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बाजार को बरकाने लायक विकल्‍प

बाजार को बरकाने लायक विकल्‍प

कोविड-19 महामारी से उपजी आर्थिक महामंदी ने बाजारों में खलबली मचा दी है। इससे निपटने के लिए तरह-तरह की सरकारी राहतों के अलावा नोट छापकर बांटने तक के सुझाव दिए जा रहे हैं। क्‍या महात्‍मा गांधी, जिन्‍होंने 1930 की पिछली...

प्रेरणा

कोविड-19 महामारी से उपजी आर्थिक महामंदी ने बाजारों में खलबली मचा दी है। इससे निपटने के लिए तरह-तरह की सरकारी राहतों के अलावा नोट छापकर बांटने तक के सुझाव दिए जा रहे हैं। क्‍या महात्‍मा गांधी, जिन्‍होंने 1930 की पिछली वैश्विक महामंदी को देखा-समझा था, इससे निपटने की कोई तजबीज दे सकते हैं? क्‍या बाजार को बरकाकर भी इस आर्थिक संकट का कोई निदान हो सकता है?

दीपावली आने पर है। जीवन की कठिनाइयों को सह्य बनाने के लिए आदमी ने त्यौहारों की कल्पना की होगी। कठिनाइयां कम क्या हुईं यह तो पता नहीं, लेकिन त्यौहार खुद ही एक समस्या बन गये हैं, यह हम रोज देख रहे हैं। त्यौहार क्या हुए, बाजार का हमला हो गया।  

छोटी-बड़ी कंपनियां महीनों पहले से त्यौहारों में दी जाने वाली छूटों की योजना बना लेती हैं और विज्ञापनों की बमबारी शुरू हो जाती है। एक या दो पीढ़ी पहले की बात करूं, तो होता यह था कि उपभोक्ता भी अपनी ख़रीदी त्यौहार के दिनों के लिए स्थगित रखता था। अब बाजार सांस लेने ही नहीं देता है। फ़िल्मी कलाकार अक्षय कुमार कहते हैं कि ‘रुको नहीं, कुछ-न-कुछ नया करते रहो;’ खिलाड़ी विराट कोहली कहते हैं कि ‘घड़ी हो या रिश्ते, फ़ास्ट ट्रैक पर बदलो!’

कोरोना काल में तो खरीदी का एक नया ही मतलब समझ में आ रहा है। सरकार हो कि प्रचार तंत्र कि कंपनियां कि दूकानें कि गली के नाके पर बना होटल, सभी सन्निपात में पड़े हैं कि उपभोक्ता अपने बिल से निकल क्यों नहीं रहा? लोग खर्चा करें इसके लिए बैंक कर्ज दे रहे हैं, सरकार योजनाएं दे रही है और उद्योग छूट दे रहे हैं, लेकिन उपभोक्ता मुंह फिरा कर बैठा है। उसकी नौकरी चली गई है या कभी भी चली जा सकती हैं। पगार कट कर आधी भी नहीं मिल रही है, और उसका बचत-खाता शून्य हो चुका है।     

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यह दूसरी या तीसरी बार ही हो रहा है, जब बाजार इस तरह से उपभोक्ता के दबाव में है। औद्योगिक व्यवस्था में अमूमन मंदी तब आती है, जब उत्पादन जरूरत से ज़्यादा हो जाए और उपभोक्ता की खरीदने की गति पिछड़ जाए, लेकिन यह मंदी अलग है। उपभोक्ता की खर्च करने की शक्ति ही कम हो गई है, इच्छाशक्ति भी चूक गई है। मांग न होने की वजह से उत्पादक उत्पादन तो घटाता जा रहा है, लेकिन मांग उससे भी तेजी से घट रही है। थोक उत्पादन की मजबूरी यह है कि एक हद के बाद उत्पादन घट नहीं सकता, कंपनियां दिवालिया ही हो सकती हैं। दुनिया ने ऐसी मंदी इससे पहले, प्रथम विश्वयुद्ध के बाद, 1930 के दौरान देखी गई थी। इसे महामंदी का नाम दिया गया था। इस मंदी पर शोध करने वालों को नोबल पुरस्कार भी मिला और आने वाले समय में 1930 की मंदी से मिली सीख से योजनाएं भी बनीं। योजनाएं बनती रहीं, मंदी अपनी जगह बनी रही। कोविड-19 की वजह से बनी इस मौजूदा मंदी को 1930 के बाद की सबसे विकट महामंदी माना जा रहा है।

आज पहल उत्पादक के हाथ में नहीं, उपभोक्ता के हाथ में है। उसे मनाया जा रहा है, तरह-तरह की छूट दी जा रही है। उसके खातों में पैसे डाले जा रहे हैं। कई तरह के विज्ञापन बन रहे हैं। लोग खर्च करेंगे, तभी लोगों के घर चलेंगे, रोज़गार पैदा होगा, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल खर्च करने से रोज़गार पैदा होता है? अगर ऐसा था तब तो मंदी आनी ही नहीं चाहिए थी। आज तो बाज़ारवाद, उपभोक्तावाद अपने चरम पर है। जो हमें नहीं चाहिए, वह भी हम ख़रीदते हैं। बाजार नई-नई ज़रूरतें पैदा करता है और हम उस पर खर्च भी करते हैं। फिर ऐसी मंदी क्यों आयी?

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ऐसे में गांधी हमें समझाते मिलते हैं कि केवल खर्च करने से रोज़गार पैदा नहीं होते हैं। खर्च कौन कर रहा है, कमाई कहां जा रही है और खर्च किन चीजों पर हो रहा है – यह पूरी कड़ी जब तक सही न हो, तब तक रोज़गार पैदा नहीं हो सकते। ये सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और एक-दूसरे के पूरक हैं। तब की और आज की महामंदी के अलावा दुनिया में तीसरी बार जब उपभोक्ता का दबाव बना था, वह काल था गांधी के स्वदेशी के प्रयोग का। यह एक रचनात्मक दबाव था और उसके परिणाम भी रचनात्‍मक थे। क्या गांधी के उसी सूत्र पर कोविड-19 की यह मंदी भी कस कर देखी जा सकती है?  

पहला सवाल है कि खर्च कौन कर रहा है? अपनी बुनियादी जरूरत से थोड़ा अधिक खर्च केवल वह करता है जिसके पास पैसे का नियमित स्त्रोत बना हुआ है। इसलिए ज़रूरी है कि पैसा सबके पास नियमित पहुंचता रहे। अब इसे सरकार की तरफ से सीधे खाते में डाली जाने वाली रकम से जोड़िए, लेकिन ऐसी मदद लगातार संभव नहीं है। आधुनिक कुबेर अमेरिका की भी तिजोरी ख़ाली हो गई है !

सबके पास पैसे नियमित पहुंचें, इसका रास्ता है रोजगार ! लेकिन लगातार बढ़ते मशीनीकरण, थोक उत्पादन और आर्टिफ़िशल इंटेलीजेंस (एआई) के बढ़ते चलन से ज़्यादा-से-ज़्यादा काम मशीनें करेंगी तो नियमित और निश्चित रोज़गार इंसान को मिलना असंभव हो जाएगा।  

अब दूसरा सवाल। खर्च की हुई कमाई कहां जा रही है? क्या आप मेरी इस बात से सहमत होंगे कि गरीब-से-गरीब का खर्च किया हुआ पैसा भी जाता उन्हीं के पास है, जिनके पास पहले से बहुत सारा पैसा है। साबुन, मंजन, क्रीम, कपड़ा, जूता, फ़ोन, कम्प्यूटर, यहां तक कि नमक, आटा, नाश्ता और पानी भी खरीदते हम हैं, लेकिन तिजोरी उनकी भरती है, जिनका खजाना पहले से ही भरा हुआ है।   

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अब आख़िरी सवाल। उपभोक्ता किन सामानों पर खर्च करता है? अमूमन हम उन्हीं सामानों पर खर्च करते हैं जिनका प्रचार होता हो। अगर हम पहले और दूसरे सवालों को ध्यान में रखते हुए तीसरे का जवाब खोजें, तो हमें पूरा जवाब मिलता है। सभी उस तालाब को भरते हैं, जिसमें पहले से पानी भरा हुआ होता है।  

तब गांधी कहते हैं कि सभी की कमाई हो, ताकि सभी खर्च भी कर सकें और उपभोक्ता का खर्च किया हुआ एक-एक रुपया सभी में बंटे, ऐसी व्यवस्था संभव है। वे अपना चरखा आगे करते हैं : जो कातें, सो पहनें और जो पहनें, सो कातें ! मतलब माल भी, उत्पादन भी और उपभोक्ता भी एक ही हो गया – बाजार नहीं है, जरूरतें हैं और उन जरूरतों के अपने ग्राहक भी हैं। अपनी रोज की जरूरत का 80% से ज़्यादा सामान ऐसा है जो हम खुद उगा सकते हैं, बना सकते हैं और अपने पड़ोसी से खरीद सकते हैं। ताज़ा, पड़ोस में बना हुआ, शुद्ध, बिना मिलावट का सामान अपने पास मौजूद हो तो विज्ञापन वाला संदिग्ध सामान क्यों लें हम? गांधी कहते भर नहीं हैं, खादी-ग्रामोद्योग द्वारा उसे साकार भी कर दिखाते हैं।  

जो कभी साकार हुआ था उसे फिर से आकार देने की चुनौती हम स्वीकार करें तो बाजार की नकेल हमारे हाथ में होगी। सबके पास पूंजी होगी और सबके पड़ोस में सामान होगा। तब ही कह सकेंगे हम : जागो, ग्राहक, जागो ! (सप्रेस) 

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