पूंजीवाद

पूंजीवाद, जलवायु परिवर्तन और हिंसा जैसे मसले दुनिया को तबाह करने में लगे हैं : गांधीवादी चिंतक डॉ. अभय बंग

सेवाग्राम में पांच दिवसीय राष्ट्रीय युवा शिविर सम्पन्न सेवाग्राम, 24 सितम्बर 2021 ।  सर्व सेवा संघ के युवा सेल द्वारा  सेवाग्राम आश्रम प्रतिष्ठान परिसर  में 20 से 24 सितंबर तक आयोजित राष्ट्रीय युवा शिविर आज यहाँ सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया।…

आर्थिक हित पोषक बनने के स्थान पर शोषक बन जाते है, तब कोरोना जैसे प्रलय की घंटी

कोरोना के बाद विश्‍व को टिकाने का रास्ता प्रकृति अनुकूलन ही है। प्रकृति के विपरीत समाजवाद में भी पूंजी की परिभाषा अच्छी नहीं थी, इसलिए पूंजीवाद और समाजवाद दोनों में ही प्राकृतिक आस्था नहीं है और प्राकृतिक संरक्षण सिमटा है। जब भी विश्‍व में प्रकृति के विपरीत ही सब काम होने लगे तो प्रकृति का बडा हुआ क्रोध महाविस्फोट बनता है और उससे प्राकृतिक आपदाएं निर्मित होती है। कोरोना को आपदा भी मान सकते है। महामारी केा प्रलय भी कहा जा सकता है। भारत इस महामारी से अपने परंपरागत ज्ञान आयुर्वेद द्वारा बहुत से कोरोना प्रभावितों को स्वस्थ बना सका है। बहुत लोगों के प्राण बचे है। इस आधुनिक आर्थिक तंत्र ने आयुर्वेद जैसी आरोग्य रक्षण पद्धति को सफल बनने का मौका ही नहीं दिया गया। उसने आर्थिक लाभ के लिए केवल चिकित्सा तंत्र को ही बढावा है।