भगत सिंह की फांसी और महात्मा गांधी

अरुण कुमार डनायक

महात्मा गांधी भी न केवल फांसी की सजा के विरोध में थे, वरन उन्होंने हिंसात्मक गतिविधियों में लिप्त, क्रांतिकारियों, नजरबंद लोगों की रिहाई की मांग लार्ड इरविन से की, जिन्हें अंग्रेजी हुकूमत ने बिना मुकदमा चलाए, बिना अभियोग लगाए या सजा सुनाए ही जेलों में बंद कर रखा था। अहिंसा के पक्षधर गांधीजी ने हिंसा में लिप्त रहे भगत सिंह की फांसी की सजा रद्द करने के लिए भी जोरदार पैरवी की। वाइसराय ने गांधीजी की इन दोनों पेशकश को मंजूर नहीं किया।

भगतसिंहसुखदेव और राजगुरु के शहादत दिवस(23 मार्च) पर विशेष

शहीदे आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने 1928 में लाहौर में एक ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की गोली मारकर हत्या कर दी थी। इसके अलावा केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने के मामले में भी भगत सिंह पर मुकदमा चला था। वाइसराय लॉर्ड इरविन ने इन मामलों पर मुकदमे के लिए एक विशेष ट्राइब्यूनल का गठन किया, जिसने तीनों को फांसी की सजा सुनाई और उसकी तिथि 24 मार्च तय की गई थी। लेकिन अंग्रेजी हुकूमत ने सरदार भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 23 मार्च 1931 की शाम को अचानक ही फांसी पर चढ़ा दिया और वे तीनों ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ गाते हुए हँसते-हँसते फांसी के फंदे पर चढ़ गए।

जब भगत सिंह और उनके साथियों पर मुकदमा चल रहा था तब गांधीजी यरवदा जेल में बंद थे और 25 जनवरी 1931 को उनकी रिहाई हुई तथा वाइसराय के साथ उनकी बातचीत का दौर चलने लगा। लगभग तीन हफ्ते तक चली बातचीत का परिणाम 05 मार्च 1931 को ‘गांधी-इरविन समझौते’ के रूप में निकला। हालांकि नेहरू जी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और अनेक युवा वाइसराय के साथ हुए समझौते के कुछ अंशों से असहमत थे, पर कांग्रेसी मोटे तौर पर इस समझौते के पक्ष में थे। इधर देश भर में भगत सिंह को फांसी की सजा का व्यापक विरोध हो रहा था। इस सजा के खिलाफ ‘प्रिवी काउंसिल’ में भी एक असफल अपील की गई।

महात्मा गांधी भी न केवल फांसी की सजा के विरोध में थे, वरन उन्होंने हिंसात्मक गतिविधियों में लिप्त, क्रांतिकारियों, नजरबंद लोगों की रिहाई की मांग लार्ड इरविन से की, जिन्हें अंग्रेजी हुकूमत ने बिना मुकदमा चलाए, बिना अभियोग लगाए या सजा सुनाए ही जेलों में बंद कर रखा था। अहिंसा के पक्षधर गांधीजी ने हिंसा में लिप्त रहे भगत सिंह की फांसी की सजा रद्द करने के लिए भी जोरदार पैरवी की। वाइसराय ने गांधीजी की इन दोनों पेशकश को मंजूर नहीं किया।

क्रांतिकारियों को छोड़ने की बात हो अथवा भगत सिंह की फांसी की सजा मुल्तवी करने की मांग हो, यह दोनों विषय ‘गांधी-इरविन समझौते’ से संबंधित नहीं थे। फिर भी भारतीयों की तीव्र भावनाओं को ध्यान में रखते हुए गांधी जी ने इस पर जोर दिया। शहीदे आजम को फांसी देने के 91 वर्ष बाद आज तक यह सवाल लोगों के मन में उठता रहता है कि उनकी फांसी की सजा रुकवाने के लिए गांधीजी ने क्या किया? लोग आज भी सोचते हैं कि गांधीजी अगर चाहते तो अंग्रेजी हुकूमत पर दबाव डालकर फांसी की सजा रुकवा सकते थे। 

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भगत सिंह की सजा पर गांधीजी ने सर्वप्रथम वाइसराय से 18 फरवरी 1931 को चर्चा की। उन्होंने भगत सिंह को बहादुर बताते हुए कहा कि ‘हमने जो बात की है उसके साथ इसका कुछ संबंध नहीं है और शायद मेरा इस बात का जिक्र करना भी अनुचित माना जाएगा, किन्तु आजकल के वातावरण को ज्यादा अनुकूल बनाना हो तो आपको चाहिए कि फिलहाल भगत सिंह की फांसी को मुल्तवी कर दें।’ दूसरी तरफ वायसराय का जवाब भी आश्वस्त करने वाला था। उन्होंने गांधीजी से कहा कि ‘सजा कम करना कठिन काम है, किन्तु उसे मुल्तवी करने की बात पर तो अवश्य विचार किया जाना चाहिए।’

गांधीजी के विचार फांसी की सजा के विरुद्ध बहुत ही स्पष्ट थे। वे मानते थे कि ऐसी सजा से व्यक्ति को सुधरने का मौका नहीं मिलता और फिर वे भगत सिंह की फांसी के कारण देश में उठने वाले तूफान से भी चिंतित थे। 05.03.1931 को समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद  गांधीजी की ओर से समाचार पत्रों के लिए जारी किए गए वक्तव्य में भी हिंसात्मक गतिविधियों में लिप्त रहे क्रांतिकारियों की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा गया कि ‘वे बुद्धि होने का न सही पर मेरे बराबर देशप्रेमी और त्यागी होने का दावा कर सकते हैं और इसीलिए यदि मैँ उनकी स्वतंत्रता, न्याय रीति से प्राप्त कर सकता तो मैं सचमुच अपने और अपने साथी सत्याग्रहियों से पहले उन्हें मुक्त कराता।’

गांधीजी ने इसी के साथ जेलों में बंद हिंसक विचारधारा के समर्थकों से अपील की कि ‘अभी आप कांग्रेस के दूसरे सब राजनीतिक कैदियों को छुड़ाने का और संभवत: हत्या के अपराध में फांसी की सजा पाए हुए कैदियों को भी बचाने का मौका दें।’ यद्दपि हिंसा में लिप्त देशभक्तों की सजा समाप्त करने का प्रस्ताव ‘गांधी-इरविन समझौते’ का अंग नहीं था, तथापि गांधीजी ने उन्हें जेल से मुक्त कराने और फांसी की सजा पाए हुए कैदियों की सजा मुल्तवी करने की बात वाइसराय के सामने रखने के लिए, उपलब्ध सभी अवसरों का उपयोग किया। यह अलग बात है कि ब्रिटिश सरकार ने उनकी बात नहीं मानी।

गांधीजी ने लार्ड इरविन से अपनी वार्ता के परिणाम को अस्थाई समझौता माना, उसे लागू करने और अपनी ओर से न तोड़ने का वचन वाइसराय को दिया। उन्हें उम्मीद थी कि भगत सिंह आदि को रिहा कराने का रास्ता, इस अस्थाई समझौते को कार्यरूप देने से खुल सकता है। यह बात उन्होंने बड़े विस्तार से दिल्ली की एक सार्वजनिक सभा में 07.03.1931 को कही थी। मध्य मार्च में जब गांधीजी मुंबई में थे तब नेताजी सुभाष चंद्र बोस को उन्होंने हिंसा में लिप्त राजनैतिक कैदियों की रिहाई के विषय को समझौते में शामिल नहीं किए जाने का कारण बताते हुए कहा था कि चूंकि हिंसक गतिविधियों में लिप्त कैदियों की ओर से सरकार को उनके हिंसा को त्याग देने का आश्वासन देना संभव नहीं था इसलिए उनकी रिहाई की शर्त संधि वार्ता में शामिल नहीं की गई। गांधीजी ने विश्वास व्यक्त किया था कि हिंसक क्रांतिकारियों को छह माह के अंदर जेल से मुक्ति मिल जाएगी ।

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कराँची  में कांग्रेस के अधिवेशन के पहले गांधीजी दिल्ली में थे और उन्होंने वाइसराय से 19 मार्च को मुलाकात की। सरकार की ओर से इस वार्तालाप का जो नोट जारी हुआ उसमें भगत सिंह को लेकर दोनों के बीच की वार्तालाप के अंश महत्वपूर्ण हैं – ‘जाते-जाते उन्होंने (गांधीजी) कहा कि आप भगत सिंह का उल्लेख करने की आज्ञा दें तो मैंने अखबार में पढ़ा है कि फांसी की तारीख 24 मार्च घोषित की गई है। यह एक दुर्दिन ही होगा; ठीक उसी दिन कांग्रेस के नए अध्यक्ष कराँची पहुचेंगे और जनता में बड़ी उत्तेजना होगी।’ मैंने (वाइसराय) उन्हें बताया कि मैंने इस मामले में बहुत ध्यान से विचार किया है, पर मुझे अपने मन में सजा कम करने के औचित्य का कोई ठोस आधार नहीं मिला। जहां तक तारीख का सवाल है, मैंने कांग्रेस के अधिवेशन तक इसे टालने की संभावना पर विचार किया था, पर जानबूझकर अनेक कारणों से उसे रद्द कर दिया।’

इस वार्तालाप  के बाद भी गांधीजी यद्दपि भगत सिंह को बचाए जाने को लेकर आशान्वित थे, पर इसकी संभावनाएं क्षीण हैं ऐसा उन्हें लगने लगा था। गांधीजी ने एक बार पुन: प्रयास किया और वाइसराय को 23 मार्च 1931 को एक पत्र लिखकर भगत सिंह की फांसी की सजा कम करने की अपील की। उन्होंने अपनी अपील में जो कारण बताए वे बहुत ही भावनात्मक थे और जनमत का मान रखने से लेकर शांति की स्थापना और क्रांतिकारियों की ओर से भविष्य में हिंसा नहीं किए जाने का आश्वासन भी था। यद्यपि 23 मार्च, सोमवार को गांधीजी के मौनव्रत का दिवस था, तथापि गांधीजी ने वाइसराय से व्यक्तिगत मुलाकात कर अपनी बात लिखकर देने का अनुरोध भी किया और पत्र की समाप्ति इन शब्दों के साथ की कि ‘दया कभी निष्फल नहीं जाती।’

गांधीजी के तमाम प्रयास बेकार हो गए। वाइसराय ने एक बार फिर गांधीजी की मार्मिक अपील को अनसुना कर दिया। भगत सिंह और उनके साथियों को 23 मार्च 1931 की शाम को अचानक फांसी पर लटका दिया गया। इस घटना से गांधीजी बहुत निराश हुए और तत्काल एक वक्तव्य जारी कर अंग्रेजी हुकूमत के इस पाशविक व्यवहार की कठोर निंदा की। उन्होंने शांतिपूर्ण तरीके से सार्वजनिक हड़ताल करने और जुलूस निकालकर मौत के मुँह में जाने वाले इन देशभक्तों का सम्मान करने का आह्वान किया। 

फांसी पर हँसते-हँसते चढ़ गए इन वीर सपूतों के लिए जनता में श्रद्धा का भाव था और शोक से भरे इस वातावरण के बीच 26 मार्च से कराँची में कांग्रेस का अधिवेशन प्रारंभ हुआ। महात्मा गांधी जब कराँची पहुंचे तो उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा। ‘अखिल भारतीय नवजवान भारत सभा’ से संबद्ध युवकों के एक समूह ने उन्हें काले कपड़े के फूल दिए, ‘गाँधीवादी का नाश हो,’  ‘गांधी वापस जाओ’ के नारे लगाए। यह सब उस स्थिति से भिन्न था जिसे नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने मुंबई से दिल्ली आते वक्त देखा और अपनी आत्मकथा में लिखा कि ‘बड़ी भीड़ स्टेशनों पर महात्मा जी का स्वागत कर रही थी, उनकी जय-जयकार कर रही थी, वे अपनी लोकप्रियता के चरमोत्कर्ष पर थे।’

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वामपंथी विचारधारा से प्रभावित काँग्रेस के सदस्यों व युवकों को ऐसा लगता था कि भगत सिंह को फांसी दिए जाने के बावजूद गांधीजी समझौते को तोड़ने के अनिच्छुक थे। वे गांधीजी को भगत सिंह व उनके साथियों को न बचा पाने का गुनहगार मानते थे और स्वयं को ठगा हुआ महसूस करते थे। इस विरोध प्रदर्शन को गांधीजी ने अविचलित भाव से देखा और इसे युवकों के क्रोध का परिणाम बताया। गांधीजी की निगाह में काले फूल, जो उन्हें भेंट किए गए थे, तीन देशभक्तों की चिता की राख थे। सुभाष चंद्र बोस  और जवाहरलाल नेहरू जैसे युवा नेता भी ‘गांधी-इरविन समझौते’ की कतिपय शर्तों से संतुष्ट नहीं थे। दूसरी तरफ, अंग्रेजों ने भगत सिंह की फांसी की तिथि कांग्रेस अधिवेशन के ठीक पहले इसीलिए रखी थी ताकि कांग्रेस में फूट पड़ जाए, ‘गांधी-इर्विन समझौते’ पर मुहर न लगे और अंग्रेजों को कांग्रेस पर समझौता तोड़ने का आरोप लगाने का मौका मिल जाए।

सुभाष बाबू अंग्रेजों की इस कुटिल चाल को पहचान गए, वे वाइसराय और कांग्रेस के बीच पहली बार हुए इस ऐतिहासिक समझौते की अहमियत समझते थे। उन्होंने अपने वामपंथी साथियों को समझौते के खिलाफ मतदान न करने के लिए तैयार कर लिया। नेहरू जी यद्यपि शुरू में इस  प्रस्ताव को पेश करने के इच्छुक नहीं थे, पर बाद में वे भी इसके लिए तैयार हो गए। समझौते पर कांग्रेस की मुहर लगी, लेकिन उसके पहले एक प्रभावशाली भाषण गांधी जी ने दिया। उन्होंने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के अमर बलिदान की एक बार पुन: भूरि-भूरि प्रसंशा की, अंग्रेज सरकार की इस अमानुषिक कारवाई की कठोर शब्दों में निंदा की और विरोध प्रदर्शन करने वाले युवकों से सहानुभूति व्यक्त की, उनके प्रदर्शन को क्रोध की अभिव्यक्ति माना, उन्हें क्षमा करने की अपील की, साथ ही क्रांतिकारी गतिविधियों में लिप्त युवकों से हिंसा का त्याग कर अहिंसक आंदोलन के जरिए देश को आजाद कराने में सहयोग देने की गुजारिश की। भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह ने भी अपने पुत्र का अंतिम संदेश अधिवेशन में उपस्थित लोगों को बहती हुई अश्रुधारा के बीच सुनाया और सभी से कांग्रेस और महात्मा गांधी का साथ देने की भाव-भीनी अपील की। 

27 फरवरी 1931 को चंद्रशेखर आजाद, इलाहाबाद में अंग्रेजों से मुठभेड़ करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए थे। भगत सिंह और उनके साथियों की शहादत के बाद गांधीजी के आग्रह पर अधिकांश क्रांतिकारियों ने हिंसा के मार्ग को त्याग दिया और कांग्रेस के बैनर तले भारत की स्वतंत्रता के आंदोलन में अपना जीवन न्योछावर कर दिया। यह सम्पूर्ण घटनाक्रम इस तथ्य का परिचायक है कि उस वक्त के नेताओं में दूरदृष्टि थी, वे छुद्र स्वार्थों से ऊपर उठकर देशहित की सोचते थे, मतभेद थे पर एक दूसरे के प्रति प्रेम और सम्मान भी था। (सप्रेस)  

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