gender equality

ज्योतिबा फुले की प्रासंगिकता : एक समकालीन विश्लेषण

उन्नीसवीं शताब्दी के सामाजिक अंधकार में जाति, लिंग और शिक्षा के प्रश्नों पर सबसे तेज स्वर उठाने वालों में महात्मा ज्योतिराव फुले का नाम अग्रणी है। रूढ़ियों और अन्याय के विरुद्ध उनके जमीनी संघर्ष ने भारतीय समाज में परिवर्तन की…

कृषि : खेतों में महिलाओं का अदृश्य श्रम और मान्यता की लड़ाई

National Women Farmers Day इस तथ्य की याद दिलाता है कि खेतों में बीज से लेकर फसल तक का अधिकांश कार्य महिलाएं करती हैं, परंतु पहचान और नीति में वे अब भी हाशिए पर हैं। झाबुआ जैसे इलाकों में उनके…

11 October International Day of the Girl Child  : समाज में परिवर्तन की वाहक बने बालिकाएं

हर वर्ष 11 अक्टूबर को पूरी दुनियां में अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस दुनिया भर में लड़कियों द्वारा उनके लिंग के आधार पर सामना की जाने वाली लैंगिक असमानता के बारे में जागरूकता बढ़ाता है।इस असमानता…

संकटों से जूझती, उम्मीदों को गढ़ती, दुनिया को नया आकार देती बालिकाएं

11 अक्टूबर, अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस केवल एक तिथि नहीं, बल्कि हर उस लड़की के साहस और संकल्प का प्रतीक है जो अपनी पहचान स्वयं गढ़ रही है। वर्ष 2025 की थीम — “मैं जो लड़की हूं, मैं जो बदलाव लाती…

विधवाओं के भीतर साहस भरने की जरूरत : मध्‍यप्रदेश में किया विधवा प्रथा उन्मूलन का सूत्रपात

मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में महिला जागृति अभियान की पांचवी वर्षगांठ पर वरिष्ठ साहित्यकार अरुणा खरगोनकर द्वारा संपादित विधवाओं की दशा पर केंद्रित एक अभूतपूर्व स्मारिका का लोकार्पण किया गया, जो नई सदी में विधवाओं से संबंधित मुद्दों पर…

आजादी पर्व : क्‍या बोल के लब आजाद है तेरे?

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आज तक महिलाओं ने साहस, त्याग और नेतृत्व से देश का गौरव बढ़ाया है। रानी लक्ष्मीबाई, सावित्रीबाई फुले, सरोजिनी नायडू से लेकर निर्मला सीतारमण और पीवी सिंधु तक, स्त्रियों ने हर क्षेत्र में अपनी छाप…

बालिकाएं : आशा, आत्मबल और आत्मनिर्भरता

राष्‍ट्रीय बालिका दिवस : 24 जनवरी पर विशेष प्रतिवर्ष 24 जनवरी को राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाते हैं। इस दिन को मनाने की शुरुआत साल 2008 से हुई। पहली बार महिला बाल विकास मंत्रालय ने 24 जनवरी 2008 में राष्ट्रीय बालिका…

बराबरी के विरोध में मर्दानगी

हजारों साल की भारतीय संस्कृति का सतत गुणगान करने वाले हमारे समाज में औरतें आज भी दोयम दर्जे पर विराजमान हैं। मर्दों की मर्दानगी को कुछ ऐसी हैसियत प्राप्त है कि वह जब चाहे, जैसे चाहे औरतों के साथ कर…