समाज

महिला दिवस : समाज में स्त्रियों की अ-दृश्य भूमिका

शंपा शाह ऐसे समय में जब देश के अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत करीब 94 फीसदी महिलाओं के आर्थिक योगदान को नकारा जाता हो, ‘सकल घरेलू उत्पाद’ यानि जीडीपी में उनकी भूमिका अनदेखी की जाती हो या उनके काम को कम…

समाज में धर्म : करुणा से करीबी और कट्टरता से किनारा

इस समय में भी धर्म को लेकर कट्टरता और क्रूरता, संकीर्णता और अंधविश्वास की प्रवृत्तियां जोर पकड़ रही हैं। ऐसे समय में जब धर्म आपस में वैमनस्यता बढाने के लिए उपयोग किए जा रहे हों, कैसे धर्म की जरूरत होगी?…

दूसरों से बदला लेते लेते हम समाज में बदलाव लाना भूल गये : गांधीवादी चिंतक रमेश शर्मा

हिसार, हरियाणा । दूसरों से बदला लेने लेते हम समाज में, देश में बदलाव लाना ही भूल गये । हम प्रकृति से, समाज से और देश से बदला लेने में ही व्यस्त हो चुके हैं । भूल गये हम प्रकृति…

राजनीतिक शून्‍य से बनता है, बेपरवाह समाज

तमाम अटकल-पच्चियों के बावजूद सवाल है कि क्‍या हमारा समाज आजादी के बाद के सबसे बडे पलायन को भोगने की तकलीफों को महसूस करना भी छोड़ चुका है? या फिर ‘पहचान,’ ‘धर्म’,’ ‘बहु-संख्‍यकवाद’ जैसी कोई और बात है जिसके चलते…

सत्ता की मार्फत नहीं बदल सकेगा समाज

महेन्द्रकुमार राजनीति के द्वारा सत्ता प्राप्त करके ही सेवा की जा सकती है। यानि गांवों की सेवा कोई बहुत बड़ा बिच्छू है और उसे राजसत्ता के चिमटे से पकड़ा जाए। राजनीति में पड़े हुए कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें…