विचार : भविष्य में युवा राष्ट्र से कहीं बूढ़ा भारत न बने!

श्याम यादव

देश की जनसंख्या को लेकर कोई भी टिप्पणी प्रतिक्रिया की वजह बनती है। हाल ही में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि हर परिवार को तीन बच्चे पैदा करना चाहिए। इसके पीछे भी उन्होंने एक कारण बताया। संभव है कि उनका ये बयान बहस का मुद्दा बने। वास्तव में जन्म दर का गिरना राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक ढांचे से जुड़ी चुनौती है।

श्याम यादव

दुनिया आज जनसंख्या परिवर्तन के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। कुछ देशों में जनसंख्या अब भी बढ़ रही है, तो कई देशों में यह लगातार घट रही है। संयुक्त राष्ट्र की ‘विश्व जनसंख्या संभावना 2024’ रिपोर्ट बताती है कि आने वाले दशकों में वैश्विक आबादी का विकास पहले के अनुमान से कहीं धीमा रहेगा। 2030 तक दुनिया की जनसंख्या लगभग 10.2 अरब होगी, जो पहले के अनुमान से लगभग 70 करोड़ कम है। इसका अर्थ है कि जन्म दर घट रही है और छोटे परिवारों का रुझान बढ़ रहा है। यह बदलाव केवल जनसंख्या विज्ञान का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डालने वाली चुनौती है।

भारत लंबे समय तक युवा राष्ट्र कहलाता रहा है। इसकी वजह थी कामकाजी उम्र की विशाल आबादी। लेकिन, अब तस्वीर बदल रही है। नमूना पंजीकरण प्रणाली (एसआरएस) 2023 की रिपोर्ट बताती है कि भारत की कुल प्रजनन दर (टीएफआर) 1971 में 5.2 थी, जो अब घटकर 1.9 रह गई है। यह 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से भी नीचे है। साथ ही 0 से 14 साल की आयु वर्ग की हिस्सेदारी 1991 में 36 प्रतिशत से घटकर अब 24% पर आ चुकी है। यानी नए बच्चों का आधार सिकुड़ रहा है। दूसरी ओर कामकाजी उम्र वाले लोग (15–59 वर्ष) बढ़कर 66% हो चुके हैं। यह फिलहाल आर्थिक ताकत है, लेकिन धीरे-धीरे यही समूह वृद्ध होता जाएगा। आज देश की लगभग 10% आबादी 60 साल से ऊपर है और दक्षिण भारत जैसे राज्यों में यह हिस्सा 14 से 15% तक पहुँच गया है।

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में कहा कि हर दंपत्ति को तीन बच्चे पैदा करने चाहिए, ताकि भविष्य में कामकाजी आबादी बनी रहे। उनका यह कथन बहस का विषय हो सकता है। जन्म दर का गिरना केवल धार्मिक या सांस्कृतिक संदर्भ का सवाल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक ढांचे से जुड़ी चुनौती है।

जापान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। 2008 से वहाँ जनसंख्या घट रही है, विवाह और बच्चों के प्रति रुचि कम हो चुकी है और बुजुर्गों की संख्या युवाओं से अधिक है। दक्षिण कोरिया में जन्म दर दुनिया की सबसे कम है और सरकार को भारी सामाजिक और आर्थिक संकटों से जूझना पड़ रहा है। यूरोप के कई देशों में भी स्थिति गंभीर है। ग्रीस में स्कूल तक बंद करने पड़े और बुल्गारिया व लातविया जैसे देशों में 2050 तक जनसंख्या में 20% से अधिक गिरावट का अनुमान है। अमेरिका तक इस दबाव को महसूस कर रहा है। टेस्ला व स्पेसएक्स के संस्थापक एलन मस्क इसे मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं। उनका कहना है कि असली संकट ‘जनसंख्या विस्फोट’ नहीं बल्कि ‘जनसंख्या गिरावट’ है।

भारत के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर मौजूदा युवा आबादी को सही शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार देकर डेमोग्राफिक डिविडेंड को वास्तविक लाभांश में बदलना है, तो दूसरी ओर वृद्ध होती जनसंख्या की तैयारी करनी है। यदि परिवार-अनुकूल नीतियां, सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं अभी से मजबूत नहीं की गईं, तो भारत भी वही स्थिति झेलेगा जो जापान और यूरोप झेल रहे हैं।

प्रजनन दर का गिरना एक मायने में प्रगति का संकेत है। शिशु मृत्यु दर कम हुई है, मातृ स्वास्थ्य बेहतर हुआ है और छोटे परिवारों के कारण बच्चों की शिक्षा व परवरिश की गुणवत्ता बढ़ी है। लेकिन, यह भी सच है कि यदि यह गिरावट लगातार जारी रही और रोजगार व सामाजिक सुरक्षा ढाँचे को समय रहते मजबूत नहीं किया गया, तो भारत का ‘युवा राष्ट्र’ का गौरवशाली दर्जा धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा। यदि आज का भारत अपनी युवा शक्ति का सही उपयोग नहीं कर पाया, तो आने वाला भारत युवा राष्ट्र नहीं, बल्कि वृद्ध राष्ट्र कहलाएगा।

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श्याम यादव स्‍वतंत्र पत्रकार है।

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