NCERT module : विभाजन की अपूर्ण कथा और इतिहास की चुनिंदा प्रस्तुति

अरुण कुमार डनायक

भारत विभाजन की त्रासदी को लेकर सत्ता समर्थक लेखक और एनसीईआरटी का नया मॉड्यूल इतिहास को अधूरा व पक्षपाती रूप में पेश करते हैं। हिंदू महासभा-आरएसएस की भूमिका गायब है, नेहरू–पटेल का असमान चित्रण है और अंग्रेज़ों की जिम्मेदारी को हल्का दिखाया गया है। गांधीजी की चेतावनी व जनता की पीड़ा को भी नज़रअंदाज़ किया गया है। इतिहास को संतुलित व सच्चे रूप में प्रस्तुत करना आज और भी ज़रूरी हो गया है।

भारतीय समाज और राजनीति के लिए स्थायी घाव छोड़ गई भारत विभाजन की त्रासदी को लेकर सत्‍ताधारी पार्टी के समर्थक लेखकों द्वारा तरह तरह के दावे किये जा रहे हैं। हाल में प्रकाशित एनसीईआरटी के विभाजन की भयावहता – मध्य चरण मॉड्यूल में भी विभाजन की कहानी को पूरी गंभीरता और निष्पक्षता से प्रस्तुत नहीं किया गया है। ये सभी प्रस्तुतियाँ कुछ पहलुओं को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने और अनेक महत्त्वपूर्ण तथ्यों को बहुत ही चतुराई से छिपाने का प्रयास हैं।

सबसे बड़ी कमी यह है कि मॉड्यूल में हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका का कोई उल्लेख नहीं है। इतिहासकारों ने बार-बार प्रमाणित किया है कि 1937 से ही सावरकर और हिंदू महासभा ने “दो राष्ट्र सिद्धांत” का समर्थन किया, और आरएसएस ने सांप्रदायिक राष्ट्रवाद को हवा दी। बंगाल और सिंध में मुस्लिम लीग के साथ मिलकर प्रांतीय सरकारें चलाईं। सिंध प्रांतीय सभा द्वारा पारित भारत विभाजन प्रस्ताव पर हिंदू महासभा ने कोई प्रतिरोध नहीं किया। अंग्रेज़ों भारत छोड़ो आंदोलन से इन दोनों संगठनों ने दूरी बना ली, जिससे मुस्लिम लीग को अपनी जड़ें और गहरी करने का अवसर मिला। इन संगठनों की चुप्पी और उनकी वैचारिक स्थिति ने विभाजन की जमीन तैयार करने में योगदान दिया। लेकिन मॉड्यूल इन्हें पूरी तरह चर्चा से बाहर रखता है, जिससे इतिहास अधूरा रह जाता है।

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दूसरा पक्ष है नेहरू और पटेल की भूमिका का असमान चित्रण। नेहरू को विभाजन को स्वीकार करने वाले नेता के रूप में बार-बार रेखांकित किया गया है, जबकि पटेल को केवल मजबूरी में विभाजन स्वीकारने वाला दिखाया गया है। वास्तव में, दिसंबर 1946 में सबसे पहले पटेल के मन में ही यह विचार आया कि मुस्लिम लीगियों के साथ न केवल सरकार चलाना असंभव है, बल्कि देश की प्रगति भी नहीं हो सकेगी। कांग्रेस कार्यसमिति और महासमिति की बैठकों में पटेल के वक्तव्यों को न बताकर मॉड्यूल ने संतुलन खो दिया है।

अंग्रेज़ों की ज़िम्मेदारी को भी मॉड्यूल हल्के ढंग से प्रस्तुत करता है। वायसराय वेवेल और माउंटबेटन के उद्धरणों में वे खुद को निर्दोष बताते हैं, जबकि हकीकत यह थी कि ब्रिटिश सत्ता ने लंबे समय तक “फूट डालो और राज करो” की नीति अपनाई। वेवेल की निष्क्रियता के कारण ही कलकत्ता के दंगे नहीं रोके जा सके और गांधीजी ने उनकी विदाई की मांग की थी। वहीं माउंटबेटन की जल्दबाजी ने लाखों निर्दोषों को मौत और विस्थापन की आग में झोंक दिया। वस्तुतः विभाजन की पूरी योजना लंदन दौरे के दौरान माउंटबेटन ने तैयार की थी और इसे मई 1947 में सबसे पहले नेहरू को दिखाया था। इसे देखकर नेहरू जी अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाए थे। इस पहलू को गंभीरता से न दिखाना एक बड़ी चूक है।

महात्मा गांधी के विभाजन-विरोधी विचारों को केवल औपचारिक उल्लेख तक सीमित कर दिया गया है। जबकि गांधी बार-बार कहते रहे कि विभाजन “उनके लिए अंग-भंग जैसा होगा” और अंत तक वे सांप्रदायिक सौहार्द की रक्षा के लिए प्रयासरत रहे। प्यारेलाल की पूर्णाहुति और कृपलानी की गांधी जीवन और विचार में विस्तार से दर्ज है कि गांधी किस तरह जिन्ना के साथ समझौते की संभावनाएँ तलाशते रहे। अप्रैल 1947 के प्रथम सप्ताह में उन्होंने वायसराय माउंटबेटन को नौ सूत्रीय सुझाव दिए। इसमें जिन्ना को मंत्रिमंडल गठन की छूट और पाकिस्तान की मांग को हिंसा नहीं बल्कि तर्क से सिद्ध करने की शर्त रखी। माउंटबेटन सहमत थे, पर उनके सलाहकारों ने इरविन-पैक्ट जैसी गलती की आशंका में विरोध किया। ब्रिटिश अधिकारियों ने कांग्रेस नेतृत्व में मतभेद भी गहरा दिए। कांग्रेस कार्यसमिति ने गांधीजी की योजना ठुकरा दी और विभाजन को “हार” कहने वाली उनकी चेतावनी भी नहीं मानी। परंतु मॉड्यूल में गांधी की यह नैतिक चेतावनी लगभग नज़रअंदाज़ कर दी गई है।

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14 जून को कांग्रेस महासमिति की बैठक में गांधीजी ने कहा कि कार्यसमिति के निर्णय को अस्वीकार करना उचित नहीं होगा, क्योंकि ऐसा करने पर पूरी कार्यसमिति को इस्तीफा देना पड़ेगा और नई कार्यसमिति का गठन करना होगा। यदि विरोधी सदस्य इन जिम्मेदारियों को उठाने को तैयार हों तो वे निर्णय अस्वीकार कर सकते हैं, लेकिन कोई आगे नहीं आया। मतदान में 157 सदस्य पक्ष में और 15 विरोध में रहे। इस प्रकार कांग्रेस ने विभाजन दुखी मन से स्वीकार किया। बाद में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने माना कि अंतरिम सरकार के अनुभव और मुस्लिम लीग की अड़ंगेबाज़ी ने परिस्थितियाँ बदल दीं। लीग के मंत्री यहाँ तक कि दंगे शांत करने के प्रयासों में भी बाधा डालते रहे। वस्तुत: देश का जनमत विभाजन के पक्ष में था और गांधीजी को भी इसका अहसास हो गया था |

मॉड्यूल का निष्कर्ष कहता है कि किसी धर्म को विशेषाधिकार न दिया जाए, राजनीति में कट्टरता और हिंसा का स्थान न हो और इतिहास को न तो सफेदपोश बनाया जाए और न अतिरंजित। लेकिन यही बातें वर्तमान शासन की नीतियों में नहीं दिखाई देतीं। आज धर्म आधारित ध्रुवीकरण की राजनीति तेज है, इतिहास को चुनिंदा दृष्टिकोण से गढ़ा जा रहा है और विभाजन की स्मृति को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।

इसके अतिरिक्त मॉड्यूल यह दावा भ्रामक है कि बहुत से लोगों को विभाजन का इतिहास मालूम ही नहीं। और यदि शिक्षकों को भी यह सब विस्तार से ज्ञात नहीं है, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है? साहित्य, सिनेमा और शोध में इस पर व्यापक काम हुआ है। यह कहना कि लोग नहीं जानते, दरअसल नई पीढ़ी को विशेष दृष्टिकोण से इतिहास पढ़ाने का बहाना है।

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मुस्लिम लीग की जिद, अंग्रेज़ की चालबाजी तथा दोनों समुदायों के बीच गहरे अविश्वासको विभाजन का कारण मानने वाले राममनोहर लोहिया के अनुसार, विभाजन केवल सत्ता का सौदा नहीं था, बल्कि समाज की चेतना पर चोट थी; एनसीईआरटी मॉड्यूल इसमें जनता, स्त्रियाँ, किसान और मुस्लिम-सिंधी समाज की पीड़ा को पर्याप्त रूप से नहीं दिखाता।

एनसीईआरटी मॉड्यूल इतिहास को चुनिंदा तथ्यों और राजनीतिक दृष्टि से प्रस्तुत करते वास्तव में, भारत की राजनीतिक परिस्थितियों में चारों ओर से घिरी मोदी सरकार स्वतंत्रता आंदोलन और देश के विभाजन का ठीकरा कांग्रेस के नेताओं पर फोड़कर अपनी कठिन स्थिति से बाहर निकलने का प्रयास कर रही है। इतिहास के पाठ्यक्रम संतुलित और सच्चे  होना चाहिए। गांधीजी की चेतावनी याद दिलाती है कि सांप्रदायिकता और हिंसा राष्ट्र को मजबूत नहीं बनाती; असली शक्ति विविधता में एकता और आपसी विश्वास में है।

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