डॉ. भीमराव अम्बेडकर और राममनोहर लोहिया भारतीय सामाजिक-राजनीतिक चिंतन के दो ऐसे महान स्तंभ रहे हैं, जिनकी वैचारिकी में अनेक समानताएं दिखाई देती हैं। दोनों ने सामाजिक न्याय, समानता और आर्थिक विषमता के खिलाफ आजीवन संघर्ष किया। उनके बीच संवाद और वैचारिक निकटता ने एक समावेशी समाज के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण आधार तैयार किया।
14 अप्रैल : भीमराव अंबेडकर जयंती
रामस्वरूप मंत्री
दलित चेतना के परचमपुरुष-ज्ञानपुंज बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर और महान समाजवादी चिन्तक व कालजयी विचारक राममनोहर लोहिया के जीवन-दर्शन और वैचारिकी में कई साम्य-बिन्दु और सादृश्यताएं हैं। दलितों के सर्वतोन्मुखी उत्थान के परिप्रेक्ष्य में दोनों एक दूसरे के साथ खड़े व चलते हुए बकौल बुद्धप्रिय मौर्य आमतौर पर डा. अम्बेडकर किसी की तारीफ करने के मामले में काफी कंजूस थे।
अगस्त 1956 में अपने एक भाषण में लोहियाजी ने बाबा साहब की तारीफ करते हुए उन्हें महान नेताओं की श्रेणी में रखा था। 1 जुलाई 1957 को मधु लिमये को संबोधित एक पत्र में बाबा साहब के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए डा. लोहिया ने लिखा है “मेरे लिए डा. अम्बेडकर हिन्दुस्तान की राजनीति के महान आदमी थे और गांधी को छोड़कर बड़े से बड़े सवर्ण हिन्दुओं के बराबर। डा. अम्बेडकर विद्वान थे। उनमें स्थिरता, साहस और स्वतंत्रता थी। वे बाहरी दुनिया को हिन्दुस्तान की मजबूती के प्रतीक के रूप में दिखाए जा सकते थे। उन्होंने इसी पत्र के अंतिम भाग में अपनी सदेच्छा व्यक्त की है कि श्रद्धा और सीख के लिए डा. अम्बेडकर को प्रतीक माना जाये। बाबा साहब की कटुता को छोड़कर उनकी स्वतंत्रता को लिया जाये और ऐसे अम्बेडकर को देखा जाये जो केवल हरिजनों के नहीं पूरे देश के नेता हों।
लोहिया व अम्बेडकर की संवाद शैली और लेखन विधा भी एक जैसी है। दोनों अपने लेखों व वक्तव्यों के दौरान कब सूत्र-वाक्य बोल देते थे, पता नहीं चलता थ। दोनों चलते-फिरते विश्वज्ञान कोष थे।
बाबा साहब और लोहिया दोनों सही मायने में विश्व-नागरिक थे, दोनों को देश की परिधि में संकुचित करना उनके विराट व्यक्तित्व का अवमूल्यन होगा।
दोनों अर्थशास्त्र के शोधार्थी थे और दोनों के आर्थिक चिन्तन में आर्थिक विषमता पर करारा प्रहार मिलता है। सन् 1915 में बाबा साहब को एम. ए. की डिग्री कोलम्बिया विश्वविद्यालय (अमरीका) में प्राचीन भारत की वाणिज्य व्यवस्था (Ancient Indian Commerce) पर मिली तो पीएचडी में उनका विषय ‘‘National divident of India & A Historical and analytical study’’ (भारतीय राष्ट्रीय लाभांश-एक ऐतिहासिक व विश्लेषणात्मक अध्ययन) था। इसके अतिरिक्त 1921 में लंदन में उन्हें ब्रिटिश भारत में साम्राज्य पूँजी का प्रादेशिक विकेन्द्रीयकरण (The provincial decentralçation of Imperial Finance in British) शोध-प्रबन्ध पर एमएससी की उपाधि मिली। उनके अक्टूबर 1922 में लिखे गए शोध-प्रबन्ध ‘‘द प्राब्लम आफ रुपी’’ को लंदन के प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों से सराहना मिली। गौरतलब है। कि उनके द्वारा यूरोप और अमरीका में अर्जित की गई सभी डिग्रियों का विषय-वस्तु अर्थशास्त्र ही रहा।
राममनोहर लोहिया के विषय में कोई संशय नहीं है कि उन्होंने समाजवाद के लिए पूरा जीवन समर्पित कर दिया। आजादी के पहले और आजादी के बाद भी गणतांत्रिक समाजवाद के मूल्यों को ताकत देने के लिए वे सतत संघर्ष करते रहे। लोहिया प्रथम पंक्ति के एक मात्र ऐसे नेता हैं जो आजादी की लड़ाई के दौरान जितनी बार जेल गए, उससे अधिक सामूहिक प्रतिकार को स्वर देते हुए आजादी के बाद भी कारावास की यातना भोगी। किन्तु समाजवाद की लौ को ज्योर्तिमय करते रहे। वर्ण-भेद अथवा नस्ल भेद के विरुद्ध लोहिया ने अमरीका में सत्याग्रह करते हुए गिरफ्तारी दी थी और अमरीकी बुद्धिजीवियों को अपने अकाट्य तर्को तथा अद्भुत मेधा के आगे झुकने के लिए बाध्य कर दिया था।
बाबा साहब के जाने के बाद लोहिया ने उनके ‘‘जाति तोड़ो अभियान’’ ‘‘अछूतोद्वार’’, ‘‘अस्पृश्यता विरोधी गतिविधियाँ’’, दलितों का मंदिर प्रवेश जैसी कार्ययोजनाओं और सोच को पूरी प्रतिबद्धता और ताकत से आगे बढ़ाया। इसमें दो राय नहीं कि भारतीय जनमानस को गांधी के बाद सबसे अधिक लोहिया व अम्बेडकर ने ही प्रभावित किया है और नए मन के नए समाज की पूर्वपीठिका तैयार की।
सन् 1955 के बाद देश का सियासी वातावरण तेजी से बदलने लगा। पंडित नेहरू के समानान्तर लोहिया व अम्बेडकर दो बड़े नाम थे। दोनों के समर्थक महसूस करने लगे थे कि दोनों को एक साथ एक मंच पर आकर देश को नया और सक्षम विकल्प देना चाहिए। केरल में थानुपिल्लै की सरकार लोहिया गिरा चुके थे, अवाड़ी सम्मेलन (1955) में पंडित जवाहर लाल नेहरू समाजवादी संघात के समाज का प्रस्ताव पारित कर एक वैचारिक विपर्यय अथवा भ्रम फैलाने में सफल हो चुके थे। अशोक मेहता ने कांग्रेस के प्रस्ताव का समर्थन व स्वागत किया जिनके विरुद्ध मधु लिमये ने निर्णायक प्रतिकार की घोषणा कर दी। फलस्वरूप मधु लिमये को बम्बई सोशलिस्ट पार्टी ने निष्कासित कर दिया। लोहिया ने देश भर के समाजवादियों से मधु लिमये का स्वागत और व्याख्यान कराने की अपील की।
पुरी में 29 से 31 मई 1955 के दौरान लिमये की अध्यक्षता में समाजवादियों का राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ जिसमें लोहिया ने देश में सैद्धान्तिक बहस चलाने का आह्वान किया। लोहिया जानते थे कि ऐसे वातावरण उन्हें बाबा साहब का साथ मिलेगा। क्योंकि दोनों का मकसद एक था। उन्होंने हैदराबाद से 10 दिसम्बर 1955 को डा. अम्बेडकर को पत्र लिखकर समाजवादी दल के विशेष अधिवेशन को सम्बोधित करने का आग्रह किया।
डा. लोहिया को डा. अम्बेडकर का 24 सितम्बर 1956 को लिखा गया पत्र मिला कि 30 सितम्बर को दिल्ली में होने वाली अखिल भारतीय परिगणित जाति संघ की बैठक में बाबा साहब लोहिया के प्रस्ताव को रखेंगे और वे चाहते हैं कि पार्टी के प्रमुख लोगों से बातचीत होकर साथ और गठबंधन की दशा को अंतिम रूप शीघ्रातिशीघ्र दे दिया जाये। बाबा साहब ने इसी पत्र में डा. लोहिया से 2 अक्टूबर 1956 को मिलने की बात कही। लोहिया ने ‘‘मैनकाइण्ड’’ के तीन अंक भेजवाते हुए बाबा साहब को पत्र लिख कर 19 या 20 अक्टूबर को मिलने का आग्रह किया। इस पत्र में उन्होंने बाबा साहब से सार्वजनिक सवालों पर बिना किसी रोक के बोलने व टिप्पणी करने का निवेदन किया। खराब स्वास्थ्य को कुप्रभाव बाबा साहब की सक्रियता पर भी पड़ा। नवम्बर में वे बीमार पड़े और 6 दिसम्बर 1956 को अपने सपनों और लोहिया नीत समाजवादी पार्टी के साथ एका के समस्त सद्प्रयासों को भी अधूरा छोड़कर चले गए।
इस प्रकार 1955 और 1956 के मध्य लोहिया व अम्बेडकर के मध्य हुए पत्र-व्यवहार और वैचारिक विनिमय से स्वतः स्पष्ट है कि दोनों में काफी हद तक वैचारिक समानताएं थीं जिन पर व्यापक विचार-विमर्श, विश्लेषण और लेखन आदि शेष हैं।
(लेखक इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार और समाजवादी पार्टी मध्य प्रदेश के महासचिव है)


