हिमालयी राज्य क्षेत्रीय परिषद : डूबते हिमालय को बचाने की तजबीज

कुलभूषण उपमन्यु

विकास के मौजूदा मॉडल के चलते हिमालय को एक ‘डूबती इकाई’ मानने वाले अनेक वैज्ञानिक, सामाजिक कार्यकर्ता अब भी उम्मीद कर रहे हैं कि सत्ता और सेठों की चौकडी को शायद अक्ल आ जाए और वे हिमालय में विकास को दूसरे छोर से देखना शुरु कर दें। सरकार ने “हिमालयी क्षेत्रीय परिषद” का गठन करके इसकी शुरुआत कर दी है।

हिमालय में तापमान वृद्धि दर वैश्विक औसत से ज्यादा होने के कारण भी है। हिमालय की संवेदनशील परिस्थिति को देखते हुए लंबे समय से हिमालय के लिए अलग विकास मॉडल की मांग होती रही है। मुख्यधारा का विकास मॉडल हिमालय क्षेत्र के अनुकूल नहीं है, जिसकी नकल करने के लिए हम मजबूर किए गए हैं।

‘नीति आयोग’ ने ‘हिमालयी राज्य क्षेत्रीय परिषद्’ का गठन करके एक तरह से हिमालय-वासियों की समस्याओं और संभावनाओं को मैदानी क्षेत्रों से अलग दृष्टिकोण से देखने की उम्मीद और मांग को मान्यता देने की पहल की है, जिसका खुले दिल से स्वागत तो किया ही जाना चाहिए। हिमालय की प्राकृतिक स्थिति बहुत संवेदनशील है और इसकी कुछ विशेषताएं हैं जिनका ध्यान रखे बिना किया जाने वाला हर विकास कार्य हिमालय की संवेदनशील पारिस्थितिकीय व्यवस्था को हानि पंहुचाने का कारण बन जाता है। भले के नाम पर किया जाने वाला कार्य भी उल्टा पड़ जाता है जिसकी कीमत हिमालय-वासियों के साथ-साथ पूरे देश को हिमालय से प्राप्त होने वाली पर्यावरणीय सेवाओं में बाधा और ह्रास के रूप में चुकानी पडती है।

सन् 1992 में भी डा. एसजेड कासिम की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ दल का गठन किया गया था, जिसकी संस्तुतियां भी हिमालयी राज्यों की पारिस्थिक अवस्था के आधार पर बनी थीं। उसके बाद विकास की जिस वैकल्पिक सोच को जमीन पर उतारने के लिए संस्थागत व्यवस्था खड़ी करने के सुझाव दिए गए थे वे लागू नहीं हो सके और बात एक रिपोर्ट तक ही सिमट रह गई। इस बार ‘नीति आयोग’ ने 2017 में पांच ‘कार्य समूह’ (वर्किंग ग्रुप) विभिन्न मुद्दों को लेकर बनाए थे। इनकी रिपोर्ट अगस्त 2018 में आने के बाद यदि कुछ महीनों के भीतर ही “हिमालयी क्षेत्रीय परिषद” का गठन कर दिया जाता तो माना जा सकता था कि सरकार इस दिशा में कुछ गंभीर है।

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वरिष्ठ वैज्ञानिक पृष्ठभूमि के डा. वीके सारस्वत “हिमालयी क्षेत्रीय परिषद” के अध्यक्ष बनाए गए हैं। परिषद, पांच ‘कार्य-समूहों’ की रिपोर्टों के आधार पर कार्यवाही बिंदु तय करेगी और हिमालयी राज्यों और केंद्र सरकार द्वारा हिमालय क्षेत्र में विकास के टिकाऊ मॉडल को क्रियान्वित करने और अनुश्रवण करने में सहायता करेगी। यानि इस परिषद की भूमिका हिमालय के वैकल्पिक विकास मॉडल के सन्दर्भ में काफी महत्वपूर्ण रहने वाली होगी। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि परिषद को अपनी भूमिका निर्वहन के लिए पर्याप्त शक्तियाँ भी दी जाएंगी।

जो पांच ‘कार्य-समूह’ बनाए गए थे उनको निम्न मुद्दों पर अपनी विशेषज्ञ रिपोर्ट देने को कहा गया था.-

1.      जल- स्रोत- जलागम के प्रबन्धन द्वारा जलस्रोतों को पुनर्जीवित करना।

2.      टिकाऊ पर्यटन की व्यवस्था खड़ी करना।

3.      झूम खेती के विकल्पों से पूर्वोतर राज्यों में कृषि की टिकाऊ व्यवस्था खड़ी करना।

4.      हिमालयी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त कौशल विकास और उद्यमिता सशक्तिकरण।

5.      जानकारी आधारित निर्णय प्रक्रिया के लिए, आंकड़ों और सूचनाओं का संग्रह।

“हिमालयी क्षेत्रीय परिषद” आपदा प्रबन्धन, ऊर्जा, ढांचागत विकास, परिवहन, वन, जैव-विविधता, शहरीकरण, स्वास्थ्य, शिक्षा, आदि प्रमुख क्षेत्रों के विषयों में भी आकलन प्रस्तुत कर सकेगी, जिसके आधार पर हिमालय क्षेत्रों में टिकाऊ विकास के लिए दिशानिर्देश और रूपरेखा विकसित की जाएगी।

हिमालय में टिकाऊ विकास के लिए खतरों या रुकावटों को यदि चिन्हित करने का प्रयास किया जाए तो स्पष्ट होगा कि पांच ‘कार्य-समूहों’ के अतिरिक्त ऊर्जा, ढांचागत विकास, सडकें, परिवहन और पर्यावरण विनाशक उद्योग टिकाऊ विकास को दिग्भ्रमित करने वाले मुख्य कारक रहे हैं। इनको संज्ञान में तो लिया गया है, किन्तु अच्छा होता यदि इनके लिए भी अलग-अलग विशेष ‘कार्य-समूह’ बनाकर विशेषज्ञ संस्तुतियां प्राप्त कर ली जातीं। हिमालय में बड़ी चौड़ी सडकें अपने साथ भारी तबाही ले कर आती हैं।

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आवागमन की सुविधा में सुधार की ख़ुशी, उसके कारण होने वाली तबाही को भुला देती है। उसके खिलाफ कोई आवाज़ उठाएगा तो विकास विरोधी कहलाया जाएगा, इस डर से या अपने-अपने निहित स्वार्थों के चलते कोई कुछ नहीं बोलता, इसलिए सड़क निर्माण में पर्वतीय क्षेत्रों में क्या सावधानियां बरती जानी चाहिए इस बात का कोई ख्याल तक नहीं करता। हिमालय में यदि सडकें ‘कट एंड फिल’ विधि से बनाई जाएं तो 30% तक खर्चों में वृद्धि तो होगी, किन्तु निर्माण कार्य के दौरान होने वाली तबाही से बड़ी हद तक बचा जा सकता है। सडकों के विकल्प के रूप में कुछ जगहों पर ‘रोप-वे’ या ‘मोनो-रेल’ जैसे विकल्पों पर भी सोचा जाना चाहिए।

इसी तरह उर्जा के क्षेत्र में हिमालय में ‘जल-विद्युत्’ का दोहन जिस स्तर और तकनीक से किया जा रहा है उससे बनावटी झीलों के कारण होने वाले मीथेन उत्सर्जन के कारण स्थानीय स्तर पर वायुमंडल के तापमान में वृद्धि हो रही है, सुरंगों से जल-स्रोत सूख रहे हैं और नदी-घाटी स्तर पर पारिस्थितिकीय व जलवायु में  बदलाव आ रहे हैं। पांच मेगावाट तक माइक्रो-हाइडल का दर्जा देकर छोटे-छोटे नालों पर भी भारी तोड़फोड़ की जा रही है। कई जगह छोटी खड्डों और नालों पर बनने वाले इन माइक्रो-हाइडल परियोजनाओं से लोगों के पानी के अधिकारों का हनन हो रहा है और सिंचाई व पेयजल के लिए टकराव की स्थितियां बन जाती हैं।

जल-विद्युत् दोहन के लिए एक मेगावाट से नीचे की परियोजनाओं को ही मान्यता मिलनी चाहिए। ‘वोरटेक्स तकनीक’ और ‘हाइड्रो-काईनैटिक’ तकनीकों को भी विकल्प के तौर पर परखा जाना चाहिए, जिनमें पनचक्की जितने प्रपात पर या उससे भी छोटे प्रपात पर बिजली बनाई जा सकती है। ‘हाइड्रो-काईनैटिक’ तकनीक में तो बहते हुए पानी में तैरते प्लैटफार्म से टरबाइन जोड़कर ही बिजली बनाई जा सकती है। इस तकनीक का प्रयोग समुद्र की लहरों से भी बिजली बनाने के लिए किया जा सकता है। सौर-ऊर्जा को काफी बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जा रहा है, फिर भी हिमालय के लिए विशेष व्यवस्था की जरूरत है।

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पर्वतीय प्रदेशों की सरकारें आर्थिक संसाधनों के दबाव के चलते कई बार अवांछित या पर्यावरण के विनाशक तरीकों से भी आय की आशा में फैसले कर लेती हैं, जिन पर अंकुश वैकल्पिक व्यवस्थाओं को प्रोत्साहन देकर ही लग  सकता है। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि “हिमालयी राज्य क्षेत्रीय परिषद” ऐसे जरूरी मुद्दों पर विशेषज्ञ ‘कार्य-समूह’ बनाकर मुख्यधारा की विकास अवधारणाओं से हटकर हिमालय के लिए उपुक्त तकनीकों का प्रचालन करवाने में मुख्य भूमिका निभा सकेगी। जाहिर है, वर्तमान ‘कार्य-समूह’ रोज़गार को मुख्य बिंदु मानकर गठित किए गए हैं, जबकि पर्यावरण मित्र विकास के लिए विधि-निषेध का ध्यान रखा जाना बहुत जरूरी है। हिमालय में क्या नहीं होगा यह उतना ही जरूरी है जितना कि यहाँ क्या होगा, यह जरूरी है।  

हिमालय-वासियों और हिमालय की चिंता करने वाले सभी लोगों को इस परिषद का स्वागत करना चाहिए, परिषद को भी चाहिए कि इस क्षेत्र के अनुभवी लोगों और संगठनों-संस्थाओं को जोड़कर आगे बढने की संस्कृति को अपना कर कार्य करें। विकास के मॉडल से जुड़े मामलों में समुदायों को भी मुख्य दावेदार माना जाना चाहिए, जबकि आमतौर पर प्रबन्धन से जुड़े विभागों, औद्योगिक और वाणिज्यिक दावेदारों को ही मुख्य भूमिका में देखा जाता है। यह चिंता का विषय है कि तमाम उम्मीदों के बाबजूद 3-4 साल बीत जाने के बाद भी इस परिषद् का कोई प्रभाव या कार्य जमीन पर तो दिखाई नहीं दिया है। इन प्रकृति की छेड़-छाड़ जनित प्रकोपों को देखकर यदि हम आपातकालीन समझ को जगाकर जग जाएं तो ही समाधान की दिशा में बढ़ सकेंगे। केंद्र और राज्य सरकारें एवं “हिमालयी क्षेत्रीय परिषद” इस दिशा में शीघ्र सक्रिय हों यही आशा और मांग है। (सप्रेस)

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