किताब उत्सव के दौरान ‘हिन्दी पत्रकारिता और इंदौर’ पर श्रवण गर्ग से पत्रकार जयश्री पिंगले की बातचीत
इंदौर, 7 सितंबर। इंदौर में चल रहे राजकमल प्रकाशन के किताब उत्सव में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने ‘इन्दौर और हिन्दी पत्रकारिता’ के बारे में कहा कि अखबार अब मॉल गए हैं शॉप हो गए हैं। वहां बार्टर सिस्टम चल रहा है। कोई अखबार बिकता है तो उसमें उसका पत्रकार भी चला जाता है! जैसे दूध उत्पादकों के बच्चे कुपोषित रह जाते हैं वैसा ही इन्दौर की पत्रकारिता का है। यहॉँ का सारा दूध बाहर चला गया। राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी, वेद प्रताप वैदिक बाहर चले गए। अंग्रेजों के जमाने में भी अंग्रेजों के खिलाफ लिखने के लिए माखनलाल जी ने अखबार निकाला तो वह खंडवा से!
श्रवण गर्ग ने कहा कि इंदौर का कोई मां-बाप नहीं बचा है. वैसे ही यहां की पत्रकारिता का भी कोई मां-बाप नहीं बचा। लोगों ने छपे हुए पर यकीन करना बंद कर दिया है। अखबारों की हैसियत अब उठावने की सूचना देने तक सीमित रह गई। नकली शराब बिकती है, बांध टूटते हैं, बिल्डिंग गिरती है, लोगों की मौत होती है लेकिन हम वह सब देखना नहीं चाहते! धृतराष्ट्र तो दृष्टिहीन थे, पर हम गांधारी की तरह हो गए हैं। पहले अखबार ओपिनियन सेट करते थे, लेकिन अब वह बात नहीं है।

श्रवण गर्ग ने कहा कि अब तो नेता लोग भी इन्फ्लुएंर्स खरीद रहे हैं। मेरे संपादक रहते किसी मैनेजर की हिम्मत नहीं होती थी कि वह मेरे केबिन में घुस जाए। रमेश अग्रवाल ने घाटे में अखबार निकाला। मध्य प्रदेश में घाटा उठाया, राजस्थान में कुछ घाटा उठाया और गुजरात में नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्री रहते हुए घाटा उठाया। लेकिन अब अखबारों का जनरेशन भी चेंज हो गया है। अब वह रेवेन्यू मॉडल आ गए हैं। संपादकों तक के टारगेट फिक्स हो गए हैं। मैंने नई दुनिया छोड़ी ही इसीलिए कि मैंने जिला संवाददाताओं को टारगेट देने को मना कर दिया था। आज तब डरे हुए हैं।
अंग्रेजी पत्रकारिता की नैतिकता और निष्पक्षता पर उठाए गए एक सवाल के जवाब में श्रवण गर्ग ने कहा अंग्रेज़ी की पत्रकारिता भी उतनी ही भ्रष्ट और निकृष्ट है, जितने हिन्दी की है। हम अंग्रेज़ी की भ्रष्ट खबरों का अनुवाद हिन्दी में छापते हैं। अंग्रेज़ी की पत्रकारिता में द हिंदू अखबार के बारे में कहा जा सकता है कि वहां पत्रकारिता हो रही है और कुछ हद तक इंडियन एक्सप्रेस में पत्रकारिता हो रही है और अब थोड़ी बहुत पत्रकारिता टेलीग्राफ में हो पा रही है! बस!
मौलिक लिखने की बात खत्म हो गई है। मैं जब संपादक था तब मुझे सुधीर अग्रवाल ने पूरी आजादी दी थी। मैं अपने गांव के रिपोर्टर को बचाने के लिए भी जाता था उनसे बचा ले आता था!
जयश्री पिंगले ने इन्दौर की पत्रकारिता के बारे में विस्तृत रूप से बताया। उन्होंने मालवा अखबार के बहुत से उदाहरण दिए और यह बात भी बताई कि इंदौर के होल्कर राजवंश के कई अफसर अंग्रेज़ों के एजेंट थे और वे दिल खोलकर महाराजा के खिलाफ पुणे के अखबारों में खबरें प्लांट करवाते थे।