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जो गुस्सा सड़कों पर उबला वह सरोज जी की धारा की शायरी की जीत है

जनकवि की शताब्दी वर्ष में सरोज सम्मान से अभिनंदित होने के बाद बोले : गौहर रजा

ग्वालियर, 27 जुलाई। पिछली करीब चौथाई सदी से बिना किसी व्यवधान के हर वर्ष 26 जुलाई को होने वाला देश का प्रतिष्ठित साहित्यिक कार्यक्रम जनकवि मुकुट बिहारी सरोज समारोह पूरी गरिमा के साथ संपन्न हुआ । जनकवि की जन्मशताब्दी वर्ष में देश के प्रसिद्द कवि, लेखक,रचनाकार गौहर रज़ा को सरोज सम्मान 2026 से अभिनंदित किया गया । अनेक किताबों के लेखक, फिल्मकार तथा पेशे से वैज्ञानिक गौहर रज़ा मूलतः अलीगढ के हैं और देश की प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्थानों में योगदान देने के बाद इन दिनों में दिल्ली में रहकर सृजन के काम में जुटे हैं ।

सम्मानित होने के बाद बोलते हुए गौहर रज़ा ने कहा कि मुल्क एक ऐसे दौर से गुजर रहा जब पिछली पीढ़ियों के ख्वाब बिखर रहे हैं । ऐसे मे सरोज जी जैसे पहले के और आज के साहित्यकारों ने रास्ता दिखाया है और यही कविता का काम है । उन्होंने कहा कि छोटी सी कविता और लेख भी हुकूमत के लिए खतरा बनता है और यह बात हुकूमत अच्छी तरह से जानती है । इस संदर्भ में उन्होंने नाजी जर्मनी के समय के कवि पास्टर निमोलर और फैज अहमद फैज की ह्म देखेंगे नज़्म का उदाहरण दिया ।

उन्होंने कहा कि यदि संघर्ष की राह पर चलना है तो अपने कलाकारों को याद करना बहुत जरूरी हैं । इसके लिए सरोज न्यास को उन्होंने बधाई दी ।

प्रसिद्ध रचनाकार तथा सरोज सम्मान 2024 से अभिनंदित यश मालवीय (इलाहाबाद) की अध्यक्षता में हुए इस आयोजन में शुरुआत में जनकवि मुकुट बिहारी सरोज स्मृति न्यास जनकवि मुकुट बिहारी सरोज स्मृति न्यास की सचिव मान्यता सरोज ने बताया कि यह सम्मान मठो, सरकारों, पूँजी संस्थानों द्वारा जानबूझकर उपेक्षित किये गए गए , मानवता,जनता और देश के हित के मुद्दे उठाकर, जो है उसे बेहतर बनाने की दिशा दिखाने वाले रचनाकारों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए दिया जाता है । अब तक इससे 23 कवियों, साहित्यकारों को अभिनंदित किया जा चुका है । सिलसिला आगे भी जारी रहेगा ।
समारोह में ग्वालियर के वरिष्ठ गीतकार मोहन अम्बर जी के गीतों पर केन्द्रित डॉ भगवान् स्वरूप शर्मा चैतन्य द्वारा संपादित लोकमंगल के विशेषांक का विमोचन भी किया गया । इस अवसर पर उनके पुत्र शिवदान सिंह गहलोत, रविदान सिंह गहलोत भी उपस्थित थे ।

समारोह के दुसरे सत्र में आमंत्रित कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया । समानित कवि गौहर रज़ा ने
“धर्म में लिपटी वतन परस्ती क्या क्या स्वांग रचाएगी,
मसली कलियाँ, झुलसा गुलशन, ज़र्द ख़िज़ाँ दिखलाएगी।”
इसके अलावा और अनेक रचनाएं सुनाईं ।

यश मालवीय ने ” जय दिल्ली, जय दिल्ली, जयति नई दिल्ली” रचना के साथ युवाओं के ताजे उभार पर सामयिक टिप्पणी की । 

गुजरात से आई सुश्री मालिनी गौतम ने इसी रंग को आगे बढाते हुए कहा कि ” सत्ता की सबसे बड़ी हार / किसी युद्ध में नहीं होती / वह उस दिन होती है / जब एक निहत्था मनुष्य / डरने से इनकार कर देता है ।”
फिरोजाबाद से आये मंजुल मयंक ने सुनाया कि “हमारी महफ़िल में आईए हुज़ूर / दिल्ली ने जो ज़ख़्म दिये हैं दिखाइए हुज़ूर ।” न्यास के अध्यक्ष महेश कटारे सुगम ने गजलें, कविताएं सुनाई ।
मिहोना, भिण्ड से आये महेंद्र मिहोनवी ने सवाल उठाया कि “गीत और संगीत इतने अटपटे कैसे हुए / तानसेनों के ये वंशज बेसुरे कैसे हुए / पूछता हूँ आप से ये कौन सी तकनीक है / पेड़ है सूखा हुआ पत्ते हरे कैसे हुए ।

समारोह की संचालक छिंदवाड़ा से आई शेफाली शर्मा ने ” जंगल की आत्मा पर गहरे-गहरे घाव हैं / और राजा के नाखून बिल्कुल साफ हैं।” के तेवर की कविता सुनाकर जैसे सार ही रख दिया ।

2005 से लगातार दिए जा रहे सरोज सामान से सबसे पहले अभिनंदित किये गए थे अपनी विधा के अनोखे और बुंदेली के असाधारण कवि आदरणीय सीता किशोर खरे – उनके बाद जो सिलसिला शुरू हुआ वह लगातार बिना किसी चूक या विराम के लगातार जारी है । आर्थिक सीमाएं भी इसके रास्ते में हिचकिचाहट या डगमगाहट नहीं पैदा कर पाई । और धीरे धीरे जनकवि मुकुट बिहारी सरोज स्मृति सम्मान देश के साहित्य जगत के एक उल्लेखनीय और गरिमामय आयोजन के रूप में पहचान बनाने में कामयाब हो गया ।

सीताकिशोर खरे जी के बाद निर्मला पुतुल , निदा फ़ाज़ली साब, कृष्ण बक्षी, अदम गौंडवी, उदय प्रताप सिंह , नरेश सक्सेना , राजेश जोशी, डॉ. सविता सिंह , राम अधीर, प्रकाश दीक्षित, कात्यायनी , महेश कटारे ‘सुगम’ , शुभा जी और मनमोहन, मालिनी गौतम , विष्णु नागर , जसिंता केरकट्टा , देवेन्द्र आर्य, कविता कर्मकार, यश मालवीय जी तथा आरती को जनकवि मुकुट बिहारी सरोज स्मृति सम्मान से अभिनंदित किया जा चुका है। इस आयोजन में इतने सारे सूरजों का ओज शामिल है । 26 जुलाई को उसमें गौहर रजा साहब के रूप में मोती की चमक भी जुड़ जाने वाली है ।

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