतियों, झाड़-झंखाडों आदि से ही रोका जा…
एआई : नई ‘डिजिटल गुलामी’ या भविष्य की राह? सैम पित्रोदा ने दी बड़ी चेतावनी
भारतीय दूरसंचार क्रांति के जनक सैम पित्रोदा ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर एक गंभीर बहस छेड़ दी है। मीडिया स्वराज के संपादक राम दत्त त्रिपाठी से एक साक्षात्कार में पित्रोदा ने आगाह किया कि एआई न केवल रोजगार के…
बिन पानी सब सून . . .
जीवन की अमूल्य जरूरत पानी के प्रति हमारी बेपरवाही ने अब ना तो उसे पर्याप्त मात्रा में छोड़ा है और न ही उसकी शुद्धता बरकरार रखी है। आखिर क्यों हो रही है, पानी के प्रति यह बदसलूकी? कैसे हमारी प्यास…
दरगाह, पुष्कर और ‘सोनीजी की नसियां’ : एक यात्रा-वृत्तांत
यात्राएं अपने रोजमर्रा के जीवन से बाहर निकलने के अलावा बहुत कुछ सिखाती हैं। अव्वल तो हम प्रवास की उन जगहों, इलाकों के बारे में गहराई से जान पाते हैं और दूसरे वहां के समाज की समझ भी बढ़ती है।…
पंचायती राज : लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने की ऐतिहासिक पहल
भारत में पंचायती राज व्यवस्था लोकतंत्र को जमीनी स्तर तक पहुंचाने की एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसे 73वें संविधान संशोधन के जरिए संवैधानिक दर्जा मिला। वैदिक काल से चली आ रही स्थानीय स्वशासन की परंपरा को आधुनिक स्वरूप देते हुए…
पंचायत राज : विकेंद्रीकरण का सपना या जमीनी हकीकत से भटका तंत्र?
भारत में 73वें संविधान संशोधन के जरिए मजबूत की गई पंचायत राज व्यवस्था का उद्देश्य ग्राम स्तर पर लोकतंत्र, विकास और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना था। लेकिन 33 वर्षों बाद भी यह व्यवस्था अपनी मूल भावना से भटकती दिख…
संग-साथ का श्रम : खेती के लिए ‘अड़जी-पड़जी’
नब्बे के दशक की शुरुआत में आए भू-मंडलीकरण के बाद की सभी रंगों-झंडों की सरकारों की सबसे बड़ी चिंता रही है – कृषि में लगी ग्रामीण आबादी के ‘सरप्लस’ को किस तरह उद्योगों यानि शहरों की तरफ हकाला जाए। विडंबना…
संकट के मुहाने पर खड़ी पृथ्वी
22 अप्रैल को मनाया जाने वाला विश्व पृथ्वी दिवस हमें आत्ममंथन का अवसर देता है। विकास और उपभोग की अंधी दौड़ के बीच पृथ्वी अभूतपूर्व संकट से गुजर रही है—जलवायु परिवर्तन, जल संकट, प्रदूषण और घटती जैव विविधता इसके स्पष्ट…









