महात्मा गांधी के जन्मदिन के ठीक एक दिन पहले हजार किलोमीटर की पद और यदा-कदा वाहन यात्रा करके अपनी बात कहने आए कुल-जमा डेढ़ सौ लद्दाखियों को देश की राजधानी की सीमा पर रोकने की आखिर क्या वजह हो सकती…
कोलकाता के ‘राधा-गोविंद कर अस्पताल’ की प्रशिक्षु डॉक्टर की बलात्कार के बाद की गई वीभत्स हत्या ने एक बार फिर समूचे देश को हिला दिया है, लेकिन क्या यह देश-व्यापी उथल-पुथल किसी कारगर नतीजे तक पहुंच पाएगी? क्या हमारी सरकार…
इन दिनों हिमाचलप्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश जैसे देश के उत्तरी राज्यों में बाढ़ ने तबाही मचा रखी है। आम आबादी समेत वैज्ञानिक और राजनेता तक, सब जानते हैं कि इसकी बुनियादी वजह कथित विकास की खातिर अपेक्षाकृत नवजात पर्वत…
बांस, घास की एक ऐसी प्रजाति है जो हमारे रोजमर्रा के जीवन में बहुतायत से मौजूद है। अब तो उसे पैट्रोल, डीजल जैसे जीवाश्म ईंधन के साथ मिलाकर वाहनों में भी प्रयोग किया जाने लगा है। दुनिया में भारतवर्ष दूसरे…
बेरहमी से सतही जल उलीचने और जलस्रोतों को रौंदने के बाद इंसानी हवस की भरपाई के लिए अब भूगर्भीय जल की बारी है, लेकिन हमारे पास कितना भूजल है? क्या उसे विकास की मौजूदा रफ्तार के चलते बचाया जा सकेगा?…
कहा जाता है कि शहरी लोग कचरे का सर्वाधिक विसर्जन करते हैं, लेकिन अब यह व्याधि गांवों तक भी पहुंच गई है। देश में प्रतिदिन 28 करोड टन ठोस कचरा पैदा हो रहा है जिसमें से 10.95 करोड टन ग्रामीण…
विकास के मौजूदा मॉडल के चलते हिमालय को एक ‘डूबती इकाई’ मानने वाले अनेक वैज्ञानिक, सामाजिक कार्यकर्ता अब भी उम्मीद कर रहे हैं कि सत्ता और सेठों की चौकडी को शायद अक्ल आ जाए और वे हिमालय में विकास को…
साठ के दशक में हमारे देश में आई ‘हरित क्रांति’ ने उत्पादन तो कई-कई गुना बढाया, लेकिन हमारे भोजन से पौष्टिकता गायब कर दी। देश भर में भोजन के नाम पर सिर्फ गेहूं और चावल परोसे जाने लगे और कुछ…
गांधी के विचारों की प्रासंगिकता हमारे समय में लगातार, रोज-ब-रोज बढती जा रही है। उनके विचार जो उनके ही मुताबिक उनके व्यवहार में से निकले थे, अब बहुत जरूरी होते जा रहे हैं। क्या इन्हें आज की दुनिया अंगीकार करना…
सभी के जानते-बूझते समाज का एक तबका मानवीय गंदगी को ढोने, साफ करने के ऐसे काम में आज भी लगा है जिसे किसी हालत में मानवीय नहीं कहा जा सकता, लेकिन सत्ता, समाज और सरकारें उसकी तरफ इस कदर मुंह…