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सोशल मीडिया को बरतने के तौर-तरीके

सोशल मीडिया को बरतने के तौर-तरीके
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रोटी, कपडा, मकान, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों की तरह आजकल हमारे जीवन में सोशल मीडिया ने भी खासी जगह घेर ली है। रोजमर्रा के जीवन में हाल में शामिल हुआ यह ‘कारनामा’ फिलहाल नया है इसलिए इसे वापरने की कोई चाक-चौबंद तरकीब हमारे पास नहीं आई है। ऐसे में किस तरह इसे उपयोग किया जाए?


अब भारतीय समाज का बहुत बड़ा हिस्सा किसी-न-किसी सोशल मीडिया प्लेट्फॉर्म का प्रयोग करने लगा है। कम्प्यूटर का चलन बढ़ने, मोबाइल के स्मार्ट हो जाने और इण्टरनेट के सस्ता, सुलभ हो जाने से इस प्रयोग में बहुत तेज़ी से वृद्धि हुई है। बहुत सारे लोग हैं जो इसका प्रयोग अपने सामाजिक-पारिवारिक रिश्तों के निर्वाह के लिए करते हैं। वे अपने सुख-दुख की बातें करते हैं, अपने हर्ष और विषाद की ख़बरें साझा करते हैं और आवश्यकतानुसार अपनी खुशी और संवेदनाओं का आदान-प्रदान करते हैं।

इसका लगभग ऐसा ही उपयोग साहित्य और कलाओं की दुनिया के लोग भी करते हैं। वे अपनी किताब के प्रकाशन की सूचना देते हैं, अपने लेख, कविता आदि के छपने की या अपने कंसर्ट के आयोजन की ख़बर देते हैं। बहुत बार लोग अपनी रचनाशीलता की बानगी भी यहां दे देते हैं, मसलन कोई कवि अपनी कविता पोस्ट कर देता है या कोई गायक अथवा चित्रकार अपनी कला का एक अंश साझा कर देता है। अगर किसी को कोई पुरस्कार, सम्मान आदि मिलता है तो उसकी ख़बर हमें इस माध्यम से मिल जाती है। यह बात उल्लेखनीय है कि मुद्रण व अन्य संचार-माध्यम बहुत बार ऐसी ख़बरों की अनदेखी कर जाते हैं।

सोशल मीडिया का तीसरा उपयोग वैचारिक अभिव्यक्ति के लिए होता है। मान लीजिए, किसी विषय पर – चाहे वह राजनीतिक हो, धार्मिक हो, सांस्कृतिक हो, सामाजिक हो या कोई और – आप कुछ ख़ास विचारों को सोशल मीडिया के माध्यम से दूसरों तक पहुंचाते हैं। इधर मुद्रण माध्यमों और दृश्य-माध्यमों की प्रकृति में आए बदलाव के कारण वहां वैचारिक अभिव्यक्ति के लिए स्थान संकुचित हुआ है। ऐसे में सोशल मीडिया एक सशक्त विकल्प के रूप में सामने आया है। यहां न तो स्थान का अभाव है और न कोई खास सेंसर। आप जो चाहें और जैसे चाहें उस तरह अपनी बात कह सकते हैं।

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एक तरह से यह अभिव्यक्ति की आज़ादी की पराकाष्ठा है। पराकाष्ठा के अपने ख़तरे भी होते हैं और वे ख़तरे यहां साफ़-साफ़ दिखाई भी देते हैं। बहुत बार लोग अपनी बात कहते हुए शालीनता की सीमाओं का खुला उल्लंघन कर बैठते हैं। वे इस बात को समझने से पूरी तरह इंकार करते हैं कि अपनी बात शालीनता से भी कही जा सकती है। जब ऐसा होता है तो स्वाभाविक ही है कि इसकी प्रतिक्रिया भी होती है। बहुत बार प्रतिक्रिया भी उतनी ही या उससे भी ज़्यादा अशालीन होती है।

हममें से बहुत सारे लोग इस बात को समझ पाने में असमर्थ हैं कि जितना हम अपने विचारों पर दृढ़ रहने को आज़ाद हैं उतना ही आज़ाद वह भी है जिसके विचार हमारे विचारों से भिन्न हैं। समझ का यही अभाव बहुत सारी समस्याओं के मूल में है। हम सारी दुनिया को एक रंग में, और वह रंग हमारी ही पसंद का हो, रंगा हुआ देखना चाहते हैं। यह जीवन में भी होने लगा है और सामाजिक मीडिया पर भी हो रहा है। कुछ लोग इसे वैचारिक ध्रुवीकरण का भी नाम देते हैं। हालांकि यह ध्रुवीकरण से भी अधिक असहिष्णुता का मामला लगता है। हम अपने से भिन्न को स्वीकार करने और बने रहने देने को ही तैयार नहीं हैं।

भारत को अनेकता में एकता का देश कहा जाता रहा है। विविधता हमारी जीवन-शैली का अभिन्न अंग रही है। शायर सरशार सैलानी ने कहा है : ‘चमन में इख़्तिलात-ए-रंग-ओ-बू (रंग और गंध का मेल-जोल) से बात बनती है/ हम ही हम हैं तो क्या हम हैं, तुम ही तुम हो तो क्या तुम हो।’ लेकिन इधर सारा ज़ोर जैसे ‘हम ही हम’ पर हो रहा है। सोशल मीडिया पर तो जैसे घमासान होने लगा है। अगर किसी ने कुछ कह दिया तो उससे भिन्न सोच वाले उस पर बड़ी बेरहमी से टूट पड़ते हैं। बात तर्कों और तथ्यों की नहीं की जाती। अभद्र भाषा को हथियार बनाकर दूसरे पक्ष की आवाज़ को दबाया जाता है।

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ऐसे में बहुत सारे लोग यह सलाह देते हैं कि सोशल मीडिया पर किसी तरह का नियंत्रण अवश्य होना चाहिए, लेकिन सवाल यह उठेगा कि नियंत्रण किसका हो? वैसे तो अभी भी थोड़ा-बहुत नियंत्रण है। कुछ नियंत्रण स्वयं इन माध्यमों का है, जिसे लेकर बहुत सारी असहमतियां भी व्यक्त की जाती हैं। मसलन यह कि ये माध्यम किसी ख़ास पक्ष के समर्थन में या किसी ख़ास पक्ष के विरोध में अपने ‘एल्गोरिद्म’ के माध्यम से बहुत बड़ा खेल कर जाते हैं। इस बात के अनेक प्रमाण भी दिए गए हैं कि दुनिया के कई देशों में इन माध्यमों ने गम्भीर हस्तक्षेप किए हैं और यही बात सरकारी नियंत्रण के लिए भी मानी जा सकती है। किसी सरकार से वर्तमान परिदृश्य में, यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह प्रतिपक्ष की आवाज़ को दबाने के प्रयास नहीं करेगी?

सोशल मीडिया के ज़िम्मेदारी भरे प्रयोग के लिए हमें अपने नागरिकों की डिजिटल साक्षरता बढ़ाने पर ही बल देना होगा। इस बारे में स्वैच्छिक संगठन और शैक्षिक संस्थान बड़ी भूमिका निबाह सकते हैं। सोशल मीडिया को बरतने के मामले में अभी हमें बहुत कुछ सीखना है। अगर कोई सोशल मीडिया पर कुछ कह रहा है तो हमें यह सीखना होगा कि हम उससे किस सीमा तक और किस तरह असहमत हो सकते हैं। विचारणीय यह भी है कि हमें अपनी असहमति को कितना खींचना है। क्या केवल अपनी बात कहकर हट जाना है या इस ज़िद पर अड़े रहना है कि सामने वाला हमसे सहमत हो ही जाए! अगर मैं किसी से सहमत नहीं हूं तो यह बात उसकी वॉल पर जाकर कहने की बजाय क्यों न अलग से और विस्तार से अपनी वॉल पर कहूं!

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कोई सोशल मीडिया पर है, इसका मतलब यह नहीं है कि आप उसके साथ चाहे जैसा व्यवहार करें। आचरण में एक मर्यादा का निर्वाह बहुत ज़रूरी है। यह बात सोशल मीडिया के बरतने वालों को समझाना बहुत ज़रूरी है। अभी काफी हद तक एक अराजकता का माहौल बना हुआ है जिसकी वजह से यह बेहतर और सशक्त माध्यम न केवल अपनी सही भूमिका नहीं निबाह पा रहा है, उलटे देश की समरसता, शांति व सौहार्द को भी नष्ट कर रहा है। इस ख़तरे को समझना और इसके प्रसार को रोकना हमारे समय की बहुत बड़ी ज़रूरत है। सभी समझदार लोगों को इस दिशा में न केवल सोचना, सक्रिय भी होना होगा। (सप्रेस)

डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल वरिष्ठ लेखक और स्तंभकार हैं।

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