भूदान आंदोलन के 75 वर्ष : भूमि, न्याय और नैतिकता की पुकार
इक्कीसवीं सदी के किसी भी राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, स्थानीय, यहां तक कि मोहल्ले-पडौस के आपसी द्वंद्वों को देखें तो उनकी बुनियाद में भूमि के वितरण, विभाजन दिखाई देते हैं। ऐसे में साढ़े सात दशक पहले विनोबा भावे की अगुआई में हुए…
चंबल घाटी से फिर उठी अहिंसा की आवाज
भारत डोगरा इस वर्ष 14 अप्रैल को चंबल घाटी में बागियों-डाकुओं के समर्पण के 54 वर्ष पूर्ण हुए। इस अवसर पर समर्पण करने वाले अनेक बागी यहां एकत्र हुए व उन्होंने अहिंसा व अमन-शांति की राह के लिए अपनी प्रतिबद्धता नए सिरे से दोहराई।…
नंदलाल बोस की कला साधना एवं सर्जना
नंदलाल बोस एक महान भारतीय चित्रकार थे, जिन्होंने आधुनिक भारतीय कला को नई दिशा दी। उनका जन्म 1882 में हुआ और उन्होंने शांति निकेतन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। भारतीय संविधान की मूल प्रति को सजाने का श्रेय भी उन्हें प्राप्त…
महिला आरक्षण : सशक्तिकरण की पहल या राजनीतिक रणनीति?
महिला आरक्षण विधेयक को लेकर केंद्र सरकार का विशेष सत्र बुलाना जहां एक ओर नारी सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है, वहीं इसके पीछे राजनीतिक रणनीति के सवाल भी उठ रहे हैं। परिसीमन, जनगणना और चुनावी…
डॉ. अंबेडकर : सामाजिक न्याय से राष्ट्रीय एकता तक की प्रखर दृष्टि
डॉ. भीमराव अंबेडकर की 135वीं जयंती केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि उनके व्यापक राष्ट्रवादी चिंतन को समझने का समय है। सामाजिक न्याय के पुरोधा अंबेडकर ने संविधान, अधिकारों की सुरक्षा और राष्ट्रीय एकता को सर्वोपरि रखा। आज के विभाजित…
नदी, नारी और नीर : सनातन विकास की राह
“यह रिवरफ्रंट विकास नदियों की हत्या है, नदियों को नालों में बदल देना है।” यह केवल एक तीखी टिप्पणी नहीं, बल्कि जल-संरक्षण के क्षेत्र में दशकों से काम कर रहे राजेंद्र सिंह की गहरी पीड़ा और चेतावनी है। वे मानते…
14अप्रैल, 1972 : जब बागियों ने छोड़ी बंदूकें, तब शुरू हुई चंबल में शांति की नई बयार
चंबल घाटी, जो कभी भय और हिंसा का प्रतीक थी, वहाँ संत विनोबा भावे और बाद में जयप्रकाश नारायण के प्रयासों से अहिंसा और परिवर्तन की ऐतिहासिक धारा प्रवाहित हुई। 1960 से शुरू हुआ बागियों का आत्मसमर्पण आंदोलन 1972 में…
डॉ. अम्बेडकर और लोहिया एक ही धारा को आगे बढ़ाने वाले विचारक
डॉ. भीमराव अम्बेडकर और राममनोहर लोहिया भारतीय सामाजिक-राजनीतिक चिंतन के दो ऐसे महान स्तंभ रहे हैं, जिनकी वैचारिकी में अनेक समानताएं दिखाई देती हैं। दोनों ने सामाजिक न्याय, समानता और आर्थिक विषमता के खिलाफ आजीवन संघर्ष किया। उनके बीच संवाद…
समर्पण से सशक्तीकरण : चंबल की विरासत और ‘शांति एवं महिला’ अभियान
14 अप्रैल को मनाया जाने वाला समर्पण दिवस हमें उस ऐतिहासिक क्षण की याद दिलाता है, जब चंबल के बागियों ने हिंसा का मार्ग छोड़कर आत्मसमर्पण किया। यह घटना केवल कानून व्यवस्था की सफलता नहीं, बल्कि मानव हृदय परिवर्तन की…
बदइंतजामी से बेहाल मध्यप्रदेश के बिजली उपभोक्ता
तेईस साल पहले ‘एशियन डेवलपमेंट बैंक’ के कर्ज के साथ मिले सलाह-नुमा-निर्देशों को मैदान में उतारने की खातिर ‘मध्यप्रदेश विद्युत मंडल’ को तीन तरह की कंपनियों में इसलिए विभाजित किया गया था, ताकि इससे मंडल का घाटा कम या समाप्त…









