Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

चैतन्य नागर

उदास समाज के लिए कम ही सही, हँसी तो जरुरी है

हंसने के प्रति आप गंभीर नहीं तो जान लें कि आम तौर पर 23 साल की उम्र के आस पास लोगों का हास्य बोध घटने लगता है| मांसपेशियों के कमज़ोर होने और आखों की रोशनी के घटने से भी ज्यादा…

शिक्षक दिवस : शिक्षक सिर्फ ‘ट्रेनर’ नहीं होता

आजकल शिक्षा, किसी तरह डिग्री हासिलकर नौकरी पाने का उपाय भर होती जा रही है। देश व समाज के लिए बेहतर नागरिक बनाने में शिक्षा संस्थानों की अब कोई रुचि दिखाई नहीं देती। ऐसे में क्या किया जाना चाहिए? प्रस्तुत…

राष्ट्रीय खेल दिवस : सेहत बनाने का सीधा, सरल रास्ता

खेलकूद में बच्चों की एक स्वाभाविक रूचि होती है| वे हर समय खेलना चाहते हैं, पर अपने अनुभवों से दबे-पिसे वयस्क उनको पढ़ाई-लिखाई पर अधिक ध्यान देने और खेलकूद पर समय बर्बाद न करने की हिदायतें देते नहीं थकते| पीढ़ियों…

राजनीति : धर्मनिरपेक्षता को लेकर कांग्रेस की उहापोह

पिछले करीब तीन दशकों से भाजपा एक दृढ लक्ष्य के साथ राजनीतिक अखाड़े में अपने आप को मजबूत बनाती चली जा रही है| सही है कि बाकी विपक्ष और कांग्रेस भाजपा की नीतियों के खिलाफ स्वयं को व्यक्त करते रहे…

ऑक्सफैम की खरी-खरी: जी-7 ने लाखों लोगों को भूखों मरने के लिए छोड़ दिया

तकरीबन साढ़े चार बिलियन लोगों को भूखा मरने पर बाध्‍य जिस समय पर दुनिया की “एक पीढ़ी” सबसे खराब भूख संकट का सामना कर रही है, उसी एक समय पर अमीर देशों ने बस अपने मुनाफे को देखा है। कोविड…

क्या उदयपुर से होगा नई समझ का उदय

राजस्थान के उदयपुर में जो हुआ, उसके बारे में कोई लिखे भी तो क्या! इस देश की दुर्दशा कहाँ तक होगी, इसका अंदाजा लगाना ही मुश्किल है| धर्म या किसी विचारधारा के नाम पर होने वाली हिंसा मानव इतिहास में…

International Yoga Day 2022 : खूब बिकने वाला सामान भी है ‘योगा’

चालीस अरब डॉलर का है योग उद्योग| योग से मिली उर्जा का उपयोग पूंजीवादी अच्छी तरह करते हैं। योग से कर्मचारी ज्यादा उर्जावान महसूस करेंगे और ज्यादा काम करने में सक्षम होंगें। काम से होने वाले तनाव को भी योग…

अंधाधुंध फायरिंग लक्षण है अमेरिका की सांस्कृतिक रुग्णता का

मानसिक रोग और बंदूक के दुरुपयोग के संबंध को लेकर एक बार फिर से अमेरिका में बहस छिड़ी हुई है| बंदूकों का प्रेमी देश कहता है कि मानसिक बीमारी के कारण ऐसी घटनाएँ होती हैं, न कि सिर्फ बंदूक रखने…

तपती दुनिया में घनी छांह है बुद्ध की देशना

बुद्ध के जीवन का आखिरी वाक्य उनके असाधारण रूप से प्रज्ञाशील होने को पूरी तरह स्थापित कर देता है। आज के समय में जब हर धर्म का अनुयायी सत्य को अपनी जेब में रखने का, उसके अकाट्य होने का दावा…

जिद्दू कृष्णमूर्ति : वो हर इक बात पे कहना, कि यूं होता तो क्या होता

कृष्णमूर्ति नहीं चाहते थे कि उन्हें याद भी किया जाए. उन्हें नमन, प्रणाम भी किया जाए, ऐसे मौकों पर किसी तरह की श्रद्धांजलि अर्पित की जाए, इसीलिए एक ‘भगवान’, मैत्रेय बुद्ध, अवतार और मसीहा का दर्जा मिलने के बाद भी…