विश्व जनसंख्या दिवस केवल आंकड़ों और योजनाओं की समीक्षा भर नहीं, बल्कि समाज की सोच, नीति-निर्माण और सामाजिक समावेशन का आईना है। भारत विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन चुका है — यह उपलब्धि नहीं, चेतावनी है। यह दिन पूछता है: क्या हम जनसंख्या को अवसर में बदलने लायक व्यवस्था और दृष्टि विकसित कर पाए हैं?
11 जुलाई World Population Day
संध्या शास्त्री (राजपुरोहित)

हर वर्ष 11 जुलाई विश्व जनसंख्या दिवस आते ही हम अचानक आंकड़ों और योजनाओं की तरफ देखने लगते हैं। सरकारें जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में किए गए प्रयासों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करती हैं और समाज के प्रबुद्ध वर्ग में आबादी को लेकर चर्चाएं होने लगती है। लेकिन यह दिन केवल जनसंख्या वृद्धि को संकट कहने भर का नहीं है — यह दिन सोचने की क्षमता, नीति-निर्माण के दृष्टिकोण, और सामाजिक समावेशन के स्तर का भी मूल्यांकन करने का अवसर है।
भारत आज विश्व का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बन चुका है। 2024 तक भारत की जनसंख्या 1.43 अरब का आंकड़ा पार कर चुकी है। यह संख्या अकेली नहीं है; यह हमारे सामाजिक और संसाधनात्मक ढांचे पर एक गंभीर दबाव बन चुकी है। चीन को पीछे छोड़ते हुए भारत ने यह स्थिति पाई है, लेकिन क्या यह उपलब्धि है या चुनौती — इसका उत्तर सबको अपने आसपास के जीवन से मिल सकता है। क्या हम इस बढ़ती जनसंख्या को संभालने के लिए मानसिक, सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय दृष्टि से तैयार हैं? क्या हमारी सोच, हमारी योजनाएं और हमारी व्यवस्थाएं उतनी ही विकसित हुई हैं, जितनी तेज़ी से जनसंख्या बढ़ी है?
जनसंख्या को अक्सर एक अवसर की तरह देखा जाता है — कहा जाता है कि भारत की 66 प्रतिशत जनसंख्या कार्यशील आयु वर्ग में है। यह डेमोग्राफिक डिविडेंड देश के लिए पूंजी का काम कर सकती है। लेकिन यह लाभ तभी मिलेगा जब यह जनसंख्या शिक्षित, स्वस्थ और कुशल हो। यदि संसाधनों और व्यवस्थाओं में समरसता नहीं होगी, तो यही विशाल जनसमूह असमानता, बेरोजगारी और असंतोष का कारण बन जाएगा। यह भी तथ्य है कि देश के 23 प्रतिशत युवा आज भी बेरोजगारी, अशिक्षा या प्रशिक्षण से बाहर हैं। लगभग 14.9 करोड़ बच्चे ऐसे हैं जो स्कूल नहीं जाते। यह केवल आंकड़े नहीं हैं, ये भविष्य के दरवाज़ों पर दस्तक देने वाली वास्तविकताएँ हैं। जिन्हे दर किनार नहीं किया जा सकता है ।
बढ़ती जनसंख्या का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव हमारे पर्यावरण पर पड़ा है। शहरीकरण और औद्योगीकरण की अंधी दौड़ में पिछले पंद्रह वर्षों में देश के 13 लाख हेक्टेयर से अधिक वनक्षेत्र औद्योगिक परियोजनाओं को सौंपे जा चुके हैं। यह प्रक्रिया केवल जंगलों की कटाई नहीं, बल्कि जीवनशैली और पारिस्थितिकी दोनों की तबाही है। भारत के 14 शहर वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन की रिपोर्ट में दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में गिने गए हैं। दिल्ली, पटना, कानपुर, गाजियाबाद, भिवंडी — ये केवल नाम नहीं हैं, वायुप्रदूषण के प्रतीक बन चुके हैं। नदियाँ मृतप्राय हैं, तालाब पाटे जा रहे हैं और भूजल स्तर तेजी से गिरता जा रहा है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार भारत के 21 प्रमुख शहरों में 2030 तक भूजल समाप्त हो सकता है। यह संकट केवल पर्यावरण का नहीं, हमारे अस्तित्व का भी है।
जनसंख्या वृद्धि से जीवन स्तर पर भी गंभीर असर पड़ा है। ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ हर भारतीय का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन क्या ये मूलभूत सुविधाएं सभी को उपलब्ध हैं? 13.5 करोड़ लोग आज भी पक्के मकान से वंचित हैं। लगभग 19 करोड़ भारतीय कुपोषण के शिकार हैं। झुग्गियों में रहने वालों की संख्या 70 लाख से अधिक हो चुकी है, जिनके पास स्वच्छ जल, शौचालय और स्वास्थ्य सेवाएं नहीं हैं। भारत में आज भी करीब 1.8 करोड़ लोग खुले में शौच के लिए मजबूर हैं। यह स्थिति केवल बुनियादी सुविधाओं की कमी नहीं दर्शाती, बल्कि यह हमारी सामाजिक प्राथमिकताओं और विकास की दिशा पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
हर वर्ष लाखों लोग गाँवों से शहरों की ओर पलायन करते हैं। लगभग 90 लाख लोग प्रतिवर्ष शहरों की ओर आते हैं, रोजगार, शिक्षा और बेहतर जीवन की उम्मीद में। परंतु शहरों की स्थिति भी दयनीय है। वे पहले से ही भीड़ से घिरे हैं, बुनियादी सेवाएं चरमराई हुई हैं और नई आबादी को समाहित करने के लिए न योजनाएं हैं, न संसाधन। पलायन करने वाले लोग अधिकतर दिहाड़ी मजदूर, निर्माण कार्य में लगे श्रमिक, घरेलू सहायक या रिक्शा चालक बनते हैं। उनके बच्चे स्कूल नहीं जा पाते, महिलाएं असुरक्षित परिस्थितियों में काम करती हैं और उनका जीवन अस्थायित्व के दायरे में सिमट जाता है।
यदि इस समग्र परिप्रेक्ष्य में हम भारत के आदिवासी इलाकों की बात करें, तो तस्वीर और भी मर्मस्पर्शी हो जाती है। भारत की कुल जनसंख्या का लगभग 8.6 प्रतिशत अनुसूचित जनजातियों से संबंधित है। ये समुदाय प्राचीन, सांस्कृतिक और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े रहे हैं, लेकिन आधुनिक विकास की दौड़ में सबसे अधिक हाशिए पर इन्हें ही रखा गया है। मध्य प्रदेश, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पूर्वोत्तर राज्यों में स्थित आदिवासी क्षेत्र आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य और संचार जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। आदिवासी बच्चों में कुपोषण, शिशु मृत्यु दर और अशिक्षा की दर सामान्य से बहुत अधिक है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रिपोर्टें बताती हैं कि आदिवासी महिलाओं को गर्भावस्था और प्रसव के समय आवश्यक चिकित्सकीय सहायता नहीं मिल पाती। कई इलाकों में एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक पहुँचने के लिए दस से पंद्रह किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है। बच्चों की टीकाकरण दर और स्कूली शिक्षा के आँकड़े भी निम्न हैं। आदिवासी बहुल जिलों में लगभग 40 प्रतिशत से अधिक बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित पाए गए हैं।
साथ ही, पर्यावरणीय दोहन और औद्योगिक विस्तार ने आदिवासियों को सबसे अधिक प्रभावित किया है। खनन, बाँध, और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं ने लाखों आदिवासी परिवारों को उनके पैतृक गाँवों से विस्थापित किया है। वर्ष 2006 में लागू वन अधिकार अधिनियम के तहत आदिवासियों को उनकी जमीन और जंगल पर अधिकार देने का वादा किया गया था, लेकिन 2024 तक लगभग 12 लाख परिवार ऐसे हैं जिनका मामला अब भी लंबित है। जिनके लिए जंगल जीवन का पर्याय था, वे आज कागज़ी युद्ध में उलझ कर रह गए हैं।
शहरों में भी आदिवासी परिवार बेहतर जीवन नहीं पा सके हैं। वे छोटे-मोटे कामों में लग गए हैं, लेकिन उनकी सांस्कृतिक पहचान, भाषा और परंपराएँ शहर की दीवारों में दबती जा रही हैं। स्त्रियाँ घरेलू कामगार बन गई हैं। उनकी परंपरा, कला, ज्ञान और प्राकृतिक जुड़ाव को न तो शिक्षा व्यवस्था समझ पाई है, न शासन की योजनाएं।
आज भी भारत के कई हिस्सों में जनसंख्या नियंत्रण एक वर्जित विषय है। पुरुष नसबंदी को लेकर सामाजिक झिझक अब भी बहुत प्रबल है। स्थायी गर्भनिरोध के लगभग 90 प्रतिशत उपाय महिलाओं पर ही लागू होते हैं। यह केवल स्वास्थ्य या व्यवस्था की नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता की समस्या है।
महिलाओं को आज भी शिक्षा, रोजगार और निर्णय प्रक्रिया में बराबरी नहीं मिलती। देश में श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी मात्र 25 प्रतिशत है। घरेलू कार्य को अब भी ‘काम’ नहीं माना जाता। निर्णय लेने वाले मंचों पर महिलाओं की संख्या नगण्य है। शिक्षा की दर भले ही बढ़ी हो, परंतु सोच अब भी उस स्तर पर नहीं पहुँची है जहाँ हम एक समान समाज की कल्पना कर सकें। महिलाएं अभी भी निर्णय प्रक्रिया में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं रखतीं। एक ‘कामकाजी महिला’ आज भी समाज में असामान्य घटना के रूप में देखी जाती है, जबकि यह उसकी स्वतंत्रता का प्रतीक होना चाहिए।
यह स्पष्ट है कि कोई एक योजना, नीति या कानून इस संकट का समाधान नहीं कर सकता। आवश्यकता है — सोच के पुनर्निर्माण की, उस चेतना की जो हर नागरिक को समान अवसर, गरिमा और सम्मान के साथ देखे। परिवार नियोजन को स्वास्थ्य का हिस्सा नहीं, मानव अधिकार के रूप में देखना होगा। महिलाओं को केवल लाभार्थी नहीं, नीति-निर्माता की भूमिका में लाना होगा। आदिवासी क्षेत्रों में योजनाओं को उनके सांस्कृतिक और भौगोलिक संदर्भ में डिजाइन करना होगा। शिक्षा केवल साक्षरता नहीं, बल्कि वैचारिक आज़ादी का माध्यम बननी चाहिए।
अगर हम हर स्त्री, हर बच्चे, हर आदिवासी, हर नागरिक के अधिकार और गरिमा की रक्षा नहीं कर पा रहे हैं, तो यह बढ़ती जनसंख्या हमारे लिए एक अवसर नहीं, बल्कि एक बोझ बनती जाएगी। हैं। यह दिन सिर्फ आंकड़ों को देखने या सरकारों की योजनाओं की समीक्षा का अवसर नहीं है, बल्कि एक ज़रूरत है — सामूहिक आत्ममंथन की और यह जानने की कि क्या हम एक जीवंत, विवेकशील समाज की ओर बढ़ रहे हैं या सिर्फ भीड़ का हिस्सा बनते जा रहे हैं। जब तक समाज का सबसे कमजोर वर्ग सशक्त नहीं होगा, तब तक कोई भी जनसंख्या लाभ नहीं दे सकती। सोच को बदलना सबसे पहला और सबसे ज़रूरी कदम है। अब समय है कि हम सोचें — हम कहाँ जा रहे हैं? और उससे भी ज़रूरी यह है कि हम यह तय करें — हमें कहाँ जाना चाहिए।


