कोरोना वायरस की मार्फत फैली कोविड-19 बीमारी ने तरह-तरह की समस्याएं पैदा की हैं। इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण है – स्कूली शिक्षा। शिक्षा की इस बदहाली का तीखा असर झुग्गी बस्तियों की गरीब आबादी को झेलना पड रहा है। कोविड ने…
कोरोना काल में देश के 14 करोड़ से ज्यादा परिवारों की रोजी-रोटी पर असर पड़ा है। इनमें समाज के हाशिये पर रहने वाले समुदायों की आजीविका सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है। इन्हीं में सेक्स वर्कर्स समुदाय भी शामिल है। प्रस्तुत…
आप चाहें, न चाहें, ‘डिजिटल मीडिया’ धीरे-धीरे सभी की बुनियादी जरूरत बनता जा रहा है। लेकिन क्या महिलाओं की हमारी आधी आबादी तक भी विज्ञान का यह चमत्कार पहुंच पा रहा है? क्या वे उतनी ही आसानी से ‘स्मार्ट-फोन’ की…
लोगों की जिंदगियाँ जैसे शेयर बाज़ार के सूचकांक की शक्ल में बदल गयी हैं। सूचकांक के घटने-बढ़ने से जैसे बाज़ार की माली हालत की लगभग झूठी जानकारी मिलती है, लोगों के मरने-जीने की हक़ीक़त भी असली आँकड़ों की हेरा-फेरी करके…
कोरोना वायरस से उपजी कोविड-19 बीमारी ने और कुछ किया, ना किया हो, इंसानों के सामने उसकी बनाई दुनिया की पोलपट्टी जरूर उजागर कर दी है। महामारी के दर्जे की इस विपदा ने बता दिया है कि हमारी दुनिया के दैनिक कारनामे…
16 अगस्त को ‘जनता पार्लियामेंट’ वेबिनार में स्वास्थ्य के विभिन्न मुद्दों पर चर्चा जन स्वास्थ्य अभियान राष्ट्रीय सचिवालय और जन सरोकार के तत्वावधान में 16 अगस्त को ‘जनता पार्लियामेंट’ (जनता संसद) वेबिनार के दौरान स्वास्थ्य के विभिन्न गंभीर मुद्दों और…
भले ही कोरोना वायरस से उपजी ‘कोविड-19’ बीमारी दुनियाभर को हलाकान कर रही हो, लेकिन आंकडों को देखें तो इसके ठीक उलट, डर की कोई बात दिखाई नहीं देती। उलटे, ‘कोविड-19’ से होने वाली मौतों को सामान्यत: होने वाली मौतों…
कोरोना वायरस से उपजी बीमारी ‘कोविड-19’ से निपटने के लिए सरकार ने ‘आरोग्य सेतु’ नामक ‘एप’ को ‘डाउनलोड’ करना अनिवार्य कर दिया है। इस ‘एप’ की मार्फत सरकार चाहे तो किसी की भी नितांत निजी जिन्दगी में झांक सकती है,…
आज हम कोरोना महामारी, अर्थव्यवस्था और पर्यावरणीय सकंट को एक साथ झेल रहे हैं। इस संकट में हमें एक महानायक की जरूरत है। हमारे युग के सबसे बड़े नायक महात्मा गांधी हैं। अगर आज गांधी जी होते तो इस संकट…
दिनेश कोठारी कोविड-19 की मार्फत आए लॉकडाउन ने इंसानी नस्ल को पूंजी, मुद्रा आदि की असल कीमत भी बता दी है। पिछले तीन-साढे तीन महीनों में हमने जिस तरह का जीवन जिया है, उसने कम-से-कम हमें मुद्रा, मनुष्य और उत्पादन…