Nature

प्रकृति का पर्यावरण

पर्यावरण का जो संकट अब ठेठ हमारी देहरी तक पहुंच गया है और जिसे लेकर सालाना कर्मकांड की तरह कई दिवस भी मना लेते हैं, क्या वह हमारे ही जीवन-यापन के धतकरमों का नतीजा नहीं है? मसलन, दिनों-दिन बढ़ता-फैलता कचरे…

साइकिल : तकनीक के युग में शून्य उत्सर्जन की वापसी

एक ज़माना था जब साइकिल केवल गरीबों या मध्यमवर्गीय परिवारों की सवारी मानी जाती थी, लेकिन समय के साथ इसकी पहचान पूरी तरह बदल गई। आज यह न सिर्फ एक स्वस्थ जीवनशैली का प्रतीक है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा…

जीवन के लिए जैव-विविधता

एक तरह से देखें तो धरती पर जीवन को पैदा करने, उसे बनाए रखने और उसका पेट भरते रहने में जैव-विविधता सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जैव-विविधता के इसी उप‍कार को याद दिलाते रहने के लिए हर साल दुनियाभर में…

22 April World Earth Day : आत्महंता समाज की अंतहीन कहानी

विचित्र है, जिस प्रकृति-पर्यावरण की मेहरबानी से इंसान न सिर्फ जीवित है, बल्कि फल-फूल रहा है, उसी प्रकृति-पर्यावरण के प्रति इंसान में गहरी कटुता और जहर कैसे, कहां से पैदा हो गया? इतना जहर कि उसे जानते-बूझते, तिल-तिलकर मारते जरा…

बीमार झीलों को कैसे बचाएं?

झीलें और तालाब स्थानीय समाज के लिए पानी के अविरल स्रोत की तरह पहचाने जाते हैं, लेकिन विडंबना यह है कि ये ही समाज अपने पडौस के इन जलस्रोतों को लगातार बिगड़ने में लगा हैं। क्या हो, यदि झीलों-तालाबों को…

प्रकृति प्रदत्त वाणी एवं मनुष्य कृत भाषा !

प्रकृति प्रदत्त ज्ञानेंद्रियों और मनुष्य की सृजनात्मक एवं विध्वंसात्मक प्रवृत्तियों की निरन्तर जुगलबंदी ने आज की दुनिया को एक ऐसे मुकाम पर पहुंचा दिया है कि जहां तक पहुंच कर हम समूची सभ्यता की सृजनात्मक शक्ति बढ़ा और नष्ट-भ्रष्ट भी…

जीवन से जुड़ी आजीविका

जीवन की तरफ पीठ देकर खड़ी की जा रही समृद्धि ने क्या हमें उस बुनियादी सुख से भी वंचित कर दिया है, जो इस तमाम खटराग का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए? और यदि यह सही है तो फिर क्या हमें…

देसी दीपावली की अहमियत 

हमारे देश में सभी त्यौहार खेती-किसानी से सीधे जुड़े रहे हैं, लेकिन हाल के वर्षों में बाजारों की आमद ने इन्हें उपभोग के रंग-बिरंगे बाजारू अवसरों में तब्दील कर दिया है। अब कोई अपने त्यौहारों तक पर कृषि की सुध…

Sonam Wangchuk : लद्दाख से उठी हिमालय की आवाज

महात्मा गांधी के जन्मदिन के ठीक एक दिन पहले हजार किलोमीटर की पद और यदा-कदा वाहन यात्रा करके अपनी बात कहने आए कुल-जमा डेढ़ सौ लद्दाखियों को देश की राजधानी की सीमा पर रोकने की आखिर क्या वजह हो सकती…

कृषि संंसार : जीवन-दायिनी है, ज़हरमुक्त खेती 

मौजूदा कृषि कितनी जहरीली है और उसकी पैदावार के कितने खतरनाक प्रभाव हो रहे हैं, इसे जानने के लिए किसी रॉकेट साइंस की जरूरत नहीं है। सवाल है, क्या हम अपने आसपास से लगाकर वैश्विक स्तर के अनुभवों से सीखकर…