Goods and Services Tax

अर्थ व्‍यवस्‍था : बैंकों की बदनीयत

लोक-कल्याणकारी राज्यों से उम्मीद की जाती है कि वे ऐसे काम करें जो जनहित में, बिना शुल्क के हों। बैंकों का गठन भी सेवा के इसी भरोसे के साथ किया गया था, लेकिन आजकल वे खुलकर धंधे में लगे हैं।…

विकास : साथ-साथ बढ़ती भुखमरी और सम्पन्नता

मौजूदा विकास की विडंबना है कि इसमें भीषण भुखमरी और असीमित सम्पन्नता एक साथ फलती-फूलती हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था में पांचवें पायदान पर खड़े हमारे देश में करीब अस्सी फीसदी आबादी सरकारी दया की मार्फत मिलने वाले पांच किलो अनाज पर…

आखिर क्‍या है, ‘जीएसटी’ की हकीकत?

तीन साल पहले एकरूपता की खातिर लगाए गए ‘जीएसटी’ ने तमाम छोटे-बडे व्‍यापारियों, आम खरीददारों और सरकारी अमले में से किसी को संतुष्‍ट नहीं किया है। आखिर क्‍या है, ‘जीएसटी’ का तिलिस्म? प्रस्‍तुत है, इस विषय की विस्‍तृत पड़ताल करता…