कृषि : खेतों में महिलाओं का अदृश्य श्रम और मान्यता की लड़ाई

निलेश देसाई

National Women Farmers Day इस तथ्य की याद दिलाता है कि खेतों में बीज से लेकर फसल तक का अधिकांश कार्य महिलाएं करती हैं, परंतु पहचान और नीति में वे अब भी हाशिए पर हैं। झाबुआ जैसे इलाकों में उनके श्रम, पारंपरिक ज्ञान और नेतृत्व ने यह सिद्ध किया है कि टिकाऊ कृषि का भविष्य महिला किसानों के हाथों में है।

15 अक्‍टूबर : राष्ट्रीय महिला किसान दिवस

निलेश देसाई

भारत की कृषि अर्थव्यवस्था को अक्सर “अन्नदाता पुरुष किसान” के रूप में देखा जाता है। खेतों की तस्वीरों में हल चलाते या मंडी में सौदा करते पुरुष दिखते हैं, परंतु इस दृश्य के पीछे वह श्रम है जो दिखाई नहीं देता—महिलाओं का। वे खेत में बीज डालती हैं, पौध रोपती हैं, निराई-गुड़ाई करती हैं, फसल काटती हैं, मवेशियों की देखभाल करती हैं और घर की रसोई तक अनाज पहुंचाती हैं। फिर भी, न तो उन्हें किसान कहा जाता है, न नीति में वह स्थान मिलता है जिसकी वे अधिकारी हैं। भारत में कृषि जनगणना (2015–16) बताती है कि कुल कृषि श्रम का लगभग 73 प्रतिशत कार्य महिलाएं करती हैं, लेकिन ज़मीन के स्वामित्व में उनका हिस्सा केवल 13 प्रतिशत है। यह असमानता केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि पहचान के संकट में है—वे किसान हैं, पर “किसान” नहीं कहलातीं।

झाबुआ जैसे आदिवासी इलाकों में यह स्थिति और गहराई से महसूस होती है। संपर्क संस्था के लंबे अनुभव बताते हैं कि महिलाएं खेती की हर प्रक्रिया में केंद्रीय भूमिका निभाती हैं। वे ही बीजों का चयन और संरक्षण करती हैं, पौधों की रोपाई, निराई-गुड़ाई, जैविक खाद की तैयारी, फसल कटाई और पशुपालन तक हर काम संभालती हैं। इन कार्यों में उनका पारंपरिक ज्ञान, मौसमी समझ और बारीकी से जुड़ी मेहनत ही स्थानीय खेती को टिकाऊ बनाए रखती है। विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के परिवारों में महिलाएं खेत और घर के बीच पुल की तरह हैं—एक ओर वे उत्पादन में लगी हैं, दूसरी ओर घर की खाद्य सुरक्षा और पोषण की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर है।

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महिला खेत पाठशालाएं

संपर्क संस्था द्वारा संचालित कई गांवों में जब “महिला खेत पाठशालाएं” शुरू की गईं, तो यह पहली बार सामने आया कि महिलाएं कितनी गहरी कृषि समझ रखती हैं। मिट्टी परीक्षण, देसी बीजों की पहचान, गोमूत्र और नीम से जैविक घोल तैयार करने की विधियां—ये सब वे सहज रूप से जानती थीं। परंतु जब प्रशिक्षण या योजना की बात आती थी, तो सरकारी अभिलेखों में किसान के रूप में केवल पुरुष का नाम दर्ज होता था। परिणामस्वरूप महिलाएं कृषि ऋण, फसल बीमा, या किसान क्रेडिट कार्ड जैसी सुविधाओं से वंचित रह जाती थीं।

झाबुआ में कई बार यह भी देखा गया कि जब सूखा या बेमौसमी वर्षा ने फसल को नुकसान पहुंचाया, तो महिलाओं ने ही वैकल्पिक आजीविका के उपाय खोजे—सब्जी बाड़ी, बकरी पालन, या देसी बीजों का आदान-प्रदान। संपर्क संस्था द्वारा संचालित “पशु सखी” कार्यक्रम में दर्जनों महिलाएं प्रशिक्षित होकर न केवल अपने गांव में पशु स्वास्थ्य की सेवा दे रही हैं, बल्कि अतिरिक्त आमदनी भी अर्जित कर रही हैं। इससे यह सिद्ध हुआ कि जब महिलाओं को निर्णय का अधिकार और तकनीकी सहयोग मिलता है, तो वे न केवल उत्पादन बढ़ाती हैं बल्कि पूरे समुदाय की आर्थिक स्थिरता को भी मजबूत करती हैं।

देसी बीज बैंक

जलवायु परिवर्तन के दौर में यह भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। जब वर्षा चक्र अनिश्चित हो रहे हैं, जलस्रोत सूख रहे हैं, और मिट्टी की उर्वरता घट रही है, तब महिलाएं अपने अनुभव और पारंपरिक ज्ञान से अनुकूलन (adaptation) के नए रास्ते खोज रही हैं। झाबुआ के कुछ गांवों में महिलाओं ने सामूहिक रूप से देसी बीज बैंक बनाए हैं, स्थानीय फसलों की मिश्रित खेती शुरू की है और खेतों में जल संरक्षण के लिए छोटे-छोटे गड्ढे और बोरी बंधान तैयार किए हैं। यह कार्य संपर्क संस्था के मार्गदर्शन में हुआ है, पर असली नेतृत्व गांव की महिलाओं ने ही निभाया है। उनके अनुसार “जल और बीज दोनों को बचाना ही आने वाले समय में खेती को बचाना है।”

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कृषि नीति के स्तर पर देखें तो महिला किसानों की पहचान अभी भी अधूरी है। भूमि का स्वामित्व प्रायः पुरुषों के नाम पर होता है, जिससे महिलाएं “सहायक” के रूप में देखी जाती हैं, “निर्णयकर्ता” के रूप में नहीं। संपर्क के अनुभव बताते हैं कि जहां-जहां भूमि का संयुक्त स्वामित्व (joint title) पति-पत्नी के नाम पर हुआ, वहां महिलाओं की भागीदारी निर्णयों में स्पष्ट रूप से बढ़ी है। वे न केवल तकनीकी सलाह लेती हैं, बल्कि बाजार से सौदे भी खुद तय करने लगी हैं। यह आत्मविश्वास केवल अधिकार से आता है।

महिला किसानों को नीति, योजना और संसाधनों में बराबर की हिस्सेदारी हो

नीतियों में भी अब यह मान्यता दी जानी चाहिए कि किसान केवल वह नहीं जो हल चलाता है, बल्कि वह भी जो मिट्टी की नमी, बीज की पहचान, पशु की सेहत और घर की थाली—सबके बीच संतुलन बनाए रखता है। किसान एक प्रक्रिया है, और इस प्रक्रिया का आधा हिस्सा महिलाएं निभा रही हैं। यदि हम टिकाऊ और न्यायपूर्ण कृषि की दिशा में बढ़ना चाहते हैं, तो महिला किसानों को नीति, योजना और संसाधनों में बराबर की हिस्सेदारी देना अनिवार्य है।

झाबुआ के अनुभव यह भी बताते हैं कि जब महिलाएं संगठित होती हैं, तो केवल खेत ही नहीं, पूरा समुदाय बदलता है। महिला किसान समूहों ने न केवल अपनी खेती सुधारी, बल्कि गांवों में बच्चों की शिक्षा, पोषण और स्वच्छता के मुद्दों पर भी सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने सिद्ध किया कि “कृषि” केवल उत्पादन नहीं, बल्कि जीवन जीने की सामूहिक प्रक्रिया है।

भारत के खेतों में हर उगती फसल, हर बोया बीज किसी न किसी महिला के हाथों से जुड़ा है। फिर भी जब नीतियां बनती हैं, तो उनका नाम सूचियों में नहीं होता। अब समय है कि यह अदृश्यता समाप्त हो। खेत की आधी आबादी को नीति में आधी हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। जब महिलाएं किसान के रूप में पहचानी जाएंगी, तभी भारतीय कृषि सचमुच “समानता, स्थायित्व और सम्मान” की दिशा में आगे बढ़ेगी। (सप्रेस)

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