प्रकृति, संस्कृति और सत्य के उद्घोषक आचार्य विनोबा भावे के भूदान आंदोलन की 75वीं जयंती 11 सितंबर 2026 को दिल्ली में उत्सव के रूप में मनाने हेतु भारत भर के प्रकृति-संस्कृतिकर्मी जुट रहे हैं। भारत को पुनः सोने की चिड़िया बनाने के लिए भू-सांस्कृतिक मानचित्र को महत्वपूर्ण उपकरण बनाने की दिशा में मिलकर कार्य करने के लिए एकत्रित हो रहे हैं।
भूदान आंदोलन की 75वीं जयंती : 11 सितंबर
संस्कृति-प्रकृति योगी आचार्य विनोबा भावे को संपूर्ण जीवन-विज्ञान को अध्यात्म के साथ जोड़ने की सिद्धि प्राप्त थी। उनके साधन और साधना पूर्णतः प्रकृतिमय रहे। इसलिए भगवान के प्रथम महाभूत भूमि के लिए उन्होंने भूदान क्रांति का सूत्रपात किया। गगन और वायु को समझकर दुनिया को समझाया। अग्नि और नीर के लिए पवनार धाम बनाया, जो धाम नदी के किनारे स्थित है। वहीं रहकर उन्होंने तप, साधना और आत्मज्ञान की महान उपलब्धि प्राप्त की।
भूदान क्रांति में भी उन्होंने साधना के माध्यम से ही सिद्धि प्राप्त की। हमें पूरी दुनिया के उन सज्जनों को याद करना चाहिए, जिन्होंने भूदान के माध्यम से भूमि प्राप्त कर भूमिहीनों को बांट दी। प्राकृतिक महाभूत भूमि को मानवता से जोड़ने के लिए भूदान यज्ञ दुनिया का स्वयं में एक बड़ा यज्ञ था। इसी यज्ञ ने हमें तपस्या, त्याग और आहुति देना सिखाया। यज्ञ में आहुति करना ही भारतीय संस्कृति की विशिष्टता है। इसे विनोबा भावे ने हमारे संस्कार और व्यवहार का हिस्सा बनाया था।
संपूर्ण जगत के लिए सुख की चाह रखने वाले ही ‘जय जगत’ जैसे बड़े मंत्र का उद्घोष कर सकते हैं। पूरी दुनिया और ब्रह्मांड का हित एक साथ करने से ही हम दवा-मुक्त, विस्थापन-विहीन और विनाश-मुक्त विकास की राह पर चल सकते हैं। सनातन विकास का मार्ग अपनाकर हम संपूर्ण दुनिया को नई दिशा दिखा सकते हैं। राष्ट्रीय सीमाओं और दीवारों से मुक्त दुनिया ही वास्तव में एक दुनिया बन सकती है। पूरी दुनिया की शांति उसकी हरियाली से ही खुशहाली प्राप्त कर सकती है। इसलिए विनाश-मुक्त विकास ही जगत को पोषित करने वाला विकास बन सकता है।
बाबा विनोबा तो जगत-पोषक थे। वे अपनी वाणी के माध्यम से पूरे जगत को पोषित करते रहे। उनकी सरलता और सादगी ने संपूर्ण दुनिया को प्रेरित किया। उनके जीवन की सादगी और सरलता ने भारतीय संस्कृति को प्रकृति के साथ जोड़कर देखने की दृष्टि विकसित की। भूदान यज्ञ दुनिया को दूसरों के लिए त्याग करना सिखाने वाला एक महान आंदोलन बन गया।
अब 11 सितंबर 2026 को भूदान आंदोलन के 75 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। आज इस यज्ञ को और अधिक सार्थकता देने की आवश्यकता है। भूदान में दूसरों के जीवन और जीवों के हित के लिए जमीन का दान देना अपने आप में बहुत बड़ी घटना थी। इस घटना ने भारत के भूमिहीनों के जमीन और आत्मसम्मान को ऊपर उठाया।
हमारा आत्मसम्मान केवल निजी प्रकृति का सम्मान नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण संस्कृति को समृद्ध बनाने का माध्यम है। इस संस्कृति का उद्भव प्रेम से होता है। अमीर और गरीब के बीच प्रेम केवल भावना नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास का आधार है। जब एक जमींदार अपनी जमीन किसी जरूरतमंद को दे देता है, तो वह एक विश्वास को जन्म देता है। यही विश्वास किसी निःशक्त और निःसहाय व्यक्ति के लिए उसकी आत्मा के एहसास का आधार बनकर उसे ऊपर उठने और आगे बढ़ने का साहस देता है।
जब मनुष्य अपने जीवन के लिए विश्वास का निर्माण करता है, तभी उसे अपनी मूल प्रकृति का पता चलता है। जब हम अपनी प्रकृति को जानने लगते हैं, तभी संस्कृति का निर्माण शुरू होता है। मानवीय प्रकृति का ज्ञान ही संपूर्ण प्रकृति से विनोबा की तरह जुड़ाव वाला जीवन शुरू करता है।
विनोबा अपनी मूल प्रकृति की गहरी समझ रखने वाले आत्मज्ञानी संत थे। उनके जैसा जीवन जीने वाले संत-महात्मा बहुत कम हुए हैं। उनकी जवानी बापू के साथ बीती। इसलिए वे जीवन के संस्कार और विचार को संतत्व में समृद्ध बनाने वाला जीवन जीते रहे। उनका स्वप्न प्रेम और विश्वास का था। उन्होंने अपने समय के बहुत से लोगों में गहरी आस्था पैदा की और शुद्ध साधनों से साधना करके प्रकृति, संस्कृति और सत्य के साथ जीवन जीना सिखाया।
उन्होंने ‘जियो और जीने दो’ के नारे मात्र नहीं लगाए, बल्कि स्वयं उसे अपने जीवन में जीकर दिखाया। उनका जीवन भारतीय संस्कृति को संपूर्ण जगत में सम्मान दिलाने वाला था। उनकी जीवन-पद्धति ने भारतीय संत परंपरा में अद्भुत क्रांति ला दी। वे अपने आध्यात्मिक जीवन में विज्ञान को भी समान रूप से संवेदनशील और मानवीय बनाने का कार्य करते रहे।
आज प्रकृति-संस्कृति सम्मेलन का आयोजन कर हम भारतीय प्रकृति-संस्कृति के प्रति संत विनोबा भावे के योगदान का स्मरण करते हैं। यह स्मरण केवल अतीत को याद करने के लिए नहीं, बल्कि उनके विचारों को वर्तमान और भविष्य के जीवन में उतारने का अवसर है। भूदान का संदेश भूमि से आगे बढ़कर प्रेम, विश्वास, त्याग, आत्मसम्मान और समस्त जगत के कल्याण का संदेश है। यही संदेश आज भारत और दुनिया को प्रकृति-सम्मत, संस्कृति-सम्मत और विनाश-मुक्त विकास की दिशा दिखा सकता है।