अरुण कुमार डनायक

सुप्रीम कोर्ट में आठवीं की किताब : संस्थागत गरिमा बनाम शैक्षिक स्वायत्तता

‘एनसीईआरटी’ की आठवीं की किताब ने हाल में सुप्रीमकोर्ट में भारी बहस खड़ी कर दी है। किताब में न्यायपालिका की अनेक कमजोरियों पर ऊंगली रखी गई है, लेकिन हमारा न्यायतंत्र इसे बदनाम करने का प्रयास मानता है। तो क्या हमारे…

भारत में गणतंत्र : चुनौतियाँ, विफलताएँ और समाधान

हम अपने गणतंत्र की 77वीं सालगिरह मना रहे हों, लेकिन क्या सचमुच हमारा लोकतंत्र उस तरफ बढ़ रहा है जिसकी उम्मीद हमने करीब आठ दशक पहले की थी? मसलन–क्या हमारी दो सदनों–लोकसभा, राज्यसभा–वाली संसद और राज्यों की विधानसभाएं अपेक्षित अवधि…

बैंकिंग से बदलता भारत का परिदृश्‍य

आज के दौर में औपचारिक आर्थिक ताने-बाने को बनाए रखने के लिए बैंक बेहद अहम भूमिका निभाते हैं। खासियत यह है कि बैंकों की यह सेवा छोटे-छोटे, स्थानीय ग्रामीणों से लगाकर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचती है। क्या और कैसा है,…

भविष्य निधि : कर्मचारी हित बनाम प्रशासनिक सुविधा

सम्पत्ति बढ़ाने की जुगत में सरकारें बीमा और बैंकों में लगी आम लोगों की पूंजी को बाजार के हवाले कर रही हैं। अब यह कारनामा कर्मचारियों की भविष्य निधि तक पहुंच गया है। ऐसा करने के लिए पारदर्शिता, आसान प्रक्रिया…

सौ साल का ‘आरएसएस’

ठीक एक शताब्दी पहले, 1925 के दशहरे के इन्हीं दिनों में ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना हुई थी। उसके कर्ता-धर्ताओं की नजर में गैर-राजनीतिक, सांस्कृतिक संगठन माना जाने वाला यह अ-पंजीकृत जमावडा अपने जन्म से ही विवादास्पद रहा है। क्या…

गांधीजी की आधुनिकता और उनके मापदंड

आम लोगों में महात्मा गांधी को उनके रहन-सहन, खान-पान और भाषा-भूषा के चलते गैर-आधुनिक, पिछडा और पारंपरिक मानने का चलन है, लेकिन क्या वे सचमुच वैसे थे? या आधुनिकता के उनके मापदंड आम लोगों से भिन्न थे, जिनका वे कडाई…

विकास की विचारधारा : ‘संघ परिवार’ का संकट

पिछले एक दशक से अधिक वर्षों से देश और कतिपय राज्यों की सत्ता पर काबिज ‘भारतीय जनता पार्टी’ और ‘संघ परिवार’ के अन्य सहमना संगठनों के पास आर्थिक विकास को लेकर क्या सोच है? और क्या उनकी सोच देश को…

NCERT module : विभाजन की अपूर्ण कथा और इतिहास की चुनिंदा प्रस्तुति

भारत विभाजन की त्रासदी को लेकर सत्ता समर्थक लेखक और एनसीईआरटी का नया मॉड्यूल इतिहास को अधूरा व पक्षपाती रूप में पेश करते हैं। हिंदू महासभा-आरएसएस की भूमिका गायब है, नेहरू–पटेल का असमान चित्रण है और अंग्रेज़ों की जिम्मेदारी को…

गांधीजी की दृष्टि और पश्चिम एशिया का संकट

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जब अमीर ‘मित्र-राष्ट्र’ दुनिया का हिस्सा-बांटा कर रहे थे, भारत में महात्मा गांधी शांतिपूर्ण, अहिंसक और दोस्ताना दुनिया के भविष्य की जुगत बिठा रहे थे। क्या 80-85 साल पहले दुनिया के सत्ताधारियों, खासकर पश्चिम एशिया के…

जाति जनगणना और पसमांदा मुसलमान

हाल ही में केन्द्र सरकार ने बहु-चर्चित जाति जनगणना की तारीखों की घोषणा कर दी है। विपक्षी दलों की इस प्रमुख मांग पर भारी ना-नुकुर के बाद हामी भरने वाली सत्तारूढ़ भाजपा इसे चुनावी जीत की गारंटी मानती है, लेकिन…