आधुनिक विकास के धतकरमों ने जिस तरह के संकट खड़े किए हैं, उनका निदान अब वापस पुरानी पारंपरिक पद्धतियों में ही दिखाई दे रहा है। मसलन, राजस्थान में फैलते मरुस्थलों को स्थानीय तौर-तरीकों, वनस्पतियों, झाड़-झंखाडों आदि से ही रोका जा सकता है। क्या है, इन पारंपरिक तरीकों की खासियत?
अशोक चौधरी
मरुस्थलीकरण बढ़ना बहुत बड़ी चुनौती है। जलवायु परिवर्तन, तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या, अनियमित वर्षा सहित कई ऐसे प्रमुख कारण है जिनसे मरुस्थल का प्रसार हो रहा है। एक अनुमान के मुताबिक प्रतिवर्ष पांच हजार हैक्टेयर उपजाऊ भूमि राजस्थान में बंजर होकर मरूस्थल का रूप ले रही है। पिछले कुछ वर्षों से वनस्पति, वन्यजीवों की प्रजातियां विलुप्त एवं कम हो रही हैं। इससे खाद्य-श्रृंखला पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। राजस्थान में 1,75,000 वर्ग किलोमीटर में मरुस्थल फैला हुआ है जिसमें राजस्थान राज्य की करीब 40 प्रतिशत आबादी निवास करती है। इनकी आजीविका का माध्यम कृषि एवं पशुपालन है। पश्चिमी राजस्थान में मुख्यतः गाय, भैंस, ऊंट, भेड़, बकरियां इत्यादि पाली जाती हैं और चराई के लिए सार्वजनिक भूमि, गोचर, औरण इत्यादि पर निर्भर करती है। बढ़ती जनसंख्या के फलस्वरुप भूमि घट रही है, वनस्पतियां घट रही हैं और पालतू पशुओं की संख्या बढ़ रही है। ऐसे में एक असंतुलन पैदा होता है।
राजस्थान को खनिजों का अजायबघर भी कहा जाता है। पश्चिमी राजस्थान में कच्चा तेल, गैस, कोयला, सेंडस्टोन सहित अन्य खनिजों के भंडार हैं। औद्योगिक विस्तार के कारण यहां की जनसंख्या में बहुत तेजी से वृद्धि हो रही है। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार राजस्थान में बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर की जनसंख्या वृद्धि दर सबसे अधिक रही। बढ़ती आबादी की भोजन, आवास की आवश्यकताओं के लिए वृक्षों की कटाई की जा रही है। पश्चिमी राजस्थान में बड़े स्तर पर लगाए जा रहे सौर-ऊर्जा प्लांटों के लिए वृक्षों की कटाई, जोजरी नदी में प्रवाहित हो रहे अपशिष्ट, रसायनयुक्त जल से भी भूमि बंजर हो रही है। मरुस्थलीकरण में इनका बड़ा योगदान है।
राजस्थान में सूखा-अकाल की स्थितियां सदैव बनी रहती हैं। इस कारण यहां पेयजल, अनाज, पालतू पशुओं के लिए चारे पर संकट मंडराता रहता है। इसका यहां के लोगों ने पारंपरिक तरीके से समाधान खोजा है और खड़ीन, तालाब, नाडी, कुंऐ, बावड़ी, झालरें आदि बनाए। जिन्हें विज्ञान की भाषा में आर्द्रभूमि या ‘वेटलैंड’ कहते हैं उनने सैकड़ो वर्षों से मरुस्थल प्रसार की रोकथाम में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
पश्चिमी राजस्थान में कोई भी बारहमासी नदी नहीं है। लूणी, जोजरी और उनकी सहायक कुछ नदियां हैं जो वर्षा ऋतु में प्रवाहित रहती हैं और बाद में सूख जाती हैं। यहां वर्षा भी अपेक्षाकृत कम होती है, पर लोगों ने अपने सार्वजनिक विवेक के ज्ञान से यहां बरसने वाले वर्षा जल को बावड़ी, तालाब, झीलों में सहेजना सीखा। यहां बरसने वाले पानी को लोग संग्रहित कर रखते हैं और वर्ष भर काम में लेते हैं। यहां का इतिहास देखें तो राजा-महाराजा, महाजनों, समाजसेवी लोगों ने हर शहर, गांव में पारंपरिक जलस्रोतों या आर्द्रभूमियों का निर्माण करवाया। पश्चिमी राजस्थान में कोलायत, प्रतापसागर, गड़ीसर जैसी झीलों, बावड़ियों, झालरों, तालाबों की वृहद श्रृंखला है जिसमें पानी की उपलब्धता वर्ष भर बनी रहती है। इस कारण आसपास के क्षेत्र में वनस्पति, वन्यजीवों का आवास भी सदैव देखने को मिलता है।
इन पारंपरिक जलस्रोतों की सार-संभाल सैकड़ों वर्षों से समाज अपने स्तर पर करता रहा है और राजस्थान के सांस्कृतिक रीति-रिवाजों, परंपराओं में इनकी देखरेख प्रमुखता से किए जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश पारंपरिक जलस्रोत – तालाब, बावडियां, औरण, गोचर एवं सामुदायिक भूमि पर बनाए गए हैं जिससे वहां की स्थानीय वनस्पति, वन्यप्राणियों को भी पनपने के अवसर मिलें। सामुदायिक भूमि, वन क्षेत्र में खेजड़ी, कैर, रोहिडा, जाल, बेर, कुमट जैसे वृक्ष, फोग, अरणी, कंकेड़ा जैसी झाड़ियां, सेवन, धामण, भूरट, खींप, सणिया जैसी घासें प्रमुखता से पाई जाती हैं जिनकी मरुस्थल प्रसार की रोकथाम में बहुत बड़ी भूमिका है।
बढ़ती ऊर्जा की आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिए पश्चिमी राजस्थान में बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित किया जा रहे हैं। इसके लिए स्थानीय वनस्पति, जिसमें मुख्यतः खेजड़ी जैसे वृक्षों को काटा जा रहा है जो रेगिस्तान की जीवनरेखा है। इससे आने वाले समय में न सिर्फ मृदाक्षरण बढेगा, बल्कि इस क्षेत्र के तापमान में भी बढ़ोतरी होगी। इस वृक्ष पर निर्भर कई प्रजातियां भी संकट में पड़ी हैं। बीकानेर का लिग्नाइट संयंत्र, जहां आसपास स्थानीय वनस्पति कम हो रही है। ये कुछ बड़े उदाहरण भर हैं जो हमें चेतावनी देते हैं कि मरुस्थलीकरण का प्रसार हो रहा है। मरुस्थलीकरण वैश्विक समस्या बनकर खड़ा है और इसकी रोकथाम भी सामूहिक नागरिक भागीदारी के द्वारा पारंपरिक जलस्रोतों अर्थात आर्द्रभूमियों के संरक्षण से ही संभव है।
इन जलस्रोतों, आर्द्रभूमियों से भूजल स्तर में सुधार होता है, मृदा में नमी बनी रहती है जिससे स्थानीय वनस्पतियां पनपती हैं। यह जलस्रोत प्रवासी पक्षियों, पर्यटन को भी आकर्षित करते हैं जिससे लाखों लोगों की आजीविका चलती है। मरुस्थलीकरण जिस गति से बढ़ रहा है यदि इसी तरह बढ़ता रहा तो देश की बढ़ती जनसंख्या और भूमि की कम हो रही उपज क्षमता के कारण व्यापक संकट खड़ा हो जाएगा। आबादी के लिए दो वक्त का भोजन मिलना भी मुश्किल होगा। खेती में अत्यधिक रासायनिक उर्वरक के प्रयोग से कुछ वर्ष बाद भूमि बंजर होकर मरुस्थल का रूप ले लेती है यह भी एक बड़ा संकट हमारे सामने है।
‘वेस्टलैंड एटलस 2010’ के अनुसार राजस्थान में 93 हजार वर्ग किमी. भूमि बंजर है। यह भूमि मरूस्थलीकरण का ही एक रूप है। इस भूमि पर खड़ीन बनाकर खेजड़ी नीम जैसे वृक्ष लगाए जाएं तो यह भूमि आने वाले समय में राजस्थान की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम हो सकती है। राजस्थान की रेतीली मिट्टी में औषधीय फल तुम्बा बहुतायत में होता है यह मिट्टी का कटाव व मरूस्थलीकरण रोकथाम में सहायक है। इस प्रकार के बेल वाले पौधे जिनका कोई आर्थिक खर्च नहीं है, मरूस्थलीकरण रोकने में सहायता कर सकते हैं।
राजस्थान के संदर्भ में मरुस्थलीकरण रोकथाम हेतु पारंपरिक जलस्रोतों और भूमियों का संरक्षण सार-संभालकर यहां की स्थानीय वनस्पति का अधिकाधिक रोपण करना होगा जिससे हरियाली बढे व मरुस्थल प्रसार पर रोक लगे। आजकल पौधारोपण में लोग बहुत रुचि दिखाते हैं, लेकिन सजावटी पौधों को अत्यधिक लगाया जाता है जिनको न केवल पानी की अधिक आवश्यकता होती है, बल्कि सार-संभाल भी अधिक लगती है। इसके स्थान पर हमें यहां की स्थानीय वनस्पतियों को लगाना चाहिए जिससे हरियाली बढ़े। राजस्थान में औषधीय पौधे बहुत पाए जाते हैं जिनसे कैर, सांगरी, बेर, गोंद जैसी उपज मिलती है, जिनके बाजार में बहुत अच्छे दाम हैं। यह एक सार्थक प्रयोग होगा जिससे न केवल मरुस्थलीकरण की रोकथाम, बल्कि ग्रामीण स्तर पर आजीविका एवं रोजगार का सृजन भी किया जा सकेगा। (सप्रेस)


