Earth

प्रकृति का पर्यावरण

पर्यावरण का जो संकट अब ठेठ हमारी देहरी तक पहुंच गया है और जिसे लेकर सालाना कर्मकांड की तरह कई दिवस भी मना लेते हैं, क्या वह हमारे ही जीवन-यापन के धतकरमों का नतीजा नहीं है? मसलन, दिनों-दिन बढ़ता-फैलता कचरे…

प्लास्टिक प्रदूषण पर्यावरण के लिए खतरा, प्रभावी प्रतिबंध जरूरी

विश्व पर्यावरण दिवस केवल प्रतीकात्मक आयोजन नहीं, बल्कि धरती की रक्षा के प्रति हमारी सामूहिक जवाबदेही का अवसर है। इस वर्ष का विषय ‘प्लास्टिक प्रदूषण को समाप्त करना’ हमें चेताता है कि यदि अब भी नहीं चेते, तो यह संकट…

22 April World Earth Day : आत्महंता समाज की अंतहीन कहानी

विचित्र है, जिस प्रकृति-पर्यावरण की मेहरबानी से इंसान न सिर्फ जीवित है, बल्कि फल-फूल रहा है, उसी प्रकृति-पर्यावरण के प्रति इंसान में गहरी कटुता और जहर कैसे, कहां से पैदा हो गया? इतना जहर कि उसे जानते-बूझते, तिल-तिलकर मारते जरा…

Global Warming : पृथ्वी की सेहत की चिंता करना भी जरुरी

पृथ्वी की केवल 15 फीसदी जलमग्न भूमि ही प्रदूषण से अप्रभावित है क्योंकि चार करोड़ टन की भारी धातु, जहरीला कीचड़ और अन्य औद्योगिक कचरा दुनियाभर में पानी में फेंका जा रहा है जिससे 85 फीसदी जलमग्न भूमि प्रदूषित हो चुकी है। तीन अरब से…

मिट्टी का मोल : सचेत और जिम्मेदार बनाने की कला

कहा जाता है कि दक्षिण एशिया में जीवन के आमफहम काम धरती पर बैठकर या उससे जुडकर ही साधे जाते हैं और नतीजे में इन इलाकों के समाजों में धीरज, सहनशक्ति और संयम सहज मौजूद रहता है। सच हो कि…

COP28 : पाखंड का पर्यावरण

‘कॉप – 28’ : 30 नवंबर से 12 दिसंबर 2023 पर्यावरण को लेकर सत्तर के दशक में उभरी राजनीतिक सत्ताओं की चिंता अब पाखंड में तब्दील होती जा रही है। तरह-तरह के वैश्विक सम्मेलनों में दुनियाभर के राजनेता भांति-भांति के दावे-वायदे…

जी20 देशों की 73 फ़ीसद जनता मानती है पृथ्वी महाविनाश के मुहाने पर

“दुनिया के सबसे धनी देशों के रहने वाले अधिसंख्‍य लोग भी ठीक वहीं बात महसूस करते हैं,जो हम कर रहे हैं। वे धरती की स्थिति को लेकर चिंतित हैं और इसे बचाना चाहते हैं।मुझे लगता है कि इससे दुनिया भर…

कृत्रिम ऑक्सीजन पर भारी है, प्राकृतिक प्राणवायु

कोरोना महामारी के दौरान सर्वाधिक याद किया जाने वाला तत्व ऑक्सीजन या प्राणवायु रहा है जो हमारे आसपास के पेड-पौधों की मेहरबानी से वायुमंडल में इफरात में मौजूद है, लेकिन उसके साथ हम क्या करते हैं? ‘केजी-1’ में पढने वाले…

अब भी बचाई जा सकती है – धरती

हर साल बाढ, सूखा, आंधी, गर्मी, बर्फवारी और तूफानों जैसी प्राकृतिक आपदाओं के बढने का एक मतलब यह भी है कि हमने एक वैश्विक समाज की हैसियत से धरती पर रहना अब तक नहीं सीखा है। एक तरफ, हमारे कार्य-कलाप…

वसुंधरा को सुंदर बनाये रखने के लिए हिमालय का संरक्षण जरूरी

खगोलीकरण और जलवायु परिवर्तन का दौर हिमालयी समाजों तथा प्रकृति दोनों के लिए चुनौती और चेतावनी भरा है,ये खतरे हमारे जीवन संसाधनों उत्पादन और जीवन पद्वति के लिए घंटी बजा चुके हैं। ऐसे में इन सबके प्रभाव को सरकारों और…